1.भारत की अमर कहानी

इन नदियो में जो नीर बहा, तुम समझे बस यह पानी है।
इनकी कीमत पहचानो सब, ये अमृतसं जीवनदानी है।।
युगों युगों से बहती वो, भारत की अमर कहानी है।
गंगा, नर्मदा, कावेरी सब ही नदियाँ मातृसम कल्याणी है।
इन नदियों के उपकारो से, क्योंकि दुनिया अनजानी है,
इन्हें नवजीवन देने की अब, सद्गुरुओं ने ठानी है।।
इन नदियों के उपकारों को यदि तुम अब भी झुटलाओगे
आने वाली पीढी को, तुम, क्या सौगातें दे पाओगे ?
इस जल का सुख जो तुमने भोगा, उसका ऋण कैसे चुकाओगे?
चुप मत बैठो अब, कुछ बोल करो यदि कुछ भी संभव ना हो
तो 8000980009 पर कम से कम एक मिस कॉल करो।

— साक्षी देशवाल


2. एक पुकार

आस्था का आधार है ये नदियां ……..
देश का जीवन-प्राण है ये नदियां…….
कल-कल बहती थी कभी , आज क्यों विरान है ये नदियां ?
भारत का मान है ये नदियां……..
संस्कृति की आन है ये नदियां……
कल-कल बहती थी कभी , आज क्यों सुनसान है ये नदियां ?
सदियों से करती रही जो जन-जन का उद्घार,
आज क्यों करती है करुण पुकार ये नदियां ?
कल-कल बहती थी कभी, आज क्यों वीरान है ये नदियां?
चुकाना है इन नदियों का ऋण…….
मिलना होगा हमें हाथ से हाथ……..
क्यूं करें पावन नदियां पुकार ?
जब हो सब भारतवासी साथ-साथ…….
जब हों सब भारतवासी
साथ-साथ……….।

— सोमप्रभा (जयपुर) द्वारा रचित


3. ज़िंदगी को जि़न्दा नदी करती है

ज़िंदगी को फिर से यहाँ जि़न्दा नदी करती है

सदियों की संस्कृति को नसीब आज की सदी करती है
ज़िंदगी को फिर से यहाँ जि़न्दा नदी करती है

बीज से उठ, खेत की छाती पर फसल लदी करती है
जिंदगी को फिर से यहाँ जि़न्दा नदी करती है

वन तरु से तरु वन तक धरती की संपूर्ण निधि करती है
ज़िंदगी को फिर से यहाँ जि़न्दा नदी करती है

कल और कल को इस पल में सूत्र यदी करती है
ज़िंदगी को फिर से यहाँ जि़न्दा नदी करती है

— विद्या कृष्णा


4. जब नदियां न रह जाएंगी

जब नदियां ना रह जाएंगी फिर क्या यहां रह जायेगा
गंगा, जमुना का नाम
सिर्फ मंत्रों में जपा जाएगा ।
होंगे सूखे जंगल ,
कहाँ नदियों का किनारा रह जाएगा ?
फिर कहाँ तू पिकनिक और छुट्टियां मनाएगा ?
हरी-भरी वसुंधरा,
जब बूँद बूँद को तरसेगी
सूरज से आग ,
पेड़ों से सूखे पत्तों की आवाज ही बरसेगी ।
कहां तू अपनी अस्थियाँ बहायेगा ?
जब नदियाँ ना रह जाएंगी फिर क्या यहाँ रह जाएगा?

— नित्या शुक्ला, जयपुर


5. मेरा प्रगतिशील शहर

पर्वतों के निर्मल आंगन से, जब निकली थी मैं ,
अल्हड़ ,मदमाती, उन्मुक्त, स्वछंद ,
गुजरी थी जब खेतों से ,
लेते हुए अंगड़ाई। खिलखिला उठी वसुधा , धानी चूनर की ओट से मंद- मंद ।
कुछ और जो आगे बढी,
कराह उठी मेरी लहर लहर, हां यह था
मेरा प्रगतिशील शहर ।
ओ मनुज, जाग ,समझ संभल ,
जो चाहो अगर खुशनुमा रातें , खूबसूरत सफर,
ना घोलो
जीवनदायिनी नदियों में ज़हर।

— नित्या शुक्ला, जयपुर


6. वह कुछ सिमट सी गई है

नदी को बोलने दो,शब्द स्वरों के खोलने दो |
उसकी नीरव निस्तब्धता एक खतरे का संकेत है,
की नदी हुई समाप्त है,शेष रह गई रेत है||
बहती हुई नदी जीवन का प्रमाण है |
राष्ट्र का गौरव है,जीवंतता की पहचान है ||
यह जीवनदायिनी है,इसे अपने दुष्कम्रो से न भयभीत करो |
यह नीर नहीं संचती है,इसे नाले में ना तब्दील करो ||
पाप तुम्हारे धोते-धोते वह कुछ थक सी गई है |
ऐसा लग रहा है,कि वह कुछ सिमट सी गई है ||
नदी को बचाना हमारा कर्तव्य है | पेड-पौधे लगाना जरूरी है||
बस एक मिस कॉल की बात है | तो आने वाला भविष्य अपने साथ है ||

— स्वप्निल गाडगे


7. तुम्हें हम सबको बचाना होगा

पूछती है गंगा नर्मदा से
क्यों सिकुड़ते जा रहे किनारे
आखिर क्यों कद छोटे हो रहे हमारे
कहती है कृष्णा कावेरी से
आखिर कब समझेगा मानव
विलुप्त होते जल स्रोत के इशारे
मिलकर सब सखियाँ करती है निवेदन
अपने लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए
यह कदम तुम सबको उठाना होगा
एक जुट होकर, तुम्हे हम सबको बचाना होगा

— सौरभ भरवाल
Written by Saurabh Bharwal
Shared by Madhu


8. नदियों की व्याकुल साँसें

बोया था जो बीज धरा में,
अंकुर निकल रहा है क्या?
कावेरी की निर्मल झोली मे
जीवन पनप रहा है क्या?
काले पड़ते ये हरियल तट
इनमें ये जल रहा है क्या ?
जल से उपजे, जल में उतरे
जल रक्तिम कह रहा है क्या
जिन नदियों से पाया जीवन,
उन्हें सागर मिल रहा है क्या?
जिन नदियों की कल कल बांहें
रहीं तत्पर तुम्हें खिलाने को
उन नदियों की व्याकुल सांसों को
अब अम्रुत मिल रहा है क्या?

