सात बातें – हम अक्सर सुनते हैं ईशा हठ योगियों से
ईशा हठ योग स्कूल के स्नातक, अपने ट्रेनिंग कोर्स 2015 से, थोड़े से हास्य और गहराई के साथ, कुछ अनूठे अनुभव बाँट रहे हैं। जानते हैं कुछ ऐसी बातें जो ईशा हठ योग शिक्षक अक्सर हमारे साथ साझा करते हैं…
 
 

1. मैं बस किसी तरह यहाँ पहुंच गया!

मेरा यहाँ तक आना पहले से तयशुदा नहीं था...

ईशा में योग के लिए टीचर ट्रेनिंग में दाखिला लेने से पहले, मैं नार्वे की एक यूनिवर्सिटी में ‘काइरोप्रेक्टिक’ सीखने के लिए एडमिशन लेना चाहता था। आनलाइन आवेदन सबमिट करने का आखिरी दिन था, मैंने आवेदन भर तो दिया, लेकिन ‘सबमिट’ का बटन क्लिक करने से पहले मैं सोच में पड़ गया। मन के किसी कोने में कहीं न कहीं योग छिपा था। पिछले दो महीनों के दौरान मैंने एक सही योग टीचर ट्रेनिंग स्कूल खोजने की कोशिश में लगा रहा था, पर ऐसा कोई नहीं मिला जो दिल को छू सके।

सबमिट बटन दबाने से पहले, मैंने वेब पर एक और बार सर्च करने की सोची। इस बार मैं ईशा हठ योग स्कूल की साइट पर जा पहुँचा। कुछ ऐसा था जिसने मुझे इस हद तक प्रभावित किया कि मैं सब भूल कर, उसी क्षण ईशा कोर्स के लिए आवेदन कर दिया। मजे की बात यह कि उस समय मैं ईशा के बारे में या सद्‌गुरु के बारे में कुछ भी नहीं जानता था।

आवेदन करने के बाद, मैंने सद्‌गुरु को यू ट्यूब पर देखा और उन्हें जितना सुनता गया, मेरा यकीन मजबूत होता गया कि मेरा चुनाव सही था। तब मेरे साथ कुछ विचित्र सा घटित होने लगा। जब मैं सद्‌गुरु को यू ट्यूब पर नियमित तौर पर सुनने लगा तो मैंने महसूस किया कि मेरे बहुत सारे नकारात्मक प्रभाव खुद-ब-खुद दूर होते जा रहे हैं।

भारत जाने से दो दिन पहले मुझे एक पार्टी में जाने का न्यौता मिला जिसमें शराब और कुछ दूसरी नशीली चीजें परोसी जानी थी। लेकिन मेरे मन में इस तरह की चीजों का आकर्षण खत्म हो चुका था। ऐसा शायद इसलिए हो रहा था, क्योंकि मुझे उससे भी कुछ ऊँचा मिल गया था!

मैं अपने फैसले से बहुत खुश हूँ। इसके सिवा कुछ और बेहतर हो ही नहीं सकता था। अगर मैं कुछ और चुनता तो वह मेरे लिए पूरी तरह से गलत होता।

2. अचानक मैंने महसूस किया, कि मेरा जीवन बदल गया था

मैं जिस दिन भारत आया, जैटलैग का असर था और मन स्थिर नहीं था। उसी दिन से कार्यक्रम आरंभ होना था। फिर यह ट्रेनिंग लगातार पूरे पांच माह तक चली। मुझे कुछ पता नहीं था कि मेरे साथ क्या हो रहा है, मैं क्या सीख रहा हूं, क्या छोड़ रहा हूं, कुछ पता नहीं था - भाव आए और चले गए, विचार आए और चले गए। मैं हँसा, रोया, संघर्ष किया, खीझा, भावुक हुआ, आनंद लिया,... और पांच माह का समय बीत गया। अचानक, मैंने महसूस किया कि मैं पूरी तरह से बदल चुका हूं। मेरा जीवन और जीने का संदर्भ पूरी तरह से बदल गया था।

मैंने ज्यादा लचीला हो जाने की उम्मीद की थी पर भावनाओं से भरी ऐसी रोलरकोस्टर की सवारी के बारे में नहीं सोचा था...

3. यह अजीब लेकिन सत्य है

मैं जानता था कि मुझे बहुत कुछ सीखना होगा, परंतु किसने सोचा था कि यह इतना गहन होगा...

