मामलों के अध्ययन और पहलें

वनों की कटाई जल उपलब्धता को कम करती है

पश्चिमी घाट क्षेत्र में आईआईएससी के एक अध्ययन से साफ पता चलता है कि शरावती नदी घाटी और कावेरी की उप नदी लक्षमणतीर्था की नदी घाटी, जिनके आस-पास खूब घना जंगल था, उनमें साल भर पानी रहा। लेकिन जिन धाराओं के पास से जंगल काट लिए गए थे  उनमें सिर्फ 4-6 महीने ही पानी रहा।

पश्चिमी घाट में वाराही नदी के एक भाग पर 2012 में हुए अध्ययन में पाया गया कि वन आवरण में थोड़ा सा भी बदलाव – 27 सालों में 9 फीसदी – नदी के प्रवाह की बफरिंग क्षमता को कम कर सकता है। वर्षा समाप्त होने के बाद नदी में पहले के मुकाबले कम दिनों तक पानी रहा और अधिक समय तक धाराएं सूखी रहीं।

ब्राजील में भी बारहमासी धाराओं के बीच-बीच में सूखने की घटनाएं हुईं। ऐसी ही स्थिति सत्रहवीं सदी में यूरोपीय शक्तियों द्वारा द्वीपों पर कब्जा किए जाने के बाद उनमें देखी गई।

वन रोपण से जल उपलब्धता बढ़ती है

हिसातु गांव, झारखंड के ग्रामीणों ने 365 एकड़ बंजर जमीन पर 100,000 पेड़ लगाए। उन्होंने 2010 में इसकी शुरुआत की और 2017 तक 40-50 लाख रुपये सालाना कमाए। नजदीक स्थित डोंबा नदी,  जो गर्मियों में सूख जाती थी, अब बारह महीने बहती है।

इसी तरह, पौड़ी गढ़वाल के उफ्रेनखाल गांव में रहने वाले लोगों ने अपना जंगल उगाया और एक नदी गढ़गंगा को फिर से जीवित कर दिया। इस योजना में पानी रिसने वाले गड़ढ़ों के आस-पास पेड़ लगाना था। इंडियावाटरपोर्टल के मुताबिक, ‘गड़ढों के आस-पास जो पेड़ लगाए गए थे, उन्हें उनमें जमे पानी से पोषण मिलता रहा। एक बार उगने के बाद उन्होंने मिट्टी और पानी को बनाए रखने में मदद की। गड़ढों और पेड़ों के बीच एक पारस्परिक लाभदायक संबंध विकसित हुआ, जिसने पूरे सिस्टम में नई जान भर दी।’

वेबसाइट ने नतीजों के बारे में बताते हुए लिखा, ‘अब वहां सूखी हुई दरारें नहीं दिखतीं। अब दंडखिल और गढ़ खड़क गांवों के बीच सीमा पर चलते हुए लगातार किसी नदी की संगीतमय ध्वनि सुनाई देती रहती है। यह गढ़गंगा है जो गांववालों ने गांववालों के लिए बनाई है। यह एक बारहमासी नदी है, जो अपने स्रोत के पास 3 लीटर प्रति मिनट का प्रवाह छोड़ती है। यह एक नल को पूरा खोलने पर उसके प्रवाह की जो दर होती है, उसका भी एक चौथाई है। यह काफी कम है, लेकिन जब यह नदी ढलानों से होते हुए नीचे की ओर बहती है, तो उसमें पानी बढ़ने लगता है। इस नदी के पानी को एक नहर के जरिये सिंचाई के लिए प्रयोग में लाया जाता है और साथ ही सूखे के समय पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मिट्टी के कटाव और वर्षा के जल को बह जाने से रोकने के लिए जो यह कोशिश की गई है, उसके कारण कई नए झरने भी जन्मे हैं, जिनकी गिनती अभी बाकी है।

यह वाकई एक चमत्कार है। जिस इलाके में बार-बार सूखते हुए झरनों और गायब होती नदियों की बात की जाती है, इस प्रयास ने दिखा दिया है कि चमत्कार वाकई हो सकते हैं।