— Jaspreet Taunque जसप्रीत टांक


9. मानव को जगाना है

है एक सैलाब सा उठा कि एक नई दिशा को जाना है ,
वजह सिर्फ इतनी है कि मानव जाती को जगाना है।
जीवन दानी हैं यह नदियां हमारी
बस इतना सा सन्देश जन जन तक पहुचाना है।
है विश्वास अगर तो दम भी उतना ही है,
कि आज चल पडे कदम तो थमना नहीं है।
तो कर लो तैयारी ऐ मेरे वतन,
हर गली हर नुक्कड़ पर ये नारा लगाना है,
कि कतरा कतरा कर नदियों को बचाना है।

— मुग्धा अरोरा


10. गंगा जल

जब लोग मर जायें, गंगा जल पिलाएँ
गर मर गयी गंगा, जल कहाँ से लाएँ

— विद्या कृष्णा


11. थार

हरी चुनरी न उसकी हर तरफ से तार हो जाए
मरी नदियाँ तो जलके देश सारा, “थार” हो जाए

— सविद्या कृष्णा


12. माँ को बचाना होगा

बगंगा नदी हैं माँ हमारी, जिसने सिर्फ़ देना सीखा
इसी माँ को क्या दे सकते है ?
ये बताओं जिस की उमर तो बढ़ रही है,
पर जीवन ख़तरे में हैं।
अब वो बोल रहीं हैं, बचाओं मेरा साथ निभाओं।
पता नहीं कब खो जायें साथ हमारा
इस पल को अब ये समझो |
बचाओं मेरा साथ निभाओं
हो सके तो मुझे बचाओं।
हर नदी हमारी माँ हैं जिसने
हमें जीने का वरदान दिया हैं।
अब हमारी बारी है इनको बचाने की

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13. नदी का धर्म

कल-कल कल-कल कल-कल कल- कल
बहू पायल की रूनझुन बनकर
अभी हिमालय से निकली हूँ
जाना है सागर तक चलकर ।

कल कल कल कल ___

खेतो मे फसले मुरझाये
जेठ की गर्मी कंठ सुखाये
शस्य श्यामला कर देती हूँ
धरती में नवजीवन भरकर ।

कल-कल कल-कल ___

जहाँ से गुजरू अमरित बाँटू
कंकर कंकर पर मैं नाचू
नदी का धर्म है बहते रहना
धारण करो मुझे शिव बनकर

कल कल कल कल __

— सशुभांगी साहू


14. इक मातृ उज्जवला कहती है़

बइक मातृ उज्जवला बहती है ,
और बहते बहते कहती है,
मैं हूं नारी, हूं दिव्य दशा,
यहां अमृत लेकर आई हूं,
मैं जननी स्वर्ण सिंधू की हूं,
जीवन की उत्तरदायी हूं ।

नभ जल थल सब मुझ पर निर्भर, हर प्राणी का उत्थान किया,
मेरे ममतामयी आलिंगन को,
क्या तुमने उचित सम्मान दिया?किया आहत मेरे पुत्रों को,
वृ़क्षों को काटा, पाप किया
मेरे हर तट ने दूर दूर तक,
हो विचलित हाहाकार किया।

मन में द्रवित – पर प्यासी हूं,
दुःख सहती हूं पर साहसी हूं,
नही चाह मुझे अब सागर की, फिर भी अनमनी सी बहती हूं।

तुम भी तो मेरे जाये हो,
मेरी मिट्टी से ही आए हो,
उठ जागो होश सम्भालो अब, प्रति मां के फर्ज़ निभा लो अब।

जो न होगी निर्मल गोदी यह,
तो जीवन कहां से लाओगे,
जो सूख गई ये छाती तो,
देवामृत कहां से पाओगे?

इक मातृ उज्जवला बहती है, और बहते बहते कहती है़ …

— Jaspreet Taunque जसप्रीत टांक


15. नदी चहकती रहे

वो जो नागिन सी चलती थी
रागिनी सी ढलती थी
जंगलों में पलती थी

चन्द्रमा का दर्पण थी
मेघों का अर्पण थी
पित्तरों का तर्पण थी

साक्षी थी रास की
संघर्ष, विजय, हास की
मानव इतिहास की

उफनती रहे, किलकती रहे
गुंजती, बहकती रहे
वो नदी – नदी चहकती रहे

— अभिषेक माथुर


16. एक बस्ती उजड़ गई

एक बस्ती, कुछ जानवर
कुछ शज़र और एक नदी…
साथ रहा करते थे सब,
मिल-जुलकर किसी ज़माने में..

खुशियां उगती थीं सब्ज़ सब,
इतराती थीं, लहलहाती थीं,
सब रंग बरसते थे अर्श से…
और फ़िज़ाएँ तैरती रहती थीं…

एक रोज़ बस्ती मक्कार हो गई..
तोड़ शज़र सब निग़ल गई…
रंग सारे मतरूक हो गए..और
अर्श सुर्ख़ सा पड़ गया…

जब आसमान रोया दर्द से,
नदी बड़ी नाराज़ हुई..
छोड़-छाड़ कर बस्ती को…वो
खुल्द मार्ग पर निकल गई…

बस्ती की बाज़ी पलट गई…
रन्ज-ओ-गम की सहर हुई…
सियाह अंधेरा छा गया और,
बस्ती ज़र्द पड़ गई..

हर रोज़ आजकल रातों में,
मैं ख़ौफ़ घोंट कर सोता हूँ…और

अपने काले ख़्वाबों में,
बस्ती को कहते सुनता हूँ..
“लौट आओ ओ नदी हमारी,
लौट आओ ओ ज़िन्दगी।”

— Pradumn R Chourey
प्रद्युम्न आर. चौरे


17. जय शंभु शिव ओंकारा

जय शंभु शिव ओंकारा
त्राहि मान करे जग सारा
कहाँ खो गई जटा घारा
गंगा लाओ दोबारा

भटक गया था जग सारा
काटे पैड रोकी घारा
मद मस्त बने हम आवारा
जल बिन अब हम नाकारा

क्षमा करो शिव ओंकारा
पार करो जग के तारा
शक्ति से भर दो सारा
कि गंगा लाए दोबारा

बीत गया जीवन सारा
पश्चात्ताप का मैं मारा
नयी पीडी का उजियारा
बोले दिल का ईकतारा

जय शंभु शिव ओंकारा
त्राहि मान करे जग सारा
कहाँ खो गई जटा घारा
गंगा लाओ दोबारा

— अनिल माहेश्वरी


18. जल का जलना

वो आग बुझाता है, हमारी प्यास मिटाता है
धड़ा के दो तिहाई हिस्से को खुद मे समाता है
आसमान से बारिश के बूंदे बनकर हमे खिलखिलता है
किसानो का साथी बनकर, हर मौसम मे नये फसल उगाता है
यूँही बूँदो से शुरू होकर, नदी-सागर और महासागर बन जाता है
हमारी नादानीयों ने, न जाने कब नदियों को सूखा दिया
जिस जल से जीते थे हम सब, उस जल को ही जला दिया
अब वो दिन दूर नही, जब जल की आस और प्यास मे
हम एक दूसरे के रक्तो से अपनी प्यास बुझायेँगे
संभल जाओ ऐ इंसानो, जल नही तो ये थल नही
आज तो है पर वो सुनहरा कल नही, सुनहरा कल नही

