देवी शेट्टी: आज जब मैं डॉक्टरों की युवा पीढ़ी को देखता हूँ, चिकित्सकीय विज्ञान आज उस स्तर पर आ गया है कि हमें वास्तव में रोगी को छूने की भी ज़रूरत नहीं है। मैं जब अपने कार्यालय में किसी रोगी को देखता हूँ तो वो पहले ही सभी प्रकार के परीक्षणों से गुज़र चुका होता है। सभी रिपोर्ट्स दिख रहे होते हैं, पूरा इतिहास लिखा होता है, हर चीज़ की योजना बन चुकी होती है। तकनीकी रूप से, मैं बस रिपोर्ट्स देख कर रोगी को बता सकता हूँ, "आप को बायपास सर्जरी की ज़रूरत है" या "आप को वॉल्व बदलने की ज़रूरत है"। पर मैं हमेशा एक काम करता हूँ। मैं स्टेथोस्कोप ले कर उसकी छाती पर रखता हूँ, हृदय की धड़कनों को सुनता हूँ, उसकी आँखों में देखता हूँ, उसके कंधों पर हाथ रखता हूँ, उसे स्पर्श करता हूँ, फिर रोगी को सब समझाता हूँ तथा उसके परिवार से बात करता हूँ। मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है कि हमने जिन चीज़ों का आविष्कार किया है, उनकी अपेक्षा स्पर्श में ठीक करने की ज्यादा शक्ति है। क्या आप इसमें विश्वास करते हैं?

दो बंदर एक दंपत्ति के रूप में रह रहे हैं। अगर आप उनमें से एक को अलग, एकांत में रख दें तो उस बंदर को हॄदय की समस्यायें हो जाती हैं

सद्‌गुरु: जी हाँ! युवा डॉक्टरों को ये शायद मालूम न हो पर कोई ऐसा नया सॉफ्टवेयर बना सकता है जो सारे परीक्षणों को पढ़ कर स्वयं ही रोग का निदान बता दे। आप उसमें पूरी चिकित्सकीय पुस्तक भर सकते हैं और फिर आप को किसी डॉक्टर की ज़रूरत नहीं होगी। कोई स्पर्श नहीं!

देवी शेट्टी : ये ऐसा ही है !

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सद्‌गुरु: लोग जो बात समझ नहीं रहे हैं - हाँ, हमारा एक भाग यांत्रिक है, पर अन्य आयाम भी हैं। जब यांत्रिक भाग में कुछ गड़बड़ होती है, तो ज़्यादातर ये इसलिये होता है कि हमनें अन्य आयामों की ओर ध्यान नहीं दिया है। इस बारे में काफी अध्ययन किये गये हैं, उदाहरण के लिये, दो बंदर एक दंपत्ति के रूप में रह रहे हैं। अगर आप उनमें से एक को अलग, एकांत में रख दें तो उस बंदर को हॄदय की समस्यायें हो जाती हैं, धमनियों में कोलेस्ट्रॉल की मोती परत जम जाती है और इस तरह की अन्य बातें होती हैं। अब ये मालूम करने के लिये उन दो बंदरों का जीवन खराब करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। बहुत सारे मनुष्यों को रोज़ाना ऐसी समस्यायें हो रही हैं। तो इसमें कमी जो है, वह मूल रूप से यह है कि मनुष्यों के जीवन को कुछ छू नहीं रहा है। शारीरिक स्पर्श केवल एक अभिव्यक्ति है, ऐसी और भी बातें हैं।

ये ज़रूरी नहीं कि यह कोई रिश्ता ही हो - कितनी ही चीज़ें हमारे जीवन को छू सकती हैं। आप ने सूर्योदय, सूर्यास्त या चंद्रोदय आखिरी बार कब देखा था? शायद कई दशक पहले। और आखिरी बार ऐसा कब हुआ था कि आप ने किसी फूल के खिलने का इंतज़ार किया था? पिछली बार आप ने कब एक तितली या एक पत्ती या फूल या किसी मनुष्य की ओर ध्यान दिया था? पर आप को चेहरे पसंद नहीं हैं, आप को बस फेसबुक पसंद है। जीवन के साथ संबंध कम हुआ है, चाहे वो मनुष्य के साथ हो, पशु, पेड़-पौधे, या आसपास के अन्य तत्व हों। कितने लोग पूर्ण भागीदारी के साथ, एक क्षण के लिये भी, अपने उस भोजन पर नज़र डालते हैं जिसे वे खाने वाले हैं ? क्या वह उनको छूता है? नहीं! जब चीजें गड़बड़ हो जाती हैं तब कोई डॉक्टर या फिर अंत में अंतिम संस्कार करने वाला ही उन्हें छूता है।

