सद्‌गुरु ने कावेरी नदी को ही क्यों चुना?

सद्‌गुरु ने कावेरी नदी के साथ अपने गहरे लगाव को उजागर कर रहे हैं, और ये बता रहे हैं कि उन्होंने पहले कावेरी नदी को ही क्यों चुना।
आखिर सद्गुरू ने कावेरी नदी को ही क्यों चुना?
 

कावेरी : मेरी रगों में बहता हुआ खून

 सद्गुरू: मैं कावेरी के आस-पास पला बढ़ा हूं। मैं शायद उन गिने-चुने लोगों में से हूं, जो छोटी उम्र से ही नदी से जुड़े हुये हैं। मै उस वक़्त नदी जाया करता था, जब दूसरे बच्चों को पढ़ना या स्कूल जाना होता था।

 

 

जो उस समय देखने में आवारगी जैसा प्रतीत होता था वही आज किसी अद्भुत ज्ञान जैसा है। लोगों को आश्चर्य होता है और वो पूछते हैं, “सद्गुरु क्या आप पर्यावरण विशेषज्ञ हैं? आपको यह सारी चीजें कैसे पता हैं?” नहीं, मैं कोई पर्यावरण विशेषज्ञ नहीं हूं बस बात ये है की इस ग्रह पर मुझे छह दशक बीत गए हैं और मैंने ध्यान दिया है। अगर आप बैठे हैं और ध्यान दे रहे हैं तो, क्या आप नहीं देख सकते कि क्या हो रहा है? क्या इसके लिए कोई किताब पढ़ना ज़रूरी है?

कावेरी के बारे में बहुत सी बातें हैं जो मैं कह सकता हूं। कावेरी, मेरे शरीर में बहने वाले रक्त की तरह है। तमिल नाडू और कर्णाटक में ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके लिए कावेरी उनका शरीर, उनका रक्त सब कुछ है। उस समय तक मेरा जीवन सिर्फ कावेरी पर ही आश्रित था। 12 से 14 साल की उम्र में, मैं लगभग हर दिन इसमें तैरने जाया करता था।

जब मैं 17 साल से कुछ बड़ा हुआ, तो एक बार मैंने 163 किलोमीटर तक की राफ्टिंग की थी। ट्रक के 4 टायर और बांस की कुछ टहनियों की मदद से कावेरी में 13 दिनों तक तैरता रहा। आम तौर पे कावेरी में बहाव ज्यादा तेज नहीं होता, धीमा ही रहता है। मैं भागामंडल से के. आर. नगर तक गया था। मैंने नदी को कभी एक प्राकृतिक संसाधन की तरह नहीं देखा। उसे हमेशा अपने जीवन से कहीं ज्यादा बड़ा जीवन माना है। हमारे और आपके जैसे लोग आएंगे और चले जाएंगे मगर नदियां पिछले कई लाख सालों से बह रही हैं।

पर आज हमने इसे वाकई घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है।

कावेरी : ख़त्म होती एक पूंजी

जब हम कावेरी शब्द बोलते हैं, तो लोगों के दिमाग में कावेरी की सुंदरता या उसके प्राकृतिक स्वरूप से जुड़ा विचार नहीं आता। देश के अन्य जगहों पर पर लोग कहते हैं, “ओह, कावेरी की समस्या?” कावेरी कोई समस्या नहीं है। कावेरी युगों से मानव जीवन की समृद्धि और खुशहाली का स्रोत रही है। आज वो एक समस्या बन गई है क्योंकि इसका पानी कम हो रहा है।

लोग सोचते हैं कि कन्नड़ और तमिल लोग हमेशा आपस में लड़ते रहते हैं। वह इसलिए लड़ते हैं क्योंकि एक गिलास पानी को दो लोग पीना चाहते हैं। अब समय आ गया है कि हम दोनों के पास एक एक गिलास पानी हो। तभी हम दोस्त बन सकते हैं। नहीं तो, व्यर्थ में हम आपस में लड़ते रहेंगे। पिछले 50 सालों में कावेरी 40 प्रतिशत तक घट गई है, क्योंकि कावेरी घाटी के 87 प्रतिशत पेड़ हमने काट दिए हैं।

हमारे देश में, पानी का एकमात्र स्रोत बारिश है, जो कि मानसून के दौरान 60 दिनों में गिरती है। और हमें इसी पानी को इकट्ठा करके 365 दिन तक चलाना होता है। पानी को रोककर रखने का एक ही तरीका है और वो है कि खेतों में पर्याप्त मात्रा में पेड़ लगाए जायें। अगर जमीन में पेड़ों से प्राप्त हुए जैविक तत्व और जानवरों का मल प्रचुर मात्रा में होता है तो वहां पानी रुकता है, फिर धीरे धीरे जमीन के नीचे जाता है और फिर नदी में।