— कुमार सौरभ


19. छल छल करती प्यारी नदिया

टिप टिप करता वो बहता पानी,
जब छलकता अक्सर उस बादल से,
खिल उठता था रोम रोम,
अब टपके सिर्फ इन आँखों से।
टिप टिप करता वो बहता पानी ।।

छल छल करती वो प्यारी नदिया,
कहीं सिमट गई इन ज़रूरतों में,
लौटना होगा इनका अस्तित्व,
ये रह न जाये किताबो मे।
छल छल करती वो प्यारी नदिया ।।

ना बनने दू अब तकदीर इसे,
और रंग दू इन तस्वीरों को,
ये भारत कीे जीवन रेखाएं,
अब मिलेंगी मेरे जीवन से।
ना बनने दू अब तकदीर इसे ।।

आइये, इस अभियान के द्वारा मिलकर बचाये इन भारत की नदियों को।
भारतम महाभारतम….।


20. नदियां हमारी धरोहर

वगंगा हो या जमुना,
कोसी या गोदावरी,
इन्हीं ने भारत की शोभा बढाई।

कभी श्री राम की,
तृष्णा बुझाई तो कभी
नाविकों को दिया सहारा,
हिम से निकलकर,
जाने कहाँ कहाँ पहुंची यह जलधारा,
गंगा ने कई अरसों से,
भारत की शोभा बढ़ाई।

पापी हिल्स के दर्शन से,
मिला आँखों को एक नया नज़ारा,
गोदावरी ने प्यासे किसानों को,
सिंचाई का दिया सहारा।

जिम कार्बेट की लहराती घाटी,
शेरों की गूँज, माता का मंदिर,
कोसी का किनारा और बाँध उसपर,
लाता है कई यात्रियों को सालभर।

इस तरह हैं धडकन हमारी
ये नदियां,
पर हम इन्हें नहीं रख पाते हैं
साफ,
फेंकते हैं कूड़ा, कई रसायन और पन्नियां,
पानी के इस्तेमाल का नहीं है कोई हिसाब,
इस तरह नहीं चलेगा जनाब,
रैली फर रिवर्स जैसा कैंपेन ही,
अब है इस समस्या का जवाब।।

— सीता प्रसाद


21. नदियों में फिर हो जल तरंग

मेरी रचना #नदीअभियान को समर्पित

नदी तुम नाद हो,
कल-कल बहते जीवन जल का,
तुम सरस् जीवन का प्रबल संवेग धरे,
बहती हो जीवन का आधार बन के,
जन्म से मृत्यु तक सब,
तुममें ही तो समाहित है,
पर हाय! क्यों यह मूर्ख मन,
समझा नहीं, बूझा नहीं,
करता रहा शोषण यूँ ही,
बस अतृप्त मन की प्यास लिए;
नदी ! तुम तो सरल थीं,
सहमी हुई, सिकुड़ी हुई,
खुद में समाहित होती गयीं,
छोटी-छोटी जीवन धराऐं
धीरे-धीरे मरती गयीं,
इक आह! सी मन में लिए,
तुम सागर मिलन को तरसती रहीं,
इक अश्रु-धार बहती रही,
और खत्म हुऐ वन, पशु, पक्षी
सौंदर्य विहीन हुई धरती,
हे मानव! क्या था रूप यही?
सोचा तूने जीवन का था?
खुद ही काटा उस डाली को!
जिसने तुझको जीवन था दिया

# अब भी जागो और उठो चलो,
समझो जीवन का नाद यही,
पशु, पक्षी और वन्य जीव
इनसे ही हैं संवाद सभी,
जब ये ही नहीं तो तू भी नहीं,
इस उजड़े चमन में श्वास नहीं
जुड़ जाओ #नदीअभियान संग,
बदलो जीवन का रूप रंग,
खिल उठे चमन नव पुष्पों से,
रंगीन छटा हो बिखरी हुई
अब लाओ नव आज़ादी तुम,
तज कर अपनी इस भूल को
जुड़ कर #सदगुरु #ईशा के संग,
नदियों में फिर हो जल तरंग।।


22. नदी तेरे रूप अनेक, नदी तेरे गुण अनेक

वजीवन को भीतर बसाय जीवन दान का फ़र्ज़ निभाए
पशु – पक्षियों का घरौंदा तू और तुझसे ही तो खेत खलियान मुस्कुराए !!

पूजे तुझे ,कहे गंगा का प्रतीक और दूसरे ही पल गर्द पहलाये
अपने होने पर इतना गर्व करने वाले ,बिना नदी तेरा अस्तित्व ही ख़ाक हो जाए !!

— निखिल अग्रवाल


23. एक ख्याल सा आ गया

नीम के पेड पास बैठै बैठै
बस यूही एक ख्याल सा आ गया,
कि यह कडवाहट भी क्यां चीझ है।

कूछ कदम पास ही
माझी मे बहते सूखे तालाब की सोचकर
पसीनापसीना सा आ गया,
कि यह गरमाहट भी क्यां चीझ है।

याद आया वोह वख्त

जब मैं गया था टहलने घने पहाडो पर
हरियाले पैडपौधो के आगे
गहरी खाई को पाकर लगा सा था,
कि यह रुकावट भी क्यां चीझ है।

बहुत चला था ऊस दिन
शायद एक मजझूर सै भी ज्यादा
फासलो को काटकाट कर पता सा चला,
कि यह थकावट भी क्यां चीझ है।

बहेते झरने को देखकर होश संभला
लेकिन नसीब तो देखो यारो
प्यास बूझाने को पानी मिला तो समझा सा मैं,
कि यह मिलावट भी क्यां चीझ है।

राह चलते पथिक सै
जब की मेंने कुछ मामूली शी गूझारीशे
तब मुझ नादान मुसाफिर को अंदाझ सा आया,
कि यह गिरावट भी क्यां चीझ है।

बहुत सारा परेशान हुआ था उस दिन,
जिन दिन गिरि मेरे पर ढैर सारी आफते।

और
आज…

नीम के पैड पास बैठे बैठे
बस यूही एक ख्याल सा आया,
कि यह कडवाहट भी क्यां चीझ है।

थूंक डालो तो अमृत है,
नीगल डालो तो झहर है,

कुछ ना करो और सिर्फ
दांत दिखा दो तो..