तमिलनाडु में अरुणाचल की पवित्र पहाड़ी, जहां रमन महर्षि ने अपना अधिकांश जीवन बिताया, के जंगल पिछले कुछ दशकों में काफी हद तक समाप्त हो चुके हैं। सरकार के सहयोग से एक एनजीओ ने यहां वनरोपण का जिम्मा उठाया है। पेड़ों की संख्या बढ़ने से वर्षा के जल की बर्बादी जबर्दस्त तरीके से कम हुई है क्योंकि मिट्टी अब अधिक पानी सोखती है। मौसमी धाराएं अब धीमी गति से और स्थिरता से तथा मानसून के जाने के बाद अधिक दिनों तक बहती हैं और इससे अधिक पेड़ जीवित रह पाते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने 2015 में यह रिपोर्ट दी कि विशेषज्ञों ने गंगा के जलप्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए पेड़ों का एक बफर जोन बनाए रखने का सुझाव दिया है। उस रिपोर्ट से: ‘इस सप्ताह की शुरुआत में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के विशेषज्ञ वन अनुसंधान संस्थान में मिले और 2525 किमी लंबी नदी में इकोलॉजिकल फ्लो बनाए रखने के लिए वन लगाने की मांग की। यह परियोजना केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के अंतर्गत गंगा की सफाई के राष्ट्रीय मिशन का एक अंग है।

एफआरआई निदेशक पीपी भोजवैद ने अखबार को बताया, ‘नदी के दोनों ओर मौजूद खेत नदी में तलछट बढ़ाते हैं। लेकिन किनारों पर लगे पेड़ नदी में पानी की मात्रा को बढ़ाने में मदद करते हैं। पेड़ों की प्रेसिपिटेशन प्रक्रिया इसे और तेज करती है।’

भोजवैद के अनुसार, पेड़ नमी को सोख लेते हैं, जो समय के साथ इकट्टठा हो जाती है। उन्होंने कहा कि जंगल किसी नदी को पैदा कर सकते हैं जैसा कि गोदावरी के मामले में हुआ था। वह जंगल से निकलती है, किसी ग्लेशियर से नहीं।

उन्होंने केरल और कई दूसरे देशों का उदाहरण भी दिया जिन्होंने अपनी नदियों के तटों पर पार्क और जलग्रहण क्षेत्र विकसित किए हैं।

सरकारी पहलें

गंगा वृक्षारोपण: नवंबर 2016 में केंद्र सरकार ने घोषणा की कि पांच राज्यों में गंगा नदी और उसकी उपनदियों के किनारे पेड़ लगाए जाएंगे और इससे जुड़े अन्य कार्यकलाप किए जाएंगे।

इस पहल में नदी के दोनों तटों पर 5 किलोमीटर और उसकी प्रमुख उपनदियों के किनारे 2 किलोमीटर के अंदर मौजूद स्थानों पर पौधे लगाने की योजना है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के वन विभाग ने ऐसे 6197 स्थानों की पहचान की है। इस पहल में पांच सालों में पांच राज्यों में 133,751 हेक्टेयर जमीन पर पेड़ लगाने की योजना है। कुल 4 करोड़ पेड़ लगाए जाएँगे।

खेतों में आर्थिक रूप से लाभदायक पेड़ लगाए जाएंगे। शहरी इलाकों में धाराओं का जैव उपचार और जैव फिल्ट्रेशन यानि जैविक स्वच्छता, नदियों के तटों का विकास यानि रिवरफ्रंट का विकास, इकोपार्क विकास, संस्थागत और औद्योगिक इस्टेट वृक्षारोपण किए जाएंगे। सरकारी जमीन पर हर राज्य अपने इकोसिस्टम पर आधारित एक मॉडल विकसित करेगा।

बिहार : इस गंगा वृक्षारोपण अभियान के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव जमा करने वाला बिहार पहला राज्य था। इस परियोजना में 1150 करोड़ रुपये की लागत आएगी। नदी के किनारे सरकारी जमीन पर वृक्षारोपण, निजी जमीन पर कृषि वानिकी और मिट्टी संरक्षण इस पहल के तीन पहलू हैं। इसमें शहरी इलाकों में नदी की सफाई और नदी के तटों का विकास या रिवरफ्रंट विकास भी शामिल है।

