क्या आत्मा को हमसफर की जरुरत होती है?

पिछले अंक में आपने पढ़ा सद्‌गुरु, शेरिल सिमोन और लीला के साथ आधी रात में नौका विहार पर निकले… पढ़ें धारावाहिक ‘मिडनाइट विद द मिस्टिक’ के हिंदी अनुवाद की अगली कड़ी:
 
क्या आत्मा को हमसफर की जरुरत होती है?
 

थोड़ी देर बाद हम एक छोटे-से निर्जन टापू के पास पहुंच गए। सद्‌गुरु ने नाव को बड़ी कुशलता के साथ एक रेतीली जगह तक पहुंचाया। लीला और मैं नाव को बांधने में लग गयीं और सद्‌गुरु ने एक साफ मैदानी जगह में फुर्ती से आग जला दी। हम उनके पास पहुंच गए और हम सब गर्म लपटों के इर्द-गिर्द बैठ गए। कुछ पलों के सन्नाटे के बाद सद्‌गुरु ने एक ऊर्जावान, हृदय को छू लेने वाले मंत्र का उच्चारण आरंभ कर दिया। उनका मंत्रोच्चारण (मंत्र बोलना) सम्मोहित-सा (हिप्नोटाईज) कर देता है।

नाद ब्रह्म विश्वस्वरूपा

नाद ही सकल जीवरूपा

नाद ही कर्म नाद ही धर्म

नाद ही बंधन नाद ही मुक्ति

नाद ही शंकर नाद ही शक्ति

नादम् नादम् सर्वम् नादम्

नादम् नादम् नादम् नादम्

धीरे-धीरे उनका स्वर मौन में समा गया और हम तीनों थोड़ी देर तक आनंदमय शांति में डूबे बैठे रहे। फिर मैंने सद्‌गुरु से उस सुंदर मंत्र का अर्थ बताने को कहा।

उन्होंने कहा, ‘सीधा-सीधा अनुवाद करूं तो इसका अर्थ है ‘ध्वनि ब्रह्म है, ब्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। ध्वनि जीवन के सभी रूपों में अभिव्यक्त होती है। ध्वनि बंधन है, ध्वनि ही मुक्ति का माध्यम है। ध्वनि हर वस्तु के पीछे की शक्ति है, ध्वनि ही सब-कुछ है।’

मैंने इस अर्थ के बारे में सोचा, फिर मुझे याद आया कि बाइबिल में भी कुछ स्थानों पर ‘एक शब्द’ और उसके सर्वोपरि महत्व का वर्णन है - ‘आरंभ में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और यह शब्द ही ईश्वर था।’ मुझे लगा कि सभी आध्यात्मिक परंपराओं के बीच एक जुड़ाव है।

क्या सोल-मेट सच में होते हैं

समय आगे बढ़ रहा था। लीला ने सद्‌गुरु से एक युवा जोड़ी की बात छेड़ी, जिन्होंने सद्‌गुरु से अपनी शादी करवाने का अनुरोध(रिक्वेस्ट) किया था। उनकी बातचीत थमने पर मैंने सद्‌गुरु से पूछा कि क्या ‘सोल-मेट्स’ वाकई में होते हैं? मुझे नहीं लगता था कि ऐसा कुछ होता है। जब मैंने उन्नीस की उम्र में शादी की थी तब मैं सचमुच विश्वास करती थी कि हर व्यक्ति का एक ‘सोल-मेट’ होता है और उस समय मुझे विश्वास था कि मेरा संगी मुझे मिल गया है। लेकिन तलाक होने के बाद मैंने ऐसा सोचना छोड़ दिया था। शायद अपनी टूटी शादी की वजह से मैं इन सब चीजों में दोष ढूंढऩे लगी थी। वैसे बाद में मैं तलाक के सदमे से बखूबी उबरकर एक दूसरे जीवनसाथी के साथ सचमुच सुखी जीवन बिता रही थी। लेकिन मैंने अपने इस रिश्ते पर कभी भी इस आशा का बोझ नहीं लादा कि हमें एक-दूसरे का ‘सोल-मेट’ बनना है।