कडवाहट, गरमाहट,
रुकावट, थकावट,
मिलावट और गिरावट
परभारी पडनेवाली
यह मुस्कुराहट भी क्यां चीझ है।

– भव्य रावल


24. जल की महिमा

बूँद सा छोटा, सिंधु सा फैला
है धरा पर जीवन का आधार
व्यर्थ न करो जल-संपदा
महत्व इसका करो स्वीकार

ओस की बूँद में छिपा सा,
कभी हिम का रूप वो धरता है
कभी भाप बन उड़ जाता
कभी वर्षा बन फिर बरसता है
और जो जिद पर आ जाए तो
प्रलय बन मचाता हाहाकार
जल की महिमा को तुम जानो
महत्व इसका करो स्वीकार

— परमीत कौर “मोना”


25. सोन चिरैया भारत फिर से होगा

मेरी मॉं की मॉं ने कहा था
उन्हें उनकी मॉं ने कहा था
गंगा उनकी मॉं है
इस रिश्ते से पीढ़ियों की मॉं गंगा की मॉं
खाड़ी बंगाल की तो हमारी पड़ नानी लगी

नानी के घर जाना ,
उसके आगे पीछे भागना
गोद उसकी में गोते लगाना ,
गर्मी सर्दी का लुत्फ़ उठाना ,
याद अब तक है बचपन का ज़माना ।

मॉं थी , मां -सी ,थी , मनभावन थी
बतियां ननिहाल की निराली थीं
बचपन की वो इक अलग कहानी थी।
मॉं गंगा हो या हो यमुना
ननिहाल लगता सुहाना था
कावेरी , मेघना या गंडक बुरही
मासी भी हमें लगीं सदा ही प्यारी
दिल को भाती महानदी , गोदावरी
केन टोंस औ कृष्णा प्यारी थी ।

बचपन बीता आई जवानी
फिर सुनी हमने अजब कहानी थी
मॉं , मांसी मिलकर गीत ये सुनाती थीं
” नानी तेरी मोरनी को मोर ले गये
बाक़ी जो बचा था काले चोर ले गये ”

तमसा , बेटवा, चम्बल हो या
फिर हो ,राम गंगा , काली , गोमती
गंडकी , कोशी, या बागमती ही
महानंदा ,घग्घर ,बह्ंमपुत्र सब की सब ही
रूठ गईं , पूरी की पूरी उजड़ गईं थीं

प्यारी नानी को , रूठी नानी को
हमने फिर ये याद कराया
गाना उनको ख़ूब सुनाया
“अच्छी नानी प्यारी नानी
रूसा रूसी छोड़ दे
जल्दी से इक झप्पी दे दे ”
गीत हमारा उसको भरमा ना पाया
ननिहाल का आँगन भर ना पाया

ना जाने कब “चोरों का डिब्बा ”
कटकर पहुँचेगा सीधा जेल में
माँ , मांसी , नानी का कुनबा
होगा फिर से हमारे खेल में

ननिहाल के वो दिन , बचपन के दिन
प्यारे प्यारे पल पल , छिन छिन
लौटेंगे फिर इक दिन
सब ननिहाल बैठेगा मिल जिस दिन

मन आशा के दीप जलेंगे
मोदी जी हमरी बात सुनेंगे
नदियों का मेल सुनहरा होगा
भारत की माताओं का मिलन भी होगा
सोन चिरैया भारत फिर से होगा।

– डा. राकेश भारती
अमृतसर


26. मैं जल हूँ

मैं जल हूँ
मैं नभ में हूँ और थल में हूँ
मैं जल हूँ

मुझसे ही तुम जीवन पाते
फिर भी मुझको व्यर्थ गवाँते
मुझसे ही धरा पर जीवन
क्यों तुम ये समझ न पाते
था कल, हूँ आज भी
बचा रहा, तो ही कल हूँ
मैं जल हूँ

— परमीत कौर “मोना”


27. आंसू

मैंने अपनी ख़ुस्क आँखों से लहू छलकादिए ….

एक नदी जो कह रहीं थी मुझे पानी चाहिए !!

Two beautiful lines borrowed from dr Rahat indori s poetry
Shared by Nikhil Agarwal
निखिल अगरवाल


28. सूखी नदी

रोक लेती हूँ आँखों में आँसू
सूखी नदी पर रोने वाला कोई तो हो

— विद्या कृष्णन


29. हर नदी हमारी माँ है

Ganga nadi h Maa humari, Jisne sirf Dena sikha ||
Esi Maa ko kiya de sakte h,
y batao jis ki umr to bad rahi h pr jivan khtre m h ||
Ab wo bol rahe h bacho mera sath nibhao,
Pata ni kab kho jae sath humara es pal ko ab y Samjhao ||
bacho mera sath nibhao,
ho sake to mujhe bachao ||
Har nadi humari Maa h jisne.
Hume jine ka warden diya h ab humari bari h in ko bachan ki

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– शुभांगी साहू


30. मौका फिर नही आएगा

वह रोती रही पर आंसू, दिखते नही उसके,
छुप जाए वह , पर किनारे अपने नही उसके,
थक तो चुकी है पर सुस्ता नही सकती,
नदी चीखती है, तुम शब्द समझते नही उसके।

आवेग था कभी, आज सुकुमार सी है,
तेरी हरकतों से परेशान भी है,
हाथ खींचना हो तो बढ़ाया न करो,
निर्भर हो जिसपे, उसे सताया न करो,
जो रूठ जाएगी तो मनाना मुश्किल हो जाएगा,
समय है सुधर जाओ, मौका फिर नही आएगा।

— राहुल कुमार


31. स्वर्ग

पीहर से कुछ, वो ससुराल लेके आ गई
धरती पर नदी स्वर्ग सा हाल लेकर आ गई
विद्या कृष्णा

पहाड़ों से उभरती है जमीं पर वो उतरती है
कभी गोदावरी गंगा नाम लेकर वो बहती है

करे आबाद जो सबकी जिंदगी को है धरती पर
नदी है नाम उस माँ का जान हर शय में भरती है

पत्थरों से वो टकराती ढलके झरनो सी गिरती है
हरा इक ओढ़के आँचल वो चलती और संवरती है

