आरक्षण की नीतियों पर करें पुनर्विचार

आज की तारीख़ में आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर पूरा देश दो फ़िरक़ों में बँटा हुआ है। कोई इसका हिमायती है तो कोई विरोधी। लेकिन आख़िर सही क्या है?
आरक्षण की नीतियों पर करें  पुनर्विचार
 

सद्गुरु : भीम राव अंबेडकर के जीवन से जुड़ी एक मार्मिक घटना मुझे याद आ रही है। जब वे नौ वर्ष के थे, तो उनके पिता गोरेगाँव में काम करते थे। उस समय उन्होंने अपने पुत्र को गर्मी की छुट्टियों में अपने साथ रहने के लिए बुलाया। अंबेडकर अपने बड़े भाई और एक संबंधी के साथ सतारा से गाड़ी में चढ़े। लड़कों ने नई अंग्रेज़ी स्टाइल की कमीजों के साथ रेशमी किनारे वाली धोती और नई चमकदार टोपियाँ पहनी थीं। यह उनकी पहली रेल यात्रा थी और वे बहुत रोमांचित थे।

जब वे अपनी मंजिल पर पहुँचे तो उन्हें कोई लेने नहीं आया हुआ था। उनके पिता को उनके पहुँचने की तारीख की चीट्ठी नहीं मिली था। स्टेशन मास्टर ने उन्हें शायद उनके कपड़ों की वजह से ऊँची जाति का समझ कर वेटिंग रुम में जगह दिलवा दी। लेकिन बाद में उनकी जाति का पता चलने पर, उन्हें उस जगह से निकाल दिया गया। उन्होंने पिताजी के पास जाने के लिए बैलगाड़ी किराए पर लेनी चाही पर कोई उन्हें साथ ले जाने को तैयार नहीं था। आखिर में एक बैलगाड़ी के मालिक ने हामी भरी पर उसने गाड़ी में साथ बैठने से मना कर दिया और गाड़ी के साथ पैदल चलने लगा। उसका मानना था कि दलितों के साथ बैठने से वह अपवित्र हो जाएगा। यह एक लंबा सफर था और किसी ने उन्हें रास्ते में पानी तक नहीं दिया। वे अगली सुबह गोरेगाँव पहुँचे। सफर के अनुभवों ने अंबेडकर को पूरी तरह से हिला कर रख दिया।

एक सदी बीतने के बाद ज़्यादा कुछ नहीं बदला

यह घटना 1901 की है। आज एक सदी से ज़्यादा समय बीतने के बाद भी देहाती इलाकों में यही दशा है। भले ही उतनी कट्टरता न हो पर आज भी यह सोच कायम है कि किसी दूसरे इंसान के छूने से कोई मैला हो सकता है। आखिर में एक बैलगाड़ी के मालिक ने हामी भरी पर उसने गाड़ी में साथ बैठने से मना कर दिया और गाड़ी के साथ पैदल चलने लगा। उसका मानना था कि दलितों के साथ बैठने से वह अपवित्र हो जाएगा।

हमारे समाज की इस दयनीय दशा के बावजूद, हम अक्सर सुनते हैं कि हमें आरक्षण को हटा देना चाहिए। मैं समझ सकता हूँ कि ये सब कहाँ से आ रहा है। भारत जैसे देश में, आप जो भी नियम बनाएँ, खासकर ऐसे नियम जो कुछ विशेष सुविधा देते हैं, सदा उनका दुरुपयोग होगा। यह एक हकीकत है। परंतु दलितों के लिए आरक्षण के मामले में, हमें ‘उपयोग’ और ‘दुरुपयोग’ को तौलना होगा।

इस सामाजिक समस्या को अनदेखा नहीं कर सकते

यह समुदाय, हजारों सालों से भेदभाव सहन करता आ रहा है। अगर उन्हें हम सबके बराबर लाने के लिए कुछ विशेष अधिकार नहीं देंगे तो यह अन्याय होगा। जो लोग इस समस्या की गहराई को नहीं समझ सकते, उन्हें देहाती इलाके में जा कर देखना चाहिए कि ये भेदभाव कितना भयंकर हो सकता है। दलित आदमी, किसी बड़ी जाति वाले के घर मेन गेट से घर में नहीं आ सकता, वे लोकल चाय की दुकान में चाय नहीं पी सकते, दलितों के बच्चे गैर-दलितों के बच्चों के साथ बैठ नहीं सकते। किसी भी इंसान के प्रति ऐसे बर्ताव को मंजूरी नहीं दी जा सकती! तो आरक्षण देश के लिए शाप नहीं है। बड़ी जाति को मिलने वाले विशेष अधिकार हटाने होंगे। कोई आरक्षण ले रहा है और कोई दूसरा इसे नाजायज मानता है क्योंकि उसे कॉलेज या किसी कोर्स में दाखिला नहीं मिला - केवल इसी वजह से समाज की इतनी बड़ी समस्या को अनदेखा नहीं कर सकते।