 रिश्ते की सीमाओं को न समझने पर वह बहुत सजावटी हो जाता है, और टूट जाने पर वह भद्दा हो जाता है।  
सद्‌गुरु ने कहना शुरू किया, ‘अब आपको यह समझ लेना चाहिए कि मिलन हमेशा तन का होता है। यह तन की जरूरत है। हो सकता है मन और भावनाओं की भी जरूरत हो। इसलिए मिलन की प्रक्रिया कुछ हद तक तन की होती है और कुछ हद तक मन की। आत्मा का किसी से मिलन नहीं होता और न ही आत्मा को किसी संगी की जरूरत होती है क्योंकि यह ख़ुद में संपूर्ण और अथाह है। जो सीमित है उसी को संगी चाहिए ताकि वह पहले से थोड़ा अच्छा महसूस कर सके।’

सिर्फ शरीर, विचारों और भावनाओं को साथी की जरुरत होती है

ऐसी सोच तार्किक तो थी लेकिन बड़ी कठोर थी और थोड़ी भी रोमांटिक नहीं थी। ‘आप कोई संगी किसलिए चुनती हैं?’ उन्होंने पूछा। ‘शायद तृप्ति के लिए,’ मैंने कहा।

‘आप चाहती हैं कि आपका शरीर पहले से थोड़ा अच्छा महसूस करे,’ उन्होंने मुस्कुराकर कहा। ‘हम उसे कामुकता कहते हैं और यह बहुत सुंदर हो सकता है। हम चाहते हैं कि हमारा मन पहले से थोड़ा अच्छा महसूस करे, हम उसे संगति कहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारी भावनाएं हमको अच्छी लगें और हम उसको प्रेम कहते हैं। लेकिन यह सब यहीं तक सीमित है। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह मेल खाने वाला साथी बड़े सौभाग्य से मिलता है, लेकिन यदि आप बंधनों में रहना पसंद नहीं करतीं, तो इस सीमाओं में बंधा होना देर-सबेर घुटन पैदा करता ही है।

‘ऐसे जो भी संबंध आप बनाती हैं वे तन, मन या भावना के होते हैं। किसी और चीज को आप इस तरह नहीं जोड़ सकतीं। यदि आप अपनी चेतना में ऊंची उठ जाएं और अपनी ऊर्जाओं पर कुछ हद तक नियंत्रण कर लें तो हो सकता है आप अपनी ऊर्जाओं को आपस में जोड़ सकें।

खुद से सच बोलना जरुरी है

‘रिश्ते की सीमाओं को न समझने पर वह बहुत सजावटी हो जाता है, और टूट जाने पर वह भद्दा हो जाता है। यह भद्दा केवल इसलिए हो जाता है कि आप ख़ुद से और अपने साथी से झूठ-पर-झूठ बोलती जाती हैं।

‘सीधी-सच्ची बात कहना अच्छा होता है, कम-से-कम अपने-आप से। हो सकता है आपके साथी में इतनी परिपक्वता(मेच्युरीटी) न हो कि आप उससे सौ-फीसदी सच्ची बात कह सकें, लेकिन आपको कम-से-कम ख़ुद के साथ सच्चाई से पेश आना होगा। यह बहुत महत्वपूर्ण है। यदि आप समझदारी और उमंग से जीना चाहती हैं तो यह बेहद जरूरी है कि आप खुद को मूर्ख न बनाएं। आप दूसरे को मूर्ख बना सकती हैं। आप पहले ही जानती हैं कि वह मूर्ख है, क्योंकि उसने आपके साथ आकर अपनी मूर्खता दिखा दी है।’ वे बोलकर जोर से हंसने लगे।

 
 
 
 
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