सफ़र लम्बा वो तय करती बुझाने प्यास हम सब की
किनारों पर उसके दम पर जींदगी सब की पलती है

बुरा है हाल इस माँ का बहुत रोती है अब यारो
वतन की माँ आज प्यारों गम अपना सुनाती है

पारा पारा किया आँचल आज उसके ही पूतों ने
उन्हीके पाप धोने खुद कतरा कतरा पिघलती है

– शिरीष


32. तुम माँ-सम बहती हो

देवी तुल्य माँ तुम, युग युग से बहती हो
तन मन धन की रक्षा, सदियों से करती हो
गंगा जमुना कावेरी, सब नदिया, हम सबकी जीवन धारा
अवनि के हर आँगन में, गुंजित महिमा, तेरी अपरम्पारा
निर्मम मानव हम कितने, तुम नि:स्वार्थ सदा ही बहती हो
तन मन धन ….
तव आँचल में निशदिन, निर्मल दुलार, मिला है हमको
चिर अनुबंधन, स्वप्निल शाश्वत, अभिसार मिला है हमको
कलुषित हम तुमको करते, तुम सहकर माँ-सम बहती हो
तन मन धन ….
प्रतिशोध नहीं, प्रतिकार नहीं, ये कैसा अनुबंधन है
सदियों से चलता आया ये, पावन प्यारा बंधन है
अंतर्मन वाणी कहती है, तव रक्षा ही धर्म हमारा हो
तन मन धन ….

— कमल किशोर राजपूत कमल


33. तुम मेरे शहर न आना

सुनो हे शैलज़ा,
सुनो हे जलमाला।

तुम मेरे शहर न आना।

तुम खूब टहलना जंगलों में,
तुम खूब उतरना पहाड़ों पर,

तुम करना आलिंगन गावों का,
तुम हिमालयों की कथा सुनाना,

तुम सब छू कर करना हरा-भरा,
फिर अपनी सुंदरता पर इतराना, मगर

तुम मेरे शहर न आना।

यंहा हम विष उगलेंगे

तुम्हारे कोरे-सादे बदन पर,
अपना हम ‘गरल’ रंग भरेंगे।

फिर खाँसोगी जब तुम झाग उगलकर,

हम अपनी-अपनी नाकों पर रख कर हाथ,
छी-छी और थू-थू करेंगे।

क्या फायदा है तुम्हे ये सारा विष पीकर,
हम फिर भी तुम्हे न ‘शिव’ कहेंगे।

जो गर बचा हो थोड़ा भी स्वाभिमान,
या हो थोड़ी सी हीं जान अगर,

तो अपनी ये दुबली-पतली काया लिए,

किसी नहर की बांह पकड़कर,
दूर कहीं चली जाना।

सुनो हे शैलज़ा,
सुनो हे जलमाला,

तुम मेरे शहर न आना।

— अंकित मिश्रा

34. जागो मनुष्य जागो

रहीमन पानी रखिए बिन पानी सब सून
पानी गए न उबरे मोती , मानुष चून
माह सभी पानी बिना जैसे मई और जून
त्राहि माम गूंजेगा स्वर और बहेगा खून
गृह युद्ध छिड़ जाएगा नदियों बिना जब होगा न मानसून ।।
नदी मूहनो पर वनो का बने एक दृढ़ कानून
इसके लिए जगाना होगा मिलकर एक जुनून
तो आओ मिल कर अलख जगाएं
वृक्ष, नदी, जन धन को बचाएं
इस मोबाइल का लाभ उठाएं
तुरंत 8000980009 मिलाएं।।

नदी कराह रही है , तुमको बुला रही है।
जागो मनुष्य जगो, तुमको जगा रही है।।
अश्रु बहाती नदियाँ, व्यथा सुना रही है।
भगीरथ और सगर को ये याद कर रही है ।
जलधि से ना मिलकर ये तुड़फड़ा रही है।
है मौन ही सिसकती ये आह भर रही है।
सुखी पड़ी ये नदियाँ क्यों शुष्क हो गई है?
धरती भी है सुनी और वृक्ष भी नही है।
पूछे ये सब मनुज से , खता ऐसी क्या रही है?
क्यो मौन अब भी बैठे, चुप्पी सता रही है।
जागो मनुष्य जागो, तुमको जगा रही है।।।।

— साक्षी देशवाल


35. हमारी नदी माँ

आख़री ख़त – आई सी यू पलंग २०१७ से
प्यारे बच्चों ,
वक्त मुट्ठी से निकलता ही गया ,रेत बन फिसलता गया
घुटने चलते ,लगे दौड़ने तुम ,मां की फ़िकर थी ही कहाँ
राजकुमार मेरी बगिया के तुम
राजा हो गये जंगल के तुम
वैंटीलेटर पे छोड़ माँ अपनी को ,चले ना जाने गये , तुम ,कहाँ ??

कुछ भारत माँ की ,नदी माँ ,के पानी से मुझे नहला दो
एक बार तो ,अच्छे साफ़ मुहाने उनके दिखला दो
पोते ,पड़पोते ,अपनों का ,कल ,इक बार सँवार दो
जाते जाते माँ अपनी को ,सुख सागर दिखला दो
मन आशा के दीप जला दो, मॉ अपनी को और नहीं तो ,चैन की नींद ही सुला दो।

— राकेश भारती

36. झरने को भी प्यास लगती होगी

पानी को भी प्यास कभी लगती ही होगी,
सूखे झरने को पानी कि आस खलती ही होगी,
बूंद बूंद को पानी भी तरसता होगा जब,
खुद से ही खुद की दूरी, उसे
कचोटती होगी तब !

तंग मन से पानी समझाता होगा खुद को,
तो कभी सहारा बनता होगा अपनों का,
कभी वह ज़रूर
रोता होगा चीख कर, के
गला घोट दिया हमने,
उस खल खल करते झरने के सपनों का !

पर पानी भी अपने अश्रु कहाँ छुपाये,
इंसान नहीं है वह, जो पानी में जा
खड़ा हो जाये !

आज नीरव सरिता को देखते,
मुझे वाकई ऐसा लगता है,
पानी को भी प्यास कभी लगती ही होगी,
सूखे झरने को पानी कि आस खलती ही होगी !

