अपनी मशीन को नहीं, खुद को अपग्रेड कीजिए
इस ब्लॉग में सद्‌गुरु बता रहे हैं कि दुनिया में कोई भी बड़ा काम करने से पहले जरुरी है कि हम अपने आप पर कुछ काम करें। वे बताते हैं कि सिर्फ शिक्षा ऐसा नहीं कर सकती।
 
अपनी मशीन को नहीं, खुद को अपग्रेड कीजिए
 

अफसोस, आजकल दुनिया का चलन कुछ ऐसा हो गया है कि आप किसी से जितनी ज्यादा असहमति जताएंगे, आपके रिश्ते में उतना ही खिंचाव आएगा। विज्ञान और अध्यात्म के बीच मुझे कोई असहमति महसूस नहीं होती। मैं बस यह कह रहा हूं कि आप विज्ञान को सीमित साधनों के साथ देख रहे हैं।

जो लोग बड़े काम करने की कोशिश कर रहे हैं, वे उलझ रहे हैं, क्योंकि वे अपनी मशीन को सुधारे बिना ही अपने काम को बेहतर बना लेना चाहते हैं। 
अब विज्ञान तेज गति से चलना चाहता है। मान लीजिए आप फार्मूला-वन के रेस ट्रैक पर जाना चाहते हैं। क्या आप वहां अपनी मारुति 800 कार से जाएंगे? नहीं, पहले आपको अपनी कार को अपग्रेड करना होगा। अगर आप बिना अपनी मशीन को अपग्रेड किए, अपनी गतिविधियों को अपग्रेड कर रहे हैं तो गड़बड़ होगी ही। सिर्फ विज्ञान के साथ ही नहीं, ऐसा हर चीज के साथ है, चाहे वह मैनेजमेंट हो, अर्थशास्त्र हो या कुछ और। लोग जीवन में अपनी खुद की मशीन को अपग्रेड किए बिना गतिविधियों को अपग्रेड करना चाहते हैं। अपग्रेड की बात पर आपके मन में शिक्षा की बात आ जाती है। शिक्षा के मायने क्या हैं? अपने आपको सूचनाओं से भर लेने का मतलब खुद को अपग्रेड करना नहीं है। वह सिर्फ सोशल अपग्रेडेशन हो सकता है, वह किसी भी मायने में इंसान को अपग्रेड नहीं कर सकता।

सूचनाएं आपको बेहतर नहीं बनातीं

सूचनाएं पा लेने के बाद ऐसा लगता है कि आपमें सुधार हो रहा है। नहीं, सूचनाएं आपको बेहतर नहीं बनातीं। मैं आपको बस यही समझाना चाहता हूं कि अगर आप अपनी मशीन में सुधार नहीं करेंगे, तो आपके जीवन में भी सुधार नहीं होने वाला। अगर आप रेस ट्रैक पर जाना चाहते हैं तो आपके पास फार्मूला-वन कार भले न हो, कम से कम फरारी तो होनी ही चाहिए। बिना मशीन को बेहतर बनाए अगर आप अपनी गतिविधियों को सुधारने की कोशिश करेंगे, तो आप बुरी तरह उलझ जाएंगे। आजकल यही हो रहा है। जो लोग बड़े काम करने की कोशिश कर रहे हैं, वे उलझ रहे हैं, क्योंकि वे अपनी मशीन को सुधारे बिना ही अपने काम को बेहतर बना लेना चाहते हैं।

