32 देशों से, 800 से भी ज्यादा प्रतिभागी, ईशा योग सेंटर के प्राणप्रतिष्ठित स्थान में, अपने विकास हेतु 7 महीनों का समय एक साथ बिताने के लिये आते हैं।

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साधनापद में जीवन : सभी लेख

ईशा योग सेंटर, हमेशा से हर उम्र के युवाओं के लिये, एक आकर्षक स्थान रहा है। आज युवाओं को ऐसे अवसर मिल रहे हैं जिनका एक दशक पहले सपना भी नहीं देखा जा सकता था। बहुत सारे युवाओं ने तकनीकी क्षमताओं की शक्ति के साथ और एक परिपूर्ण जीवन जीने की इच्छा से नये कारोबारों तथा नौकरियों में हाथ आज़माया, पर उनके हाथ निराशा ही लगी। अपने आप को एक दौराहे पर पाते हुए, वे हैरत में हैं और समझ नहीं पा रहे कि आगे क्या करें? वे बढ़ना चाहते हैं, विकास करना चाहते हैं, कुछ ढूंढना, कुछ नया पाना चाहते हैं! शायद यही समय है किसी अलग प्रकार के साहस का! शायद यह समय है - साधनापद का !!!

अंतरराष्ट्रीय मोटर रेस में भाग लेने वाले एक चालक ने एक बार कहा था, "अगर सब कुछ आप के नियंत्रण में है, तो आप बहुत तेज नहीं जा रहे हैं!" आप पहले जो कर रहे थे, उसकी तुलना में साधनापद कैसा लगता है?

"मैं कहूंगी कि साधनापद से पहले मैं साहसिक कार्य की परिभाषा नहीं जानती थी। इसे समझने में मुझे थोड़ा समय लगा, पर अब जब मैं जान गयी हूँ कि जो आने वाला है उसके बारे में कुछ न जानना ही रोमांचक है, और ये कोई डरने वाली बात नहीं है, तो ये अद्भुत हो गया है। मैं कुछ साहसिक कार्य करने के लिये उतावली थी, और वो मुझे निश्चित रूप से मिल गया है।” - जोवाना बैलोनोविक, 31, समाज शास्त्री, न्यूज़ीलैंड

"मैं अब ज्यादा गतिशील हो गयी हूँ। पहले, अपने जीवन में कुछ भी नया करने से पहले मैं डरती थी कि मैं ये कर पाऊँगी या नहीं? अब ये डर चला गया है क्योंकि अब मुझे ये लगता है कि हर दिन मैं इससे कुछ नया सीखने वाली हूँ, जो मैंने पहले कभी नहीं किया था।"- रेखा वर्मा, 28, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, हरियाणा

"अब मेरी वापस जाने की इच्छा नहीं है। इस बात में मुझे अब कोई तुक नज़र नहीं आती कि मानव का करोड़ों वर्षों का विकास सिर्फ धन कमाने के लिये कागज़ पत्रों को यहाँ से वहाँ ढकेलने में ही समाप्त हो जाये। अगर मैं अपनी पहले वाली नौकरी ही कर रहा होता तो कोई बात नहीं थी, पर एक बार यहाँ आने के बाद मैं फिर से वही नौकरी करूँ तो यह एक भयंकर त्रासदी होगी।" - अभिनव तिवारी, 28, कॉरपोरेट वकील, महाराष्ट्र

"मुझे लगता है कि अब मैं ज्यादा काम करने के लिये तैयार हूँ, और इसका अनुभव अधिक आनंदमय एवं सुखपूर्ण अवस्था में कर रही हूँ। और ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि पहले, डर के कारण अपने जो सपने मैंने बंद करके रखे हुए थे, उनको पूरा करने के लिये अब मैं प्रेरित हो गयी हूँ। नयी राहों को खोजने के लिये अब मैं नई स्पष्टता एवं संतुलन के साथ उत्साहित हूँ, जो अब मुझमें आ गयी है।"- बियाना मैकोगोन, 27, मेडिकल स्वागताधिकारी, ऑस्ट्रेलिया

साधना - क्या ये गति से हो रही है या धीरे-धीरे घिसटते हुये?

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"मैंने देखा है कि अब साधना करते हुए मैं अधिक ध्यानकेन्द्रित रहती हूँ। घर पर मैं इसे बस एक क्रिया की तरह करती थी, और कभी-कभी छोड़ भी देती थी। यहाँ आने के बाद मुझे 'बस सिर्फ इसे करने' और 'इसे पूरी तरह से करने' में अंतर मालूम पड़ा।" - रेखा वर्मा, 28, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, हरियाणा

"साधना मेरे जीवन का इस तरह से एक भाग बन गयी है कि अब मुझे साधना करनी नहीं पड़ती, मैं अब साधना करना चाहता हूँ।" - जीवा एल. टी. धर्मा, 30, डिज़ाइन इंजीनियर, तमिलनाडु

"साधना के बिना मैं अपने दिन की शुरुआत नहीं करता। जिन दिनों मेरी तबियत ठीक नहीं होती तब भी मैं अपनी क्रियायें नहीं छोड़ता।" - शंकर, 28, उद्यमी, हरियाणा

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यहाँ रहते हुए क्या आप किसी सनक, लत या विवशता से मुक्ति पाना चाहते थे?