कोई आरक्षण ले रहा है और कोई दूसरा इसे नाजायज मानता है क्योंकि उसे कॉलेज या किसी कोर्स में दाखिला नहीं मिला - केवल इसी वजह से समाज की इतनी बड़ी समस्या को अनदेखा नहीं कर सकते। हमें इस बात को समझना होगा कि ऐसे मुद्दे उठने की वजह ये है - कि हम जो भी ढांचा, शिक्षा या अन्य सुविधाएँ तैयार करते हैं या करने की कोशिश करते हैं, हमारी जनसंख्या उसके अनुपात से कहीं तेजी से बढ़ती जाती है।

आरक्षण नीति के आकलन का समय

अगर देश में दलित विकास के स्तर की बात करें तो मेरा मानना है कि उन्हें अब भी आरक्षण की ज़रूरत है। लेकिन शायद हमारी आरक्षण नीति पर फिर से विचार करने का यही सही समय है। एक प्रजातंत्र में, सब कुछ चुनाव के आसपास घूमता है। कोई भी बदलाव की बात नहीं करता, भले ही वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, खासतौर पर अगर यह किसी एक खास समुदाय से जुड़ा हो। क्योंकि तब यह यह चुनाव जीतने या हारने का मसला बन जाता है। लेकिन हमें इस काम में और देरी नहीं करनी चाहिए। अगर देश में दलित विकास के स्तर की बात करें तो मेरा मानना है कि उन्हें अब भी आरक्षण की ज़रूरत है। लेकिन शायद हमारी आरक्षण नीति पर फिर से विचार करने का यही सही समय है।

शहरी और देहाती दलितों के बीच एक अंतर रख सकते हैं क्योंकि ज्यादातर भेदभाव और परेशानी देहाती इलाके वाले दलितों को सहन करनी पड़ती है। इसलिए देहाती इलाकों के दलितों को शहरी इलाकों में रहने वालों की तुलना में ज्यादा लाभ और सुविधा दी जानी चाहिए।

शायद पहली पीढ़ी को यह आरक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे उस गड्ढे से बाहर आ सकें जो बदकिस्मती से उनके लिए खोदा गया है। दूसरी पीढ़ी के लिए इसे थोड़ा घटा सकते हैं, तीसरी पीढ़ी तक आते-आते उन्हें इससे पूरी तरह से बाहर आ जाना चाहिए। जो दो पीढ़ियाँ इस गर्त से बाहर आ चुकी हैं उन्हें अपनी इच्छा से, आरक्षण का लाभ उनको दे देना चाहिए, जो इससे अब तक बाहर नहीं आ सके हैं। यह केवल तभी हो सकता है, जब आपमें एक ज़िम्मेदारी का भाव हो। ये सुविधाएँ इसलिए हैं, क्योंकि एक स्तर पर सामाजिक अन्याय अब भी मौजूद है। लेकिन अब हमें इन सुविधाओं को एक दूसरे तरह के अन्याय में नहीं बदलना चाहिए। उसके लिए हमें एक अधिक जागरूक समाज की जरूरत होगी।

काबिलियत से कोई समझौता नहीं होना चाहिए

कॉलेज के दाखिले के लिए आरक्षण अब भी ज़रूरी हो सकता है, पर किसी छात्र को केवल इसलिए पास नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी खास जाति से जुड़ा है। इस तरह आप देश में क़ाबिलियत के स्तर को घटा रहे हैं। उन्हें अवसर दें, उन्हें कोचिंग दें ताकि उनके भीतर अच्छी स्कूली पढ़ाई न मिल पाने के कारण जो कमी रह गई है, वे उसे पूरा कर सकें। लेकिन काबिलियत से समझौता नहीं होना चाहिए। ठीक इसी तरह, नौकरियों के लिए भी आरक्षण की मदद से उन्हें नौकरी मिल सकती है, लेकिन प्रमोशन केवल क्षमता के आधार पर ही होना चाहिए। उन्होंने सामाजिक प्रजातंत्र की वकालत की, वे केवल राजनीतिक लोकतंत्र के हिमायती नहीं थे। अगर आपके पास एक वोट है, तो मेरे पास भी एक वोट है - हम दोनों उस स्तर पर समान हैं।

आखिर में, हमें लोगों को समुदाय, जाति, धर्म आदि के आधार पर देखना बंद करना चाहिए क्योंकि भारत में हरेक के पास केवल एक ही वोट है। इसका मतलब, कानून की नजर में हम सब एक हैं। यही समानता सामाजिक स्तर पर भी दिखनी चाहिए।

देश और पूरे संसार के लिए अंबेडकर का यही विज़न था। उन्होंने सामाजिक प्रजातंत्र की वकालत की, वे केवल राजनीतिक लोकतंत्र के हिमायती नहीं थे। अगर आपके पास एक वोट है, तो मेरे पास भी एक वोट है - हम दोनों उस स्तर पर समान हैं। दुर्भाग्य से, हमारे देश में दलितों के पास समान कानूनी अधिकार तो हैं, लेकिन उन्होंने इसे सामाजिक स्तर पर हासिल नहीं किया है। कम से कम इस पीढ़ी के लोगों को तो यह करना ही होगा क्योंकि तभी हम भारत को सही मायनों में गणतंत्र बना सकेंगे। जो देश पक्षपात का समर्थन करता है, जो उसके अपने नागरिकों के दमन में झलकता है, वह एक सफल गणतंत्र नहीं हो सकता।

 
 
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