भारत में उपयोग की जा सकने वाली कुल जमीन का 80% हिस्सा खेती में इस्तेमाल होता है, इसलिए यहाँ कृषि वानिकी के अलावा कोई और उपाय नहीं है - यानी किसानों को पेड़ों पर आधारित खेती की ओर जाने के लिए प्रोत्साहत करना होगा। हम हर साल लगभग 4000 किसानों की सोच को बदल के उनसे कृषि वानिकी की शुरुआत करवा रहे हैं। लेकिन अगर हम इस गति से चलते रहे तो हमें इस नदी को पुनर्जीवित करने में 80 से 100 साल लग जाएंगे ।

इसीलिए हमने कावेरी पुकारे अभियान की शुरुआत की, जिसमें हम यह कोशिश कर रहे हैं कि इस अभियान की अवधि को 100 साल से घटाकर 12 साल तक कैसे लाया जाए। इसके प्रमाणिक वैज्ञानिक तथ्य भी मौजूद हैं कि आप जो भी पेड़ लगाते हैं, जब वह 12 साल में एक स्तर तक बड़ा हो जाता है, तो यह लगभग 3800 लीटर पानी जमीन में रोके रखता है। कावेरी घाटी में हम 242 करोड़ पेड़ लगाना चाहते हैं, अगर हम इस घाटी के एक तिहाई भाग में पेड़ लगा सकें तो कावेरी में फिर से पानी ज़रूर बहेगा।

समस्या से समाधान तक

ये अभियान कावेरी से मेरे लगाव के बारे में नहीं है। मै नर्मदा, गोदावरी या गंगा को पुनर्जीवित करने के लिये चुन सकता था। लेकिन मैंने कावेरी को इसलिये चुना क्योंकि बैंगलोर और चेन्नई के लोगों पर आने वाली विकट परिस्थिति का आभास मुझे पहले ही हो गया है।

अभी कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश में, एक गर्भवती महिला को पानी के झगड़े के चलते गोली मार दी गयी। पानी को लेकर महिलाएं कब से तमिलनाडु की गलियों में झगड़ा कर रही हैं पर किसी ने कोई ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने सोचा “ अच्छा, यह तो सिर्फ महिलाओं के बीच की लड़ाई है।” वे जब आपस में लड़ती हैं तो सिर्फ एक दूसरे को गलत शब्द कहती हैं। लेकिन आज पुरुष बाहर पानी लेने जाते हैं, और जब वे झगड़ते हैं तो एक दूसरे को मार देते हैं। किसी घटना के घटित होने से पहले, हम क्यों नहीं देख पाते? ज्यादातर लोग तब तक जागरूक नहीं होते जब तक की उन्हें कोई गहरी चोट नहीं लगती।

दुर्भाग्य से कावेरी पुकारे अभियान, बेंगलुरु और चेन्नई के लोगों की बढ़ती परेशानी की वजह से सफल होगा, न कि किसानों की परेशानियों की वजह से। हम क्रिकेट के स्कोर की तरह गिन रहे हैं की “पिछले साल इतने हजार मरे थे और इस साल उससे कम मरे हैं” और इस बात पर हर कोई खुश भी है। अगर देश में एक व्यक्ति भी कर्ज़ ना अदा कर पाने की वजह से फांसी लगाता है, तो क्या यह शर्म की बात नहीं है? आज 83% तमिल किसान और 77% कन्नड़ किसान ऐसे हैं जो कर्ज में डूबे हुए हैं। और जिस तरीके से चीजें चल रही हैं वह कभी अपना कर्ज अदा करने में समर्थ नहीं हो पाएंगे।

अगर हम ग्रामीण भारत को रहने योग्य स्थान में परिवर्तित करना चाहते हैं तो अहम पहलू यह है कि खेती करने की प्रक्रिया को लाभप्रद बनाया जाए। पेड़ आधारित खेती से, ना सिर्फ नदियों में पानी बढ़ेगा और जमीन हरी-भरी होंगी, बल्कि किसानों की आय भी 3 से 8 गुना तक बढ़ सकती है।

कावेरी पुकारे अभियान सिर्फ कावेरी के लिए नहीं है। हम यह दिखाना चाहते हैं कि पर्यावरण को पुनर्जीवित करना जमीन के मालिक के लिए कितना ज्यादा लाभप्रद है। और जैसे ही एक बार यह आर्थिक रूप से सफल हो गया तो उसके बाद ये अपने आप ही हर जगह होने लगेगा। फिर देश के बाकी किसान भी इसे अपनी इच्छा से अपनाने लगेंगे।

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