ट्रेनिंग के कुछ महिनों बाद, हम आश्रम के बाहर कुछ काम कर रहे थे, तभी मेरी रीढ़ की हड्डी में चोट आ गई। मुझे चार सप्ताह तक आराम करने को कहा गया। यह मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं था। मैं खुद को उस प्रक्रिया के लिए पूरी तरह से समर्पित कर चुका था और अब ऐसा लग रहा था मानो किसी ने मेरा सपना तोड़ दिया हो। मेरा दिल टूट चुका था और मैं बहुत दुखी था कि मैं अभ्यास नहीं कर सका। लेकिन आश्रम के माहौल में कुछ ऐसा था, जिसने मुझे संभाले रखा। मैं दोस्तों, अध्यापकों, डॉक्टरों और स्वयंसेवकों से मिलने वाले सहयोग से अभिभूत(गहराई से भावुक) था। इस मुश्किल हालात में उन्होंने मेरी मदद की, और आखिर में मैं अपनी ट्रेनिंग पूरी कर पाया।

हालांकि मैं अभ्यास नहीं कर पाया पर यह हैरानी की बात थी कि वे जो भी सिखा रहे थे, वह पूरी गहराई के साथ मेरे भीतर समा रहा था। केवल उस माहौल में रहने और टीचर्स को बोलते हुए देखकर हमने सीखा कि हमें कैसे पढ़ाना है, और सबसे बढ़कर खुद कैसा होना है।

यह सब सीखने की नहीं अनुभव करने की बात थी।

4. ‘बात केवल लचीलेपन की नहीं थी’

शुरु में मैं अपने शरीर के लचीलेपन को लेकर परेशानी में था। लेकिन जब पिछले बैच के एक छात्र ने अपनी कक्षा का अनुभव सुनाया तो सब कुछ बदल गया।

‘एक छात्रा वर्षों से, हठ योग के कई आसनों के अभ्यास के बाद भी झुककर धरती को नहीं छू पाती था। एक दिन, सद्‌गुरु ने कक्षा में उसकी परेशानी को समझा और उसे आगे आ कर आसन करने को कहा। चमत्कारिक रूप से, उसने सद्‌गुरु की ओर से कोई भी निर्देश लिए बिना, बड़े आराम से आसन पूरा कर लिया। तब हम सब समझ गए कि यह सब लचीलेपन का कमाल नहीं है। दरअसल हमारी भौतिकता की अनेक परतें होती हैं।’

धीरे-धीरे, मेरे साथ भौतिक स्तर पर जो घटित हो रहा था, उसका महत्व घटने लगा था। ऐसा लग रहा था मानो मेरे भीतर कुछ अद्भुत हो रहा हो। जब भी मैं अभ्यास करता, मेरे भीतर आनंद का सोता उमड़ जाता। दरअसल मैंने लचीलेपन के बारे में सोचना ही बंद कर दिया था। खैर, आखिर में मेरा शरीर पहले से कहीं मजबूत हुआ और उसकी चुस्ती व ताकत में भी सुधार आ गया।

यह तो तय है कि बहुत तोड़-मरोड़ होगी, पर ये लचीलापन ही सब कुछ नहीं है...

5. महसूस करने के लिए सीखना था, सोचने के लिए नहीं

एक स्त्री होने के बावजूद मेरा शरीर हमेशा बलिष्ठ और मांसल रहा है। अब मैं देखती हूँ कि मेरा शरीर उस रूप में ढल गया है, जैसा मेरे भीतर जीवन को सहजता से बहने के लिए होना चाहिए। अब यह उस तरह से नहीं है, जैसा इसे मेरे अनुसार होना चाहिए था। मेरे लिए जीवन का द्वार बेहद शानदार तरीके से खुल गया है। अब मैं अपने शरीर को भी अलग तरह समझने लगी हूँ। मैं बहुत आनंदित अनुभव करती हूँ। हम हठ योग टीचर ट्रेनी सारा दिन बेवजह बच्चों की तरह खिलखिलाते रहते हैं। भले ही तार्किक मन को यह सुनने में अजीब लगे, पर ऐेसे रहना अच्छा लगता है। मैंने बचपन से ही महसूस करना नहीं सीखा था, मैने हमेशा जीवन के बारे में सोचना सीखा। अब मैं महसूस कर सकती हूँ कि जीवन अद्भुत है, मैं इसकी जीवंतता को महसूस कर सकती हूँ। मैं इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ले जाना चाहती हूँ, हालांकि मुझे लगता है कि मैंने यहां से जो पाया है, उसका एहसान मैं कभी नहीं उतार सकूँगी।

‘भले ही यह तर्कशील मन को विचित्र लगे, परंतु इस तरह रहना बहुत अच्छा लगता है।’

6. कौन जानता था कि सलादों में दिव्यता छिपी होगी!’