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"यहाँ रहने से मुझे अपनी बहुत सारी बातों पर पकड़ ढीली करने में मदद मिली है, खास तौर से दूसरे लोगों से सम्मति लेने की मेरी ज़रूरत पर। मैं परिवार और मित्रों के साथ बहुत गहरे रूप से जुड़ी थी (जो कि बुरी बात नहीं है), पर इसकी वजह से मेरे अंदर बहुत असुरक्षा की भावना बन गयी थी, और इसने बाकी की दुनिया से मुझे दूर कर दिया था। अब, आश्रम में मैं किसी से भी मिलती हूँ तो उसके साथ मुझे आराम, गर्मजोशी और प्रेरणा मिलने का अनुभव होता है। धीरे-धीरे मुझे पता लग रहा है कि वास्तव में सर्वसमावेशी होने का क्या अर्थ है।"- जोवाना बैलोनोविक, 31, समाज शास्त्री, न्यूज़ीलैंड

"किसी विशेष चीज़ या कारण से नहीं, पर डरना और निराशावादी होना मेरा जीवन हो गया था। ये मुझे कुचल रहा था। अब वो बात खत्म होनी शुरू हो गयी है। अब मैं ज्यादा अच्छा महसूस करता हूँ, और अच्छे से साँस ले पाता हूँ। अपने अंदर अब मैं घुटन महसूस नहीं करता।" - अभिनव तिवारी, 28, कॉरपोरेट वकील, महाराष्ट्र

"जी हाँ, यहाँ आ कर मेरी हमेशा रेस्तरां का खाना खाने की लालसा, मोबाईल गेमिंग और दिन में 10 घंटे सोने की लत छूट गयी है। साधनापद ने मुझे मेरी लतों से बाहर निकलने का रास्ता साफ कर दिया।" - जीवा एल. टी. धर्मा, 30, डिज़ाइन इंजीनियर, तमिलनाडु

"मैं यहाँ आने से पहले ऐसी थी कि बोलती कम थी पर सोचती बहुत ज्यादा थी। किसी को पता नहीं चलता था कि मेरे दिमाग में क्या नाटक चलता रहता था! एक तरह से ये ऐसा सिनेमा था जो हर समय चलता ही रहता था। अब, मैं अपने विचारों के प्रति ज्यादा जागरूक हो रही हूँ - क्या ज़रूरी है और क्या नहीं। मेरे अंदर स्थिरता बढ़ रही है।" - रेखा वर्मा, 28, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, हरियाणा

"ये आसान नहीं है - और मैं अपनी पुरानी आदतों के बारे में बहुत ज्यादा मनोचित्रण करती रही हूँ। पर यहाँ अब, जब कि सत्र की समाप्ति का समय है, मेरे पास वर्णन करने के लिये शब्द नहीं हैं कि मुझमें कितना कुछ बदल गया है जिसने मेरे जीवन को रूपांतरित कर दिया है। मैं अब इतना ज्यादा जागृत रहती हूँ, ज्यादा जीवंत, जागरूक, आनन्दपूर्ण, सक्रिय और तैयार! अब मेरी जीवन पद्धति ये है कि जो मेरे लिए महत्त्वपूर्ण है मैं उन चीजों के साथ ही जुड़ी रहती हूँ, जबकि पहले मैं केवल दुःखद अनुभवों से ख़ुद को बचाने में ही लगी रहती थी।" - जोवाना बैलोनोविक, 31, समाज शास्त्री, न्यूज़ीलैंड

पिछले 7 महीनों में, क्या केवल आपकी उम्र बड़ी है या आप ज्यादा बुद्धिमान हो गए हैं?

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"आश्रम में लोगों के काम और आदतों के आधार पर मैं अधिकतर लोगों की उम्र के बारे में अंदाजा नहीं लगा पाता था। ऐसा लगता था कि मैं हमउम्र लोगों की एक ही कक्षा का हिस्सा हूँ। हम हरेक के साथ एक जैसे विचार एवं अनुभव साझा करते थे। हमारे लिये, तैयारी एवं परिस्थिति को स्वीकार कर लेना एक सामान्य विषय था।" - जीवा एल. टी. धर्मा, 30, डिज़ाइन इंजीनियर, तमिलनाडु