— कृतांशा


37. वंदनीय सरीता

सभ्यता जननी
कुंज वर्धिनी सरिता
तव बिन मानव
जीवन शून्यवत।
धारित्री रुधिर वाहिनी
जीवन दायिनी
वंदनीय सरिता ।।
मोहेन जोदड़ो
सिंधु सभ्यता
विकट् काल कृता
अस्तंगता महान् सभ्यता।।

— अरुण काबरा।

38. कुर्बान

आसान नहीं है, खुद को नदी करना
पल, पल कुर्बान हस्ती ए सदी करना

— विद्या कृष्णा


39. सदियों का रिश्ता

नदी जो है सदियों से रिश्ते निभाए
हमारे सिवा कौन उसको बचाए

वो उतरे अचल से ज़रा हिचकिचाए
कुछ अलहड से झरनों की पायल बजाए
वो महकाए वादी, कहीं दिल खिलाए
हुई है बड़ी खुद में सखियाँ समाए

नदी जो है सदियों से रिश्ते निभाए
हमारे सिवा कौन उसको बचाए

बडा पेड कोई या नन्हा सा कोपल,
पले हैं सभी पी के उसका ही स्तन जल
वो लहरें फसल की, घना सा वो जंगल
बडे जा रही, करके हर सू वो मंगल

नदी जो है सदियों से रिश्ते निभाए हमारे सिवा कौन उसको बचाए

कहीं मुड वो जाती है, बाहें पसारे
रहें उससे लगके ही हैं देव सारे
है इतिहास रचता उसी के किनारे
हैं कितने कहो आज उसके सहारे

नदी जो है सदियों से रिश्ते निभाए हमारे सिवा कौन उसको बचाए

तीज त्योहार में फिर से उसको मनाना
हुआ है ज़रूरी, फिर उसको सजाना
नदी का ऋणी आज सारा ज़माना
उसी से ही होगा, अब उसको बचाना

नदी जो है सदियों से रिश्ते निभाए हमारे सिवा कौन उसको बचाए

— विद्या कृष्णा

40. माँ के दुःख हरने होंगे

आदिसृष्टी से नदियां ,
सभ्यता की रहीं साक्षी।
मां सी ,आंचल में समेटे समृद्धि
चली लहरों से सम्पन्नता बांटती, पर ये क्या हुआ
इन अ जस्त्र प्रवाहिनियों को,
अपने में सिमटी जा रही हैं,
सूखती जा रही हैं नदियां
वन कटने की पीड़ा समझें,
समझें नदियों के संकेत।
सुने, अतिवृष्टि_बाढ़ की पुकार,
सूखे और अनावृष्टि का हाहाकार
जतन भगीरथ करने होंगे
मां के दुख तो हरने होंगे।
नदियों के दोनों कूलों पर
ताने_बाने हरियाले बुनने होंगे।

— अदिती पूनम मिश्रा


41. प्रश्न जीवन का

पांच तत्व से जीवन निर्मित
धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश

धरा से सृष्टि की स्थिरता,
जल से जीवन प्रवाह,
अग्नि से है जीवन ऊर्जा,
वायु- प्राण का आधार
आकाश में है सब विद्यमान।

न हैं पेङ पौधे, न ही जीव जन्तु,
धरा यूं हुई है अस्थिर।
नदियों की धारा क्षीण हुई,
सूर्याग्नि का तेज हुआ असहनीय,
वायु हो गयी दूषित।
अब क्या लुप्त होगा जीवन आकाश में?

— ज्योति शुक्ला

42. अब दें उन्हें नया जीवन

जीवन रेखा हैं धरती की,
नदियों को कहते हैं हम माँ ।
ताकि करें इज़्ज़त उनकी,
और रखें उनको स्वच्छ सदा ।

बच्चों के सुख-दुख और दर्द,
माँ रखती है सीने में ।
खुद को कर देती है फ़नां,
जीती बच्चों के जीने में ।

पर बच्चों के कर्त्तव्य हैं क्या?
यह तो हम सब भूल गए।
सौंप के सारा कचरा उसे,
हम अभिमान में फूल गए ।

कुल्हाड़ी पाँवों पर मारी,
साँसें अब हैं घुट रहीं ।
पुनर्जीवन दें नदियों को,
है सच्चा पश्चात्ताप यही ।

— राजेश्वरी


43. जल

जल ही जीवन है इस धरती पर
यह तो हम सब जानते है
पानी की बरबादी
गंगा की स्थिति
यह भी हम सब जानते है
नदी ,समुद्र
कुआँ ,नहर
झील ,झरना
आओ मिलकर इन्हें बचाए
प्रकृति का अनमोल उपहार हैं जल
आओ मिलकर इसे बचाए

— रैना वेलू

44. साथी नदी बचानी होगी….

जगुंजित शिशिर, सुरभित बहार को
नर्तन, सृजन, मेघ-मलहार को

सभ्यता, संस्कृति, संस्कार को
खेतों से मेघों के प्यार को

दिप्त भविष्य, दिव्य इतिहास को
जमुना तीरे मधुमास को

पीढ़ी से पीढ़ी का वादा
कल-कल, छल-छल बहे अबाधा

खामोशी बेमानी होगी
साथी नदी बचानी होगी!

— अभिषेक माथुर


45. आज देश की नदियों की दशा और व्यथा

बहती लहराती, बलखाती,
रुकने का कहीं नाम न लेती,
तट की सीमा में न समाती,
उल्लासित सी बढ़ती जाती ।

देखो, इसी सरिता की
गति हो रही मंथर,
लुप्त हो रहा इसका पानी,
हो रही यह मौन ।

जीवन-रेखा हैं ये धरा की ।
एक कहानी सब नदियों की;
संकट में हैं इनके प्राण,
नदियों बिन हम भी निष्प्राण ।

क्यो न हम सभी जुड़ जाएँ,
मिलकर सब अभियान चलाएं,
सरित किनारों वृक्ष लगाएँ,
बूँद बूँद जल सभी बचाए ।

कल कल बहती सरिताओं का
मार्ग अवरुद्ध नहीं होने दे,
इनके निर्मल स्वच्छ नीर को
मलिन, प्रदूषित न होने दे ।

— स्नेह राठौड़

46. एक नदी का तर्पण

तट पर खड़े पीपल को खूब चढ़ी है चुनरियां
तने पर बंधे हैं हजारो धागें
और उन्हीं धागों पर टंगी है कई छोटी घंटियां
जैसे किसी नई नवेली दुल्हन ने
कमर में बांध रखी हो करधन।

मेला लगा है तट पर
अब तट कहां है और नदी कहां
न भगत को पता है न पंडों को
शिव अब वृद्ध हो चुके हैं
जटा के बाल झड़ गये हैं
उनका कपाल साफ दिख रहा है
वहाँ जल की एक भी धार नहीं है।