योग से कायाकल्प

क्या स्पर्श में कोई प्रासंगिकता है? जी हाँ, जबरदस्त प्रासंगिकता है। स्पर्श हमेशा शारीरिक होना ज़रूरी नहीं है। ये कई प्रकार के हो सकते हैं। अगर जीवन आपको नहीं छूता, तो आप एक जीवंत जीवन नहीं हैं, आप धीरे धीरे मृत हो रहे जीवन हैं। ये एक सामान्य चिकित्सकीय ज्ञान है कि आप के शरीर में कोशिकाओं की संख्या आकाश गंगा के तारों से भी अधिक है। हर दिन आप के शरीर में लाखों कोशिकायें मर रही हैं और उतनी ही नयी कोशिकायें जन्म ले रही हैं। पुरानी कोशिकाओं की बात छोड़िये, आप बस यदि इन नयी कोशिकाओं को संभाल लेते हैं, जो आप के शरीर में हर सेकंड में आ रही हैं, अगर आप का कुछ भी प्रभाव इन कोशिकाओं के जन्म लेने पर हो और आप उन्हें सही ढंग से संरचित कर सकें तो आप का हृदय, आप का मस्तिष्क, सब कुछ ठीक रहेगा। आप के पास इस स्तर की संभावना है - आप प्रत्येक सेकंड में अपने जीवन का कायाकल्प कर सकते हैं। पर ये नहीं होता क्योंकि आप जीवन के प्रति पूर्णतः उदासीन हैं। अधिकांश समय, आप के विचार तथा आप की भावनायें ही आप पर हावी होती हैं।

सारे ब्रह्मांड में, इस अंतहीन अंतरिक्ष में, सब कुछ बढ़िया हो रहा है। पर आप के दिमाग में एक छोटा सा दुष्ट विचार रेंग रहा है और आप सोचते हैं, "आज का दिन ही खराब है"।

सही दृष्टिकोण

विचार और भावनायें एक मनोवैज्ञानिक नाटक के सिवा कुछ भी नहीं हैं - अस्तित्व की दृष्टि से उनकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। यहाँ बैठे हज़ारों लोग हज़ारों अलग अलग दुनियाओं में हो सकते हैं - इसका अर्थ है कि उनमें से कोई भी वास्तविकता में नहीं है। आप जीवन को अनुभव ही नहीं करते - आप सिर्फ सोच रहे होते हैं और अपने आसपास की परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया दे रहे होते हैं। आज सुबह सूर्य अपने समय पर उदित हुआ। आप सोचेंगे, "तो इसमें क्या"? लेकिन अगर कल ठीक समय पर सूर्योदय न हो तो इस धरती पर कुछ समय बाद जीवन ही अस्तित्व में नहीं रहेगा। पर आज सुबह सूर्य ठीक समय पर ऊपर आया, सौर व्यवस्था में कोई भी ग्रह एक दूसरे से नहीं टकराये। सारे ब्रह्मांड में, इस अंतहीन अंतरिक्ष में, सब कुछ बढ़िया हो रहा है। पर आप के दिमाग में एक छोटा सा दुष्ट विचार रेंग रहा है और आप सोचते हैं, "आज का दिन ही खराब है"। जीवन के बारे में आप ने परिप्रेक्ष्य ही खो दिया है। ये एक प्रकार का पागलपन है। जब आप इस बारे में अपना दृष्टिकोण ही खो देते हैं कि "आप कौन हैं", और इस अस्तित्व में आप का स्थान और आप की प्रतिष्ठा क्या है, तो आप बीमार हैं। भले ही किसी डॉक्टर ने आप को यह ना बताया हो, पर ये प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। एक दिन ये इस प्रकार अभिव्यक्त होगी, जब उसके उपकरण और उसका स्पर्श उसको बतायेंगे कि आप बीमार हैं और फिर वे आप को दवाईयों का पर्चा अथवा शल्यक्रिया देंगे। आप उस तरफ जाने के लिये बहुत कठोर प्रयत्न कर रहे हैं। एक विचार या भावना होने की बजाय आप एक जीवन बन जाईये - बस जीवन। अगर आप विचारों, मान्यताओं और भावनाओं का एक पुलिंदा बन कर न रह जायें और यहाँ सिर्फ एक जीवन बन कर रहें - बस धड़कने वाला, सक्रिय जीवन - तो जीवन को जानना एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाता है।

 

 

Editor’s Note: Excerpted from Sadhguru’s discourse at the Isha Hatha Yoga School’s 21-week Hatha Yoga Teacher Training program. The program offers an unparalleled opportunity to acquire a profound understanding of the yogic system and the proficiency to teach Hatha Yoga. The next 21-week session begins on July 16 to Dec 11, 2019. For more information, visit www.ishahathayoga.com or mail info@ishahatayoga.com