आध्यात्मिक दीक्षा – खुद को वंश के प्रभावों से बचाने का तरीका

कुछ ऐसे यौगिक अभ्यास होते हैं, जैसे शाम्भवी महामुद्रा क्रिया, जिनकी दीक्षा दी जाती है। कैसे असर करती है आध्यात्मिक दीक्षा ?
आध्यात्मिक दीक्षा – खुद को वंश के प्रभावों से बचाने का तरीका
 

प्रश्न: सद्गुरू, अपनी क्रियाएं शुरू करने के बाद मेरे शरीर में बहुत से बदलाव आने लगे हैं, जो एक डॉक्टर के रूप में मेरी समझ से परे हैं। मैं जानता हूं कि यह एक अंदर से घटित होने वाली प्रक्रिया है जो बेहद शानदार भी है। लेकिन उसका मतलब समझना थोड़ा मुश्किल है। शायद आप समझा सकें कि कर्म की कुछ परतें टूटने या नई ऊर्जा पाने पर शरीर पर क्या असर पड़ता है। मेरे साथ क्या घटित हो रहा होगा?

ऊर्जा के बदलाव से शरीर पर गहरा असर पड़ सकता है

सद्‌गुरु: आपके साथ क्या हो रहा होगा, इस पर व्यक्तिगत रूप से देखे जाने की जरूरत है। मगर यह संभव है कि शरीर में जबर्दस्त बदलाव हो सकते हैं। मैं आपको दिखा सकता हूं कि शक्तिशाली दीक्षा से गुजरने पर चौबीस घंटों के अंदर कई लोगों के चेहरे बदल जाते हैं। वे चौबीस घंटे पहले जैसे दिखते थे, उससे काफी अलग दिखने लगेंगे। शरीर में इतना बदलाव आ सकता है।

मैं अपने अनुभव अधिक अच्छी तरह बता सकता हूं। जब पैंतीस साल पहले मेरे अंदर चीजें घटित हुईं, तो मेरे शरीर से जुड़ी हर चीज में बदलाव आ गया। मेरे बदलाव दूसरे लोगों को साफ-साफ दिखाई दे रहे थे। आवाज में बदलाव आने वाली उम्र मैं पार कर चुका था, फिर भी मेरी आवाज बहुत अलग तरीके से बदल गई। मेरी आंखों का आकार बदल गया। मेरी चाल-ढाल इतनी बदल गई कि मैं कोशिश करने के बावजूद अपने पुराने तरीके से नहीं चल पा रहा था। मेरे शरीर का आकार कई तरह के सूक्ष्म तरीकों से बदल गया। मेरे दिमाग का आकार तो निश्चित रूप से बदल गया था, इस पर कोई संदेह ही नहीं था।

संस्कार – पिछली पीढ़ियों की याददाश्त

ऊर्जा की दख़लंदाज़ी से हमारे अंदर मौजूद क्रमिक-विकास संबंधी याद्दाश्त और जेनेटिक याददाश्त पूरी तरह बदल सकती है। याद्दाश्त के ये दो आयाम ही हैं जो हमें कई रूपों में सीमित और प्रभावित करते हैं। इनके प्रभाव को आप समझ भी नहीं पाते। उससे मुक्त होना या उससे अलग होना योगाभ्यास का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है।

आप ऐसी याददाश्त से दूरी कैसे बना सकते हैं, जिसके बारे में आप जानते भी नहीं हैं, जो आपके शरीर की हर कोशिका में धड़कती है?