मेलो में झूले लगे हैं
झूलों के उपर से नदी का आकाशीय दृश्य
देखने के पोस्टर लगे हैं, भोंपू पर
नदी की महिमा गाई जा रही है
हिमालय की पुत्री है नदी
भीष्म की मां है
शिव का अंश है, पार्वती की सखी है …
पर ये सब संबंध अब आभासी हैं
अंत समय में कोई नहीं दिखता आस पास
सिर्फ नंदी टहल रहे हैं इधर उधर
भैसों के झुंड भी हैं कुछ कुछ दूरी पर
यमराज किसी एक भैसे पर सवार हैं
घंटा, शंख, घड़ियाल, मझीरा के बीच
वो नदी की अंतिम कराह सुन रहे हैं
उनके पास मृत्यु से संबंधित कुछ प्रश्न हैं
पर नदी के कंठ सूख चुका है
वहाँ कोई उत्तर नहीं है ।

घाट से नदी नाभि तक
कई जगह लाल सिंदूर बिखरा है
मनौतियो की सैकड़ों हाड़िया हैं टूटी हुई
एक कृशकाय नदी से
अब भी इतनी उम्मीदे हैं
कि नदी मर भी गई तो
उसे मोक्ष नहीं मिलने वाला।

जीवन रस अब बस नदी के नाभि में है
घाट और नाभि के बीच रेत उड़ रही है
कल ऊंटो ने दौड़ लगाई थी इस थार में।

नदी के लहरों में आवाज गुम है
एक मृत देह का सन्नाटा है चारो तरफ
बूढ़े इंसानों के पांव
जो घाट पर बिना हिले
खड़े नहीं रह सकते थे
आज बीच धार में तने खड़े हैं।
इन बूढ़ो को अब तक याद है
नदी की गर्जन
इसके भंवर में फंस कर कई नावों के
पलटने की कहानी।

नदी पर अब पुल की जरूरत नहीं रही
सारे भेंड़ बकरियों ने योग सिद्धि अर्जित कर ली है
सबने सीख लिया है
जल पर चलकर नंगे पांव नदी पार करना।

एक विशाल नदी
अब प्यास से तड़प कर मर गई है
नदी के सारे का़तिल
उसके तर्पण भोज में शामिल हैं।

— अखिलेश श्रीवास्तव


47. बीत जाना इक सदी का

सूख जाना उस नदी का
बीत जाना इक सदी का

माँ के आँचल में सो जाना
फिर न आना उस घडी का
बीत जाना इक सदी का
सूख जाना उस नदी का

संग गुज़रा बचपन जिसके
रूठ जाना उस सखी का
बीत जाना इक सदी का
सूख जाना उस नदी का

बरसों फैली जिसकी खुशबू
मुरझा जाना उस कली का
बीत जाना इक सदी का
सूख जाना उस नदी का

कह दो की ये बात है झूठी
कहो बुरा सपना है किसी का
बीत जाना इक सदी का
सूख जाना उस नदी का

— दीपक धमीजा

48. नदी

निरमल नीर तेरी धारा का, सीच सीच कर मुझे बढ़ाए
प्राण भरे मेरी काया में, जन जन अपना जीवन पाये
कृष्णा कावेरी हे गंगे, नित तेरे ही गुण मैं गाऊ
तेरी अवरल कृपा से हर्षित हो नित् नीश नवाऊँ
प्राण तेरे ही संकट मैं हो तो खुद के प्राण बचाने कहाँ मैं जाऊं
दौड़ दौड़ कर इधर उधर मैं करुँ कथा सब जगह सुनाऊ
आँखों में कितने ही आँसू लेकर, चिल्ला चिल्लाकर मैं सबको बताऊँ
अब तुझे बचाने ओ मेरी मईया, जो बन पाए, मैं वो कर जाऊ

— अमित मलिक


49. सुप्रभात

दैहिक यज्ञ-वेदी को चढ़ीं
मेरी साँसें अविरल अब तक
स्वयं के गढ़े अनुपथ पर
अथक चलती हुईं …..

नदी पानी की मिठास संग
गहराइयों में गोते लगाती
स्वयं खारापन मिटाती
स्निग्ध बहती हुई….

रिश्तों का कोई क़ाफ़िला
कश्तियाँ बाँट नाविकों को
स्वयं प्रणेता मिसाल बन कर
फरिश्तों सा अलाव दे रहा ….

स्याह गहन दिन-रातों में
दीपक का प्रदीप्त होना
स्वयं चराग़ रोशन जो
लाये वही सवेरा …

तरल कर गया ह्रदय को
मौसम का मिज़ाज आज
स्वयं बरस रहा पानी
बादल का ये अंदाज़ ….

भूखण्ड का अखंड मण्डल हो
वन-वनस्पतियों से भरा हरित
स्वयं नदियों की सरिता हो
तब जीवन प्रेम-सुधा…..

सम्पदा बही फिर जीवन सी
सुधरी आस अंतर की धारा
स्वयं ‘सद्-गुरु’ प्रतिस्कन्दन सा
पुनर्जीवित कर रहा जीवन को…..

नदिया है जीवन, प्रकृति का नियम
बिन पानी है सब ‘सून’
स्वयं तुम भी तभी तो बचोगे
जब नदी को बचाओगे …..

नहीं है ये कोई कथा न कोई गाथा
कर लो एक बार तुम ये मंथन
स्वयं आत्म-बोध होगा फिर
पुनरुत्थान सब सृजन सा !!

— दिव्यांग पुरोहित

50. नदी अनंत है

पल पल कल कल
निर्झर निर्मल
पर्वत घाटी
उबड़ खाबड़
जंगल जंगल
समतल समतल
बहती नदियां
अविरल अविरल

शहर शहर
और गांव गांव
डगर डगर
और नगर नगर
बहती नदियां
अविरल अविरल

नदी शक्ति है नदी प्रकृति
नदी भक्ति और प्रेम नदी हैं
रास नदी है आस नदी है
कृष्ण मिलन की प्यास नदी हैं
जाने कब से अविरल अविरल
बहती नदियां अविरल अविरल

नदी शांत और नदी सृजन है
नदी रौद्र और नदी ध्वंस है
जन्म नदी है मरण नदी है
पाप पुण्य के दो घाटों में
अनंत काल से अविरल अविरल
बहती नदियां अविरल अविरल

सूख गई है छूट गई है
धारा इसकी टूट गई है
खाली खाली और रुकी रुकी सी
बिन कलरव कलकल कलकल
जो बहती थी अविरल अविरल

