कृष्‍ण और भीम के हाथों शिशुपाल और जरासंध का अंत

पांडवों ने हस्तिनापुर छोड़ने के बाद नया शहर बसाया और राजसूय यज्ञ की योजना बनाई। इसी की तैयारी में भीम के द्वारा जरासंध और कृष्ण द्वारा शिशुपाल का वध हुआ।
कृष्‍ण और भीम के हाथों शिशुपाल और जरासंध का अंत
 

अभी तक आपने पढ़ा: जब धृतराष्ट्र ने पांडवों को आधा राज्य देने से मना कर दिया तो पांडव हस्तिनापुर छोडक़र चले गए। उन्होंने खांडवप्रस्थ जा कर अपना नया राज्य बसा लिया-इंद्रप्रस्थ। उसके बाद उन्होंने राजसूय यज्ञ करने की योजना बनाई, जिसके बाद उस राज्य या राजा की सम्राटीय शक्ति को पहचान मिलती है। अब आगे...  type="text"

कृष्ण ने बड़ी चतुराई से राजसूय यज्ञ की तैयारियों के तमाम पहलुओं की योजना बनाई। वह जानते थे कि अगर इस काम में सबसे बड़ी अड़चन कहीं से आ सकती है तो वह जरासंध की तरफ  से आ सकती है। वह समझ रहे थे कि राजसूय यज्ञ की सफलता के लिए उन्हें उसे मारना होगा। लेकिन अगर उन्होंने जरासंध के खिलाफ  युद्ध छेड़ा तो दोनों ही तरफ  की सेनाओं को भारी नुकसान उठाना होगा। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि जरासंध को मल्लयुद्ध में ललकार उसे वहीं खत्म कर दिया जाए। जरासंध एक महान मल्ल योद्धा था और उसके पास मल्ल योद्धाओं की एक पूरी फ़ौज थी। उस समय में मल्ल युद्ध एक ऐसी कला था, जो सिर्फ  आपसी द्वंद्व या कुश्ती तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उसमें आध्यात्मिक संभावनाएं भी छिपी होती थीं।

इस सिलसिले में कृष्ण, अर्जुन और भीम ने जरासंध के घर गिरिव्रज जाने की योजना बनाई। ये तीनों ब्राह्मण के वेश में उसके यहां पहुंचे। हाँलाकि अर्जुन और भीम खुद ब्राह्मण का वेश धारण करने के इच्छुक नहीं थे।

शिशुपाल खड़ा हुआ और उसने एक के बाद एक कृष्ण के लिए अपशब्द कहना शुरू कर दिया। यहां तक कि उसने और उसके कुछ समर्थकों ने तलवारें भी खींच लीं। इतना ही नहीं, उसने भीष्म के बारे में भी भला-बुरा कहना शुरू कर दिया।
उनका मानना था कि कृष्ण ही ये सारे छल करें, जबकि कृष्ण को इससे कोई परहेज नहीं था। जरासंध के यहां पहुंचकर उन्हें महल में प्रवेश की इजाजत मिल गई। वे सीधे जरासंध के पास पहुंचे और उन्होंने उससे कहा कि वे उससे मल्लयुद्ध करने आए हैं। दरअसल, जब से कृष्ण ने कंस को मारा था, तब से जरासंध कृष्ण के प्रति बदले की आग में जल रहा था। कृष्ण की तरफ  से जरासंध के अपमान की एक पूरी श्रृंखला थी, जिसमें उन्होंने जरासंध को हराया था और उसकी जान बख्शी थी, रुकमणि का हरण किया, द्रौपदी के स्वयंवर से उसे पीछे हटने पर मजबूर किया था। दरअसल, इन सारे अपमानों के बाद जरासंध कृष्ण को मारने के लिए एक उचित मौके की तलाश में था।

जब जरासंध ने कृष्ण को बिना अस्त्र-शस्त्र के आते देखा तो उसने कहा, ‘ऐसा लगता है कि या तो तुम बड़े साहसी हो या फिर मूर्ख। अपने पिछले अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि तुम साहसी हो, लेकिन एक सम्राट, एक क्षत्रिय भला एक चरवाहे से कैसे लड़ सकता है।’ फिर उसने अर्जुन की तरफ  देखा और कहा, ‘यह तो अभी बच्चा है, मैं इससे कैसे लड़ सकता हूं।’ उसके बाद वह लंबे चौड़े डीलडौल वाले ताकतवर भीम की तरफ  मुड़ा और बोला, ‘यह मेरी तरह ताकतवर लगता है। मैं भीम से लड़ूंगा।’ दरअसल, वे सभी सम्मान के नियमों से बंधे थे।

उसके बाद भीम और जरासंध मल्ल युद्ध के लिए आपस में भिड़ गए। वे दोनों ही आपस में एक दूसरे के टक्कर के थे। मल्ल युद्ध में भीम जो भी चाल चलता, जरासंध के पास उसकी काट होती। जब भीम ने अपने हर दांव को खाली जाते देखा और समझ गया कि जरासंध को हराना मुश्किल है तो उसने कृष्ण की ओर देखा।