लोग आम तौर पर ‘संस्कार’ शब्द को गलत तरह से समझते हैं। उसे दो पहलुओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस शब्द का मतलब वह जेनेटिक याद्दाश्त है जो पिछली पीढ़ियों से हमें मिलता है। जैसे कोई प्रतिभाशाली बच्चा है, जो बचपन से ही बहुत अच्छा गाता है, तो लोग आम तौर पर उसके लिए कहते हैं, ‘अरे यह उसके संस्कार हैं जिसके कारण यह ऐसा गाता है।’ इसका अर्थ है कि उसे यह प्रतिभा कहीं और से मिली है। साथ ही, किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात किए जाने वाले अनुष्ठानों(रिचुअल) को भी संस्कार कहा जाता है।

इन दोनों अलग-अलग पहलुओं के लिए एक ही शब्द क्यों इस्तेमाल किया जाता है? क्योंकि वास्तव में उनमें कोई अंतर नहीं है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे पूर्वजों की कई स्मृतियां और अनुभव हमारे भीतर आते हैं। साथ ही, ये याददाश्त जो हमें विरासत में मिली है, वह हमारे लिए बंधन बनती है या हमारे जीवन में लाभदायक होती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इस याददाश्त से कितनी आजादी या दूरी हासिल कर पाते हैं।

आप ऐसी याददाश्त से दूरी कैसे बना सकते हैं, जिसके बारे में आप जानते भी नहीं हैं, जो आपके शरीर की हर कोशिका में धड़कती है? योगिक क्रियाओं की दीक्षा की यही अहमियत है कि इसके ज़रिए ऊर्जा का एक दखल पैदा होता है, जो एक खास तरीके से जेनेटिक याददाश्त को आप से अलग कर देता है।

मृतकों को मृतकों के लिए छोड़ दो

किसी की मृत्यु होने पर, या उनके जीवित रहते भी हम जो संस्कार करते हैं, वह आपको अपने दादा-दादी और माता-पिता की आनुवांशिक(वंश से मिलने वाली) याद्दाश्त से दूर करती है। इसे सिर्फ उन पीढि़यों के लिए नहीं किया जाता, जिन्हें आपने देखा है, जैसे माता-पिता, दादा-दादी, बल्कि उनसे पहले की पीढ़ियों के लिए भी किया जाता है।

कुछ लोग जो कुछ खास क्रियाकलाप करना चाहते हैं, वे सात से बारह पीढ़ियों तक की याददाश्त को साफ करते हैं। वैसे आम तौर पर हर कोई इस प्रक्रिया को पिछली तीन पीढ़ियों के लिए करता है। भारत में यही परंपरा है।

ये संस्कार हमारे माता-पिता और दादा-दादी की याद में नहीं किए जाते। ये अपने वंश की याद्दाश्त से खुद को दूर करने की कोशिश है, क्योंकि हम एक फ़्रेश जीवन हो जाना चाहते हैं। हम पिछले जीवनों की रिसाइक्लिंग नहीं होना चाहते। हम अपनी किस्मत खुद गढ़ना चाहते हैं। संस्कारों को इसी मक़सद से किया जाता है, इसलिए जेनेटिक याद्दाश्त तथा उससे दूर करने में मदद करने वाले अनुष्ठानों(रिचुअल), दोनों के लिए एक ही शब्द इस्तेमाल किया जाता है।

मेरे ख्याल से इससे सबसे अधिक मिलती-जुलती चीज जो कही गई है, जिसके बारे में पश्चिमी दुनिया के लोग जानते हैं, कि ईसामसीह ने कहा, ‘मृतकों को मृतकों के लिए छोड़ दो।’ मृतकों को मृतकों के लिए छोड़ देना आसान नहीं है क्योंकि मृतक आपके अंदर जीवित रहते हैं। जेनेटिक याद्दाश्त का यही मतलब है। आप देखेंगे कि अगर आप कौन हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है, तो बच्चे पैदा करना भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह आपकी विरासत है। आप अपने बाद कई लोगों में अपने आनुवांशिक(वंश से मिलने वाले) तत्व छोड़ना चाहते हैं ताकि आप किसी न किसी रूप में जीवित रहें। इसलिए मृतकों को कम न आंकें। वे आपके जरिये जीने की कोशिश करते हैं।