आओ इसको पुनः जगाए
जल से इसको पुनः सजाए
नदी अभियान की अलख जगाकर
बन जाएं सब भगीरथ भगीरथ
फिर से बहे नदी हमारी
कलकल कलकल अविरल अविरल

— विवेक रीही


51. हमारी नदियाँ

हमारी नदियाँ बिलखती, क्रंदन करतीं।
हमारी नदियाँ हमसे प्रश्न करतीं।
क्यों न करते अपने व्यवहार सही।
जब प्यास लगे तो आ जाना यहीं।
न करना चिंता मेरे अस्तित्व का,
अरे मैं तो जन्मी तुम्हारे अस्तित्व के लिए।
सोचो वह दृश्य कितना भयावह होगा ,
जब धरती से मैं हो जाऊंगी विलुप्त।
तुम्हारा आज ,कल नही रहेगा।

सोचो, तुम्हारा कल जो तुम्हारी संतान का आज होगा
क्या छोड़ कर जाओगे, बंजर धरती, सूखे नाले?
उस पर तुम्हारा प्लास्टिक का युग।
घोट दिया नदियों का कंठ,
आगे न आऐंगे क्या जुग?
यह तो देखो नदियाँ क्या मांगे,
न पूजा पाठ न सेवा न भंडार ।
अरे हमें चाहिए, स्वच्छ दिल से आदर मात्र।
ना साबुन, ना केमिकल, ना फूल और पत्ते।
हमको चाहिए कल कल बहना,
वस् वच्छंद विचरने का पथ।

आने वाली पीढ़ी के लिए, भी तो कोई सोच रखो।
जल तो जीवन दायिनी है, क्या हमें मिटा के तब पछताओगे?
होश अभी कर लो, वरन् पछताते रह जाओगे।

— सूर्या विश्वनाथ

52. नदियों का करना हैं उत्थान

ना बन जाए रेगिस्तान
ये मेरा हिंदुस्तान
पावन से उस गंगा में
भरने वापस उसके प्राण …

मुहीम चली हैं शहर और गाँव
रिवर रैली हैं जिसका नाम …
सूखे पत्तों में फिर से आ जाए जान
लहरें फिर से हर खेत खलिहान
ना दे जान फिर से मेरे देश का किसान
ले लेते हैं मिलकर ये प्रतिष्ठान
नदियों का करना हैं उत्थान …

बूँद बूँद जल को बचाकर
आओ मिलकर भरते हैं सागर
कीमत जल की सबको हैं बतानी
जैसे दादा दादी सुनाते थे कहानी
ना तरसे मेरे भारत का एक भी कोना
फिर से मेरी धरती उगले सोना …
ऐसा करना हैं अब काम
नदियों का करना हैं उत्थान …

बंज़र ना हो मातृभूमी ये मेरी
शपथ माने आज हैं ले ली
गंगा जमना और सरस्वती
मात्र नदियाँ नहीं हैं सहेली

देवियों सा होता हैं इनका पूजन
सूखी माटी में बो देती हैं जीवन
हर प्राकृतिक आपदा का करने निदान
नदियों का करना हैं उत्थान

— नेहा पंवार

53. सुप्रभात

जीवन की उथल-पुथल
संवेदनाओं की लहरें
तट को ढूँढ़ती हुईं
उसके सीने में समा जाती हैं …

पानी जीवन पर्याय है
अविरल बहना प्रकृति
रुकना या ठहरना नहीं
उसकी प्रवृत्ति ….

बिन पानी के तट का
कोई महत्त्व नहीं
रेत से जीवन का बिखरना
शाद्वल की तलाश में ….

बहती नदिया जीवन सी
गुदगुदाता जिसे रेत
लहर-लहर खेलते हुए
हो जाता तट-बंधन ….

नदी तो जीवन-नाद है
रचयिता संग संवाद है
सूख जाना उसका
मृत्यु-दण्ड समान है ….

तट पे यूँ तीर न चलाओ
ये बंधन टूटने से
आएगी बाढ़ फैलेगा सैलाब
डूब जाएगी नैया ….

नदी दिव्य-स्पंदन है
वसुधा का गौरव है
हर लेती हर मन को
दे कर लहराती हरियाली ….

सच पूछो तो नदी की कलकल
‘सुप्रभात’ का वैभव है
नदी की हर धारा से प्रस्फुट
‘हरि’ के ही दर्शन हैं !!

— दिव्यांग पुरोहित

54. स्‍वच्‍छ समृद्ध भारत की शुभकामनाएं

रहे भू सदा हरी-भरी
महके सुमन-सी रहे खिली-खिली
वन, उपवन, खेतों से दमके हरी-हरी
रहे तरंगिनी कल कल करती जल से भरी-भरी

गंगा, यमुना, सरस्वती भारत की शान हैं
सिंधु, नर्मदा, तापी संस्कृति की पहचान हैं
गंडक, ब्रम्हपुत्र, गोमती सुख-समृद्धी के प्रमाण हैं
निर्मलता, शीतलता तरिणी के संस्कार हैं
कृष्णा, कावेरी, महानदी | सतलज, झेलम, साबरमती |
भारत की अमृतधार हैं |

कानन, पादप, पहाड़ से इनका आत्मसात हैं
धरा गौरवान्वित हैं इनके आच्छादन से
लेकिन हर दिशा में हाहा:कार हैं, निष्प्राण समाज है
असुरों के अत्याचार हैं, सर्वत्र त्राहिमाम हैं
सुधा की पुकार है, पूर्णविराम की माँग हैं
नदियों के नाले बनने पर लगी लगाम हैं
पुनर्निर्माण की अलख जगाने की पुकार हैं
कुदरत के गुणों को आत्मसात करने की गुहार हैं
प्रकृति से आलिंगन करने की चाह हैं

हर दिशा में झूमती डाली, हिलते पत्तें
हर डाली पर चिड़ियाँ चहके

हर कोना अब जुगनू से दमके
हर तड़ाग पर दिखे परिंदे
हर पहाड़ पर कानन झूमे
ऐसी अवनी की फ़रियाद हैं
ख़ुशहाली को वापस लाने की दरख़्वास्त हैं
हर नदी को पुनः बनाना तीर्थधाम हैं
सरिता से हर समय बहते रहने का सविनय भाव हैं
स्वच्छ, समृद्ध भारत बनाने की हुंकार हैं
सदगुरु जी के साथ निभाने की पुकार हैं |

— प्रगति एन भट्टड़