वैज्ञानिकों को ख़ास तौर पर खुद पर कम करने की जरुरत है

मैं इस स्थिति को लेकर चिंतित हूं। वैज्ञानिक, जिन्हें ज्ञान के क्षेत्र में मार्गदर्शक माना जाता है, जिनसे उम्मीद की जाती है कि वो लोगों को राह दिखाएं, मैं उन्हें लेकर चिंतित हूं। उनमें सुधार होना चाहिए। आप अपने को लेकर जो कर रहे हैं, आपको उससे कुछ ज्यादा करना चाहिए। उन मेंढकों के बारे में भूल जाइए, जिन्हें आप प्रयोगशाला में काटते हैं, उन बंदरों के दिमाग को छोड़ दीजिए, जिनका आप अध्ययन कर रहे हैं। इन सबकी जगह आप खुद पर ध्यान दीजिए। यही बेहद अहम है, क्योंकि अगर आपने खुद को बेहतर बना लिया तो आप जो भी काम करेंगे, वह बिल्कुल अलग तरीके से होगा। ऐसा होना ही चाहिए। दुनिया में जिस किसी भी शख्स ने कोई महत्वपूर्ण काम अपने हाथ में लिया हुआ है, चाहे वह अर्थशास्त्र के क्षेत्र में हो या विज्ञान के या किसी दूसरे क्षेत्र में, उन्हें खुद को अपग्रेड करने के लिए खुद पर कुछ समय और ऊर्जा खर्च करने की जरूरत है।

चीज़ें बटोरने से आप ऊंचे नहीं उठेंगे

चीजों को इकठ्ठा करने से अपग्रेडेशन नहीं होगा। अगर आप धन-दौलत या जानकारी इकट्ठी कर लेते हैं तो इससे आपका जीवन अपग्रेड नहीं हो जाएगा। इससे बस समाज में आपकी स्थिति बेहतर होती है। आपके पास कितना पैसा है, इसकी कीमत तभी है, जब आपके इर्द-गिर्द आपसे गरीब लोग मौजूद हों। अगर आप किसी वीराने में अकेले खड़े हैं तो इस बात की कोई अहमियत नहीं है कि आपके पास कितना पैसा है। ये सब सामाजिक सरोकार की चीजें हैं।

अपने यहां एक मशहूर कहानी है। गंगा के किनारे एक अनपढ़ नाविक था। उसके पास एक विद्वान आया। वह उस नाविक की नाव में बैठ गया। उसने आकाश की ओर देखा और नाविक से पूछा, ‘क्या तुम्हें पता है कि सूर्य हमसे कितने प्रकाश वर्ष दूर है?’ नाविक ने कहा, ‘नहीं।’ विद्वान ने फिर पूछा, ‘क्या तुम्हें पता है कि इस नदी की लंबाई कितनी है?’ नाविक ने कहा - ‘नहीं, मुझे बस इस नदी को पार करना आता है।’ इसी तरह उस विद्वान ने कई सवाल पूछे, लेकिन नाविक कुछ न बता सका। इस पर विद्वान ने कहा, ‘तुम्हारा जीवन बेकार है, अगर तुम ये सब चीजें भी नहीं जानते।’

अचानक नाव में पानी भरने लगा। अब बारी नाविक की थी। उसने विद्वान से पूछा - ‘क्या आपको तैरना आता है?’ विद्वान ने कहा, ‘नहीं।’ ‘अब आपका जीवन . . .’ यह कहते हुए नाविक ने पानी में छलांग लगा ली। तो मैं आपको यही बताना चाहता हूं कि आपको अपने जीवन को अपग्रेड करना जरूरी है।

दिमाग को बेहतर बनाती है योगिक क्रिया

इनर इंजीनियरिंग प्रोग्राम में हम जो क्रिया सिखाते हैं, उस पर अभी कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अध्ययन चल रहा है। उन्होंने अलग-अलग तरह के 300 लोगों के जींस का अध्ययन किया। जिन लोगों ने तीन महीने तक इस क्रिया का लगातार अभ्यास किया था, उन्हें तीन महीने पहले की तुलना में औसतन 6.4 साल युवा पाया गया। अध्ययन में यह भी पता चला कि तीन महीने के बाद इन लोगों के दिमाग में मौजूद न्यूरॉन सामान्य के मुकाबले तीन गुना तेजी से विकसित हो रहे थे। इसका मतलब है कि लगातार इस क्रिया का अभ्यास करने वालों का दिमाग, उम्र बढऩे के साथ-साथ और बेहतर तरीके से काम करने लगता है। उम्र बढऩे के साथ दिमाग कमजोर नहीं होता, वह बेहतर तरीके से काम करता रहता है। इन तथ्यों का पता लगाने के बाद अध्ययनकर्ताओं ने इस अध्ययन को प्रकाशित करने में तीन साल का समय लिया।

 
 
 
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