भीष्म ने जवाब दिया कि अगर यहां कोई अग्रपूजा के लायक है तो वह श्रीकृष्ण वासुदेव ही हैं। कृष्ण के अग्रपूजा की बात सुनते ही राजाओं के एक गुट को बात बुरी तरह चुभ गई। 
कृष्ण ने एक पत्ती उठाकर उसे दो हिस्सों में चीरा और उसे अलग-अलग फेंक दिया। दरअसल, जरासंध दो हिस्सों में पैदा हुआ था, जिसे जोडक़र बनाया गया था और उसे मारने का तरीका भी यही था। भीम ने उसे नीचे गिरा कर उसे दो हिस्सों में चीर दिया। जरासंध का शरीर दो हिस्से में आसानी से फ ट तो गया, लेकिन तुंरत दोनों हिस्से आपस में जुड़ गए। यह देख भीम को समझ में नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या किया जाए। वह थक चुका था, जबकि दोनों हिस्से जुडऩे के बाद जरासंध में नई ताकत भर गई थी। भीम ने एक बार फि र राय लेने के लिए कृष्ण की ओर नजर घुमाई। कृष्ण ने दोबारा से एक पत्ती को लेकर उसे बीच से चीरा और उसके दोनों हिस्से विपरीत दिशाओं में उल्टे फ ेंक दिए। भीम कृष्ण का संकेत समझ गए। भीम ने फि र जरासंध को दो हिस्सों में फ ाड़ा, लेकिन इस बार शरीर के दोनों हिस्से विपरीत दिशाओं में फेंक दिए। अंतत: जरासंध मारा गया।

पांडवों के चक्रवर्ती बनने के रास्ते में आने वाले सम्राट जरासंध को मरवाकर पांडवों के सफ ल राजसूय यज्ञ का आयोजन उन दिनों की राजनीति में एक महत्वपूर्ण कदम था। इस कदम से कृष्ण उस समय के परम शक्तिशाली व्यक्तित्व बन चुके थे।

राजसूय यज्ञ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता था - ‘अग्र पूजा’, जिसमें राजा यज्ञ से पहले किसी एक व्यक्ति को पूजा के लिए चुनते थे। उस सभा में कई महान राजा, ऋषि व नायक मौजूद थे। द्रोणाचार्य, भीष्म, द्रुपद, कृष्ण, द्वैपायन, व्यास, बलराम व अश्वत्थामा। उन्हें सामने देख पांडवों में सबसे बड़े भाई युधिष्ठर ने वहां मौजूद सबसे बुजुर्ग भीष्म पितामह से पूछा कि अग्रपूजा किसकी होनी चाहिए। भीष्म ने जवाब दिया कि अगर यहां कोई अग्रपूजा के लायक है तो वह श्रीकृष्ण वासुदेव ही हैं। कृष्ण के अग्रपूजा की बात सुनते ही राजाओं के एक गुट को बात बुरी तरह चुभ गई। खासकर शिशुपाल को, जो रुकमणि के स्वयंवर के समय से ही कृष्ण के प्रति खार खाए बैठा था। चूंकि रुकमणि स्वयंवर के समय कृष्ण के साथ भाग गई थीं, तब से कृष्ण के प्रति शिशुपाल बदले की आग में जल रहा था।

शिशुपाल की मां और पांडवों की मां कुंती, कृष्ण के पिता वसुदेव की बहनें थीं। इस रिश्ते से कृष्ण, पांडव और शिशुपाल सब आपस में फुफेरे-ममेरे भाई थे। नाराज शिशुपाल ने एक के बाद एक कृष्ण को गालियां देनी शुरू कर दीं- ‘कोई व्यक्ति इसकी अग्रपूजा कैसे कर सकता है। यह एक चालाक, झूठा, मक्कार और कायर व्यक्ति है। सभा में इतने महान लोगों के होते हुए यह इस पूजा का अधिकारी कैसे हो सकता है।’ हालांकि शिशुपाल की मां जानती थीं कि जिस तरह से उनका बेटा चल रहा है, वह एक दिन कृष्ण के हाथों मारा जाएगा। उन्होंने कभी कृष्ण से कहा था कि तुम उसका वध मत करना। कृष्ण ने उनसे कहा था कि उनका बेटा उन्हें लगातार अपशब्द कहता रहता है। कृष्ण ने अपनी बुआ को वचन दिया कि अगर कभी शिशुपाल ने उन्हें अपवचन बोले तो वह उसकी 99 गलतियां या अपशब्द माफ  कर देंगे, लेकिन जैसे ही उसकी संख्या सौ हो जाएगी तो वह उसे नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने शिशुपाल के लिए इतनी गुंजाइश छोड़ी थी।

शिशुपाल खड़ा हुआ और उसने एक के बाद एक कृष्ण के लिए अपशब्द कहना शुरू कर दिया। यहां तक कि उसने और उसके कुछ समर्थकों ने तलवारें भी खींच लीं। इतना ही नहीं, उसने भीष्म के बारे में भी भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। भीष्म की मां का नाम गंगा था, जो एक नदी थी। उन्हीं के नाम पर उन्हें गांगेय भी कहा जाता था। शिशुपाल उन्हें भला बुरा कहने के दौरान यहां तक कह गया कि ‘तुम्हारी मां गंगा बिना किसी भेदभाव के हर पुरुष को स्वीकार करती हैं।’ इतना सुनते ही मानो कृष्ण का धैर्य जवाब दे गया। यह शिशुपाल की सौंवी गलती थी। कृष्ण ने कहा, ‘बस बहुत हो चुका।’ इतना कहते ही उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र निकाला और शिशुपाल की ओर चला दिया। देखते ही देखते शिशुपाल का सिर जमीन पर आ पड़ा। इसके बाद कृष्ण की अग्रपूजा की गई। उसके बाद से उन्हें आधिकारिक तौर पर धर्म गोप़्ता कहा जाने लगा। हालांकि उनका कोई राज्य नहीं था। कोई भौतिक साम्राज्य नहीं था, लेकिन तब से वह धर्म सम्राट कहलाने लगे।