याददाश्त से जुड़े रहने से जीवन में आज़ादी नहीं रहेगी

लेकिन जब आपको एक शक्तिशाली प्रक्रिया में दीक्षित किया जाता है, जैसे शांभवी महामुद्रा क्रिया, तो उसे पूरी लगन के साथ करने पर एक ऊर्जा आपकी जेनेटिक याद्दाश्त से आपको दूर करने के लिए अपना दखल देती है। फिर आप विवशतापूर्ण चक्रों का नतीजा नहीं, बल्कि जीवन की एक सचेत प्रक्रिया बन जाते हैं। यह एक इंसान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि मानव जीवन में मुक्ति सबसे बड़ा लक्ष्य है।

यही वजह होती है कि दीक्षा के जरिए ऊर्जा की दखल दी जाती है ताकि आप अपनी याददाश्त से दूर होने में सक्षम हो जाएं।

एक इंसान सबसे अधिक कष्ट में तब होता है, जब उसकी आजादी का दम घोंटा जाता है। अगर उन्हें जीवन में बहुत सारी चीज़ें जैसे सुख-सुविधाओं और बाकी चीजें न भी दी जाएँ, तब भी वे काम चला लेंगे, वे इसे सहन कर लेंगे। बल्कि इससे वे और मजबूत हो जाएंगे। लेकिन अगर आप उनकी आजादी छीन लें तो उन्हें सबसे अधिक कष्ट होता है।

इसे मैंने खुद देखा है और वह अविश्वसनीय था। ईशा का 20 फीसदी समय और संसाधन जेलों में होने वाले ईशा योग कार्यक्रमों पर खर्च होता है। हम तमिलनाडु की सभी जेलों और अमेरिका की भी कुछ जेलों में प्रोग्राम करते हैं। जेल ऐसी जगह होती है जहां सब कुछ काफी व्यवस्थित होता है। समय पर भोजन मिलता है, लोग आपके लिए दरवाजा खोलते हैं और निश्चित रूप से उसे आपके लिए बंद भी करते हैं। वे आपके लिए लाइट ऑन करते हैं, ऑफ़ करते हैं। वह वास्तव में एक अच्छा जीवन है। बहुत से लोग जो बाहर की दुनिया में काफी कष्ट में रहते हैं, उनके लिए जेल काफी अच्छा है। लेकिन जब आप जेल में घुसते हैं, तो वहां की हवा में एक ऐसा दर्द होता है, जिसे बताया नहीं जा सकता। हर जगह कष्ट दिखता है क्योंकि बस एक चीज उनसे छीन ली गई है। उन्हें खाना, कपड़ा, सुरक्षा दी गई है, मगर आजादी छीन ली गई है। यह एक इंसान के लिए सबसे बड़ी पीड़ा है।

दीक्षा याददाश्त से दूर होने में मदद करती है

चाहे आपकी आजादी किसी भी वजह से चली गई हो, चाहे किसी और ने ले ली हो या आपकी जेनेटिक मसाले के कारण या खुद आपके तरीकों से या आपके विकास से जुड़ी याद्दाश्त की वजह से, धीरे-धीरे आपका मुंह लटक जाएगा और आप कष्ट में आ जाएंगे। आपको किसी और वजह की जरूरत नहीं है। आप कष्ट में रहेंगे और आपको वजह भी पता नहीं होगी। यही वजह होती है कि दीक्षा के जरिए ऊर्जा की दखल दी जाती है ताकि आप अपनी याददाश्त से दूर होने में सक्षम हो जाएं।

किसी के अंदर कुदरती तौर पर जो भी बदलाव होते हैं, उसके लिए आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। मगर बदलावों को जान-बूझकर लाने की कोशिश न करें क्योंकि इससे बिल्कुल अलग स्थिति पैदा हो सकती है। जो कुछ कुदरती तौर पर होता है, वह बिल्कुल ठीक है।

 
 
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