अपनी भीतरी और बाहरी स्थिति की ज़िम्मेदारी लेना

सद्गुरु कहते हैं कि आज की दुनिया में अधिकतर लोग अपने और आसपास की सभी वस्तुओं के बीच के संबंध को भूल गये हैं। वे यहाँ समझा रहे हैं कि अगर हम मानवीय और ब्रम्हांडीय शरीरों की एक दूसरे पर निर्भरता को समझ लें तो हम सजग होकर इस धरती को आने वाली आपदा से बचाने के लिये ज़रूरी कदम उठा सकते हैं।
अपनी भीतरी और बाहरी स्थिति की ज़िम्मेदारी लेना
 

सद्‌गुरु: आप अपने आसपास की हर चीज़ का एक ऐसा हिस्सा हैं, जिसे उन चीज़ों से अलग नहीं किया जा सकता। मानवीय एवं ब्रह्मांडीय शरीर, दोनों ही पांच तत्वों से बने हैं। योग के मार्ग पर, जब आप अपने अंदर, इन पांच तत्वों पर महारत पा लेते हैं, तो आप अपनी भीतरी और बाहरी, दोनों परिस्थितियों की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं - दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। लेकिन इंसान की चेतना में इतना ज़्यादा बिखराव आ गया है, कि अधिकतर लोग यह भूल गये हैं कि एक दूसरे पर निर्भरता कोई सिद्धांत नहीं है, यह एक वास्तविकता है। योग के अनुभव में स्थित होने का मतलब है आप इस पृथ्वी को वैसे ही महसूस करना, जैसे अपनी छोटी उंगली को – यानि अपने एक ऐसे हिस्से के रूप में, जिसे खुद से अलग नहीं किया जा सकता।

ईशा फाउंडेशन की पहल, 'रैली फ़ॉर रिवर्स' (नदी अभियान) ऐसे ही संयोजित विचारों से आई है कि मानव और धरती एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते। पानी और उपजाऊ मिट्टी की लगातार होती जा रही कमी पर चिंता करना ना तो कोई वैचारिक रूप से लोकप्रियता पाने की बात है, और न ही राजनीतिक रूप से सही होने की - ये चिंता जितनी पर्यावरण संबंधी है उतनी ही अस्तित्व संबंधी भी है। मिट्टी और पानी केवल वस्तुएं नहीं हैं, वे जीवन का निर्माण करने वाली सामग्रियां हैं। मनुष्य के शरीर की तात्विक संरचना को देखें तो उसमें 72% पानी है और 12% मिट्टी है।

आज जैसी पर्यावरण की स्थिति में हम हैं, वह बेहद गंभीर है। जिसका निर्माण करने में प्रकृति को लाखों वर्ष लग गये, उसे हम एक ही पीढ़ी में समाप्त करने के लिये तैयार हैं।

एक स्थायी आधार

जब हम सच्चे ढंग से पर्यावरण के साथ अपने तात्विक संबंध को समझ लेंगे, सिर्फ तभी हम अपने लिये एक ऐसा स्थिर आधार बना सकते हैं जो हमें बड़ी संभावनाओं की खोज करने के लिये सक्षम बनाता है। हमारे सूक्ष्म शरीर के मूलाधार चक्र का यही महत्व है: एक स्थिर आधार के बिना विकास संभव नहीं है। लेकिन हम इस बात को अनदेखा कर देते हैं और एक ऐसी मनोवैज्ञानिक अवस्था में रहना पसंद करते हैं जो हमारी भौतिक एवं अस्तित्व की वास्तविकता से एकदम अलग हैं। हालाँकि प्रकृति ने मनुष्य की जागरूकता का असाधारण रूप से विकास किया है, पर हम इस प्रगति को स्वीकार नहीं करते।

आज जैसी पर्यावरण की स्थिति में हम हैं, वह बेहद गंभीर है। जिसका निर्माण करने में प्रकृति को लाखों वर्ष लग गये, उसे हम एक ही पीढ़ी में समाप्त करने के लिये तैयार हैं। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में, वर्ष 2030 तक, हमारी ज़रूरत के मुक़ाबले केवल 50% पानी रह जायेगा।

हमारे देश में उपजाऊ मिट्टी में होती कमी इतनी गंभीर है कि भारत की लगभग 25% खेती की जमीन अगले 3 से 5 वर्षों में खेती करने के लायक नहीं रहेगी। ऐसा अनुमान भी है कि अगले 40 वर्षों में 60% से ज्यादा जमीन खेती करने के लायक नहीं रहेगी।

 

भयानक विपदा की ओर

क्योंकि हमारी अधिकतर नदियाँ जंगलों से अपना पानी प्राप्त करती हैं, उन्हें पुनर्जीवित करने का सबसे बढ़िया तरीका है ज़्यादा से ज्यादा पेड़ लगाना। लेकिन, साथ ही हमारी मिट्टी का जैविक तत्व भी बहुत कम हो गया है और जिस गति से ज़मीन रेगिस्तान में बदल रही है, वह काफ़ी चिंताजनक है। हमारे देश में उपजाऊ मिट्टी में होती कमी इतनी गंभीर है कि भारत की लगभग 25% खेती की जमीन अगले 3 से 5 वर्षों में खेती करने के लायक नहीं रहेगी। ऐसा अनुमान भी है कि अगले 40 वर्षों में 60% से ज्यादा जमीन खेती करने के लायक नहीं रहेगी।

ज़मीन के जैविक तत्वों को बढ़ाने का एकमात्र उपाय है पेड़ लगाना और पशुओं के मल-मूत्र एवं शारीरिक अवशेषों का उपयोग करना है। हम अगर अपने अन्न उत्पादन की क्षमता को नष्ट कर देंगे तो हम एक भयानक विपत्ति की ओर बढ़ते जायेंगे। पेड़-पौधों की कमी और अंधाधुंध शहरी विस्तार की वजह से हम बाढ़ और सूखे के खतरनाक घटनाचक्र को देख ही रहे हैं। पिछले 12 वर्षों में 3 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। खेती वास्तव में दिल तोड़ने वाला काम बन गई है।

[pullquoye align=”right”]बस थोड़ा सा ध्यान और समय पर क़दम उठा कर, यह भूमि अन्य देशों की अपेक्षा जल्दी काया-कल्प कर सकती है।

 

जागने का समय

लेकिन अभी भी आशा है। यह देश संवेदनशील, ज़िम्मेदार और जीवंत देश है, और यह चीज़ हमें यहाँ की असाधारण जैविक विविधता में भी नज़र आती है। जब हमारे प्राचीन ऋषियों ने इसे पवित्र भूमि कहा था तो वह बढ़ा चढ़ाकर कही गई बात नहीं थी। बस थोड़ा सा ध्यान और समय पर क़दम उठा कर, यह भूमि अन्य देशों की अपेक्षा जल्दी काया-कल्प कर सकती है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम सब सीमित और स्वार्थी विचारधाराओं से ऊपर उठें। अगर हम सच्चे ढंग से ये स्वीकार कर लें कि हमारे शरीर के प्रत्येक परमाणु का प्रत्येक कण भी ब्रह्मांड के साथ लगातार संपर्क में है, तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि यह हम सब के लिये जागने का समय है। हमारी नदियाँ हमारी जीवन रेखायें हैं। उन पर आई मुश्किल हमें बता रही है कि हमारे पास समय कम है। हम अपनी जिम्मेदारी अब और ज्यादा नहीं टाल सकते। हाँ, जिम्मेदारी के साथ काम कर, हम इस स्थिति को पलट सकते हैं।

 

 
 
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