मैं मांस खाता था - बहुत मांस खाता था - और घर का बना स्वादिष्ट और बहुत सारा भोजन खाता था। मुझे चिंता थी कि कहीं शाकाहारी बन कर मैं कमजोर न हो जाऊँ, पूरे पांच महिनों तक अंडे भी नहीं खाने थे। मैंने अपने देश में कई शाकाहारी देखे थे, जो बेहद दुबले और मरियल थे। मुझे यह यकीन भी नहीं था कि शाकाहारी भोजन का स्वाद मुझे पसंद आएगा। लेकिन जब मैं आश्रम गया तो मुझे वहां के भोजन से प्यार हो गया।

पहले महिने में सारी दिक्कत यही थी कि मैं बहुत सारा खाना खाता था। लेकिन पांच महिनों के बाद, मेरा वज़न उतना ही था, जितना कार्यक्रम में शामिल होने से पहले था।

एक ख़ास ईशा योग कार्यक्रम का हिस्सा बनने के बाद मेरा योगाभ्यास बहुत आनंददायक हो गया था। एक बार, शाम के अभ्यास सत्र के बाद, जब मैंने आंखें खोलीं तो मुझे लगा कि मैंने केवल कुछ मिनटों के लिए अपनी आंखें बंद की थी, लेकिन असल में चालीस मिनट बीत गए थे। मैं सीधा डाइनिंग के लिए भागा क्योंकि मुझे डर था कि कहीं रात का योग सत्र न छूट जाए। पर उस जगह बैठ कर लगा कि मुझे तो भूख ही नहीं है। ज्यों ही मैंने अपने सलाद का पहला टुकड़ा मुँह में डाला, मैं रोने लगा। मैं नहीं जानता कि मैं क्यों रोया, पर मुझे सलाद के लिए दुख हुआ। बाद में, मुझे सलाद के लिए अपने भाव मजाकिया लगे पर उस समय ऐसा संपर्क जुड़ा कि सलाद ही मेरे लिए जीवंत हो गया था, और मैं उसे महसूस किए बिना नहीं खा सकता था।

‘मुझे लगता था कि मैं जानती हूं कि खुशी क्या होती है, लेकिन तब तक मैंने केले से बना सलाद नहीं खाया था।’

7. ‘बस आँसू खुद ही बहने लगे’

सारी प्रक्रिया ने मुझे अपने आसपास के जीवन के प्रति बहुत ही ग्रहणशील बना दिया था। कोर्स के दौरान, जब भी सद्गुरु को सुनता, तो मेरी आँखों में आँसू होते। इसके बाद जिस भी चीज को छूता, देखता, वही मेरे लिए इतनी जीवंत हो जाती, जितनी जीवन में पहले कभी नहीं रही थी। सूर्यकुंड(ऊर्जा से भरे पानी का कुण्ड) से बाहर आने के बाद मैं सूर्य को महसूस कर सकता था। अगर किसी पौधे को छूता, तो वह मुझे अलग सा जान पड़ता, मैं उसके भीतर जीवन को महसूस कर सकता था। मैं धरती पर बैठ कर, उसे महसूस करता और आँखों में आनंद के आँसू उमड़ आते।

आखिरी दिन, मुझे दो अध्यापकों से हठ योग टीचर सर्टिफिकेट मिलने की बहुत खुशी थी पर जैसे ही मेरी आँखें तीसरे टीचर से मिलीं, मैं अपनी आँखों में छलक आए आँसू नहीं रोक सका। मेरे साथ जो भी हुआ, मैं उसमें से कुछ भी किसी को समझा नहीं सकता...

हम एक रूपांतरणकारी प्रक्रिया के रूप में हठ योग की शिक्षा देते हैं। यह रूपांतरण केवल आपके शरीर के स्तर पर नहीं, बल्कि आप जैसे हैं, उसको लेकर होता है।’ - सद्‌गुरु
 
 
 
 
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