"कई बार ऐसा लगता है कि हम एक बड़े कॉलेज कैंपस में हैं। मित्र बनाना, अनुभवों एवं कार्यक्रमों को साझा करना, अपनी सीमाओं का विस्तार करते जाना और ये सब काम स्वयंसेवकों के एक अद्भुत दल के मार्गदर्शन में करना, यही सब हो रहा था। मेरे लिये ज्यादा प्रभावशाली बात यह रही कि जो लोग मेरे उम्र वर्ग में नहीं थे, उनके साथ भी बातचीत करना और उनका भी अनुभव वैसे ही करना जैसे कि वो हमउम्र हों। ये उस बात का एक सुखद पुनः स्मरण था कि उम्र आखिर तो सूर्य के चारों ओर के चक्करों की संख्या ही है, और ये किसी जीव के बारे में नहीं है।" - बियाना मैकोगोन, 27, मेडिकल स्वागताधिकारी, ऑस्ट्रेलिया

"मैं 31 वर्ष की हूँ, तो यहाँ मेरे साथ रहने और काम करने वाले अधिकतर लोग मुझसे छोटे ही हैं। पर, ईमानदारी से कह रही हूँ, उम्र यहाँ किसी तरह का कोई मुद्दा नहीं है। अगर कोई बात है तो वो ये है कि मुझे यह देखने को मिला है कि कैसे हर व्यक्ति अपने आप में अनोखा है। जब मैं उनके साथ होती हूँ तो उनकी उम्र तथा राष्ट्रीयता, उनका लिंग ये सब मुद्दे गायब हो जाते हैं और मैं बस उस व्यक्ति के साथ होती हूँ। यहाँ मैंने अपने से छोटे बहुत सारे लोगों के साथ बातचीत की है, जितनी बाहर कभी नहीं की थी और अब मैं अपने आप को ज्यादा युवा महसूस करती हूँ।" - जोवाना बैलोनोविक, 31, समाज शास्त्री, न्यूज़ीलैंड

"यहाँ बहुत अच्छा तालमेल है जिससे सब के साथ घुल मिल जाना आसान है। हर कोई यहाँ उसी कारण से है, जिससे मैं हूँ - हरसंभव विकसित होना। उनमें से बहुत से लोग काफी निपुण हैं और उनमें बहुत सी अलग अलग किस्म की क्षमतायें हैं। मैंने यह भी देखा कि इन सब ने मुझे काफी समृद्ध किया है। वे हर समय पूरी तरह से काम में लगे रहते हैं - सुबह 4.30 बजे से रात के 10 बजे तक। और, उनके लिये कोई सप्ताहांत अवकाश भी नहीं है, न कोई अन्य छुट्टी, न ही कोई उत्प्रेरक या कोई प्रोत्साहन। और उन्हें कभी कोई शिकायतें भी नहीं होतीं।" - कीरथी वडलाकोंडा, 28, अंतरराष्ट्रीय टैक्स सलाहकार, न्यूयॉर्क

अगले साधनापद के संभावित प्रतिभागियों के लिये अनुभव के बोल

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"मैं हर किसी को सलाह दूँगी कि अगर वे अपनी क्षमता को पूर्ण रूप से विकसित करना चाहते हैं तो वे यह कदम (साधनापद में 7 महीने रहने का) अवश्य उठायें। वैसे, व्यक्तिगत रूप से मैं जानती हूँ कि लोगों को दी हुई सलाहों पर आसानी से विश्वास नहीं होता जब तक वे अपने सामने कोई जीवित उदाहरण न देख लें। अतः, मैं यहाँ से अपने साथ वो सब ले जाना चाहूंगी जो मैंने यहाँ सीखा है, जिससे लोग मुझमें आये परिवर्तन को देख सकें - एक जीवित उदाहरण।" - रेखा वर्मा, 28, सॉफ्टवेयर इंजीनयर, हरियाणा

"अगर आप जीने की योजना बना रहे हैं तो यही समय है। जो कोई भी अपने आप में स्पष्टता, संतुलन और स्थिरता ढाल लेता है, उसके लिये जीवन एक सहज खेल हो जाता है।" - जीवा एल. टी. धर्मा, 30, डिज़ाइन इंजीनियर, तमिलनाडु

"मेरा कहना ये है कि आप की उम्र चाहे जो हो, मेरी सलाह ये है कि आप पूरी ईमानदारी से (पर ज्यादा गंभीर हो कर नहीं) और अपने हृदय में कोमलता, संवेदनशीलता रखते हुए विचार करें कि क्या मेरे जीवन में ऐसा कुछ है, जो अगर मैं न करूं तो मेरा जीवन व्यर्थ होगा? यदि जवाब हाँ में है और आप वो नहीं कर रहे हैं तो साधनापद एक जादुई रास्ता है, जो आप को आप के मार्ग पर ले जायेगा।" - जोवाना बैलोनोविक, 31, समाज शास्त्री, न्यूज़ीलैंड

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