लगभग 3000 हेक्टेयर सरकारी जमीन और 200 हेक्टेयर निजी जमीन पर वृक्षारोपण किया जाएगा। सरकारी जमीन पर तीन प्रकार के वृक्ष लगाए जाएंगे: तट के पास औषधीय पौधे, उसके आगे बांस के पेड़ और सबसे बाहरी इलाके में सामान्य पेड़। वृक्षारोपण की चौड़ाई जमीन की उपलब्धता के हिसाब से तय की जाएगी।

निजी जमीन के मामले में किसानों को कृषि वानिकी के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। वन विभाग सब्सिडी के जरिये सहायता प्रदान करेगा।

केरल: केरल ने अपनी नदियों को पुनर्जीवित करने और तटों के स्थिरीकरण के लिए 3 सालों में 2.57 करोड़ रुपये की लागत से बांस के बागान लगाए। यह योजना नवंबर 2014 में शुरू हुई थी। केरल की सभी नदियों के ऊपरी इलाके जंगली हैं। वन विभाग की योजना है कि जहां जंगल नहीं हैं, वहां वृक्षारोपण के लिए स्थानीय स्व-शासन समूहों, गैर सरकारी संगठनों, नागरिक समूहों और लोगों को प्रोत्साहित किया जाएगा । इसके लिए आर्थिक सहायता दी जाएगी। मनरेगा के जरिये भी निधियों का उपयोग किया जा सकता है। सुरक्षा और पौधे लगाने के बाद उसकी देखभाल की जिम्मेदारी वृक्षारोपण करने वाले संगठन या व्यक्ति की होगी। समझौता ज्ञापन के माध्यम से उन्हें आर्थिक सहयोग दिया जाएगा।

आंध्र प्रदेश: तटीय और नदी क्षेत्रों में हवा की रफ्तार को कम करने और प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान को सीमित करने के लिए कैजुआरिना वृक्षारोपण की योजना है। कैजुआरिना तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियां हैं। उनमें नाइट्रोजन को अपने अन्दर सोखने की क्षमता होती है। वन विभाग संयुक्त वन प्रबंधन के तहत वन संरक्षण समितियों को वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

वृक्षारोपण वाले क्षेत्र में पेड़ों के साथ-साथ मूंगफली, खीरा, तरबूज, तिल और दालों को लगाने की अनुमति है। नाबार्ड की सहायता से बैंक इसके लिए आर्थिक सहायता दे रहे हैं। यह देखते हुए कि पहले चार साल किसान को कोई आय नहीं होती, ऋण और ब्याज को पांच साल समाप्त होने के बाद चुकाया जा सकता है।

छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ में, 2015 में वन विभाग ने 5 करोड़ पौधे लगाने की योजना बनाई। मुख्य मंत्री रमन सिंह ने नदी तटों पर पौधे लगाने पर जोर दिया।

महानदी के लिए वन विभाग की जलवायु परिवर्तन शमन योजना के अनुसार, ‘नम जमीन पर खराब हो चुके बांस के वनों को फिर से लगाए जाने को प्रोत्साहित किया जाएगा।’ दूसरे उपायों में, ‘अलग-अलग जल संरक्षण और दोहन ढांचे बनाते हुए पानी को व्यर्थ बहने से रोकने के उपाय किए जाएंगे। साथ ही जलग्रहण क्षेत्र का उपचार तथा मौजूदा जलाशयों का रखरखाव भी किया जाएगा। मिट्टी का कटाव कम करने के लिए पेड़-पौधे लगाने को प्रोत्साहित किया जाएगा।’

राजस्थान: जनवरी 2016 में, सरकार ने 2020 तक राज्य को सूखा मुक्त बनाने के लिए मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान (एमजेएसए) आरंभ किया। छह महीने के भीतर, राज्य के 21,000 गांवों में से 3529 में 94941 वाटर हारवेस्टिंग यानि जल दोहन ढांचे बनाए गए।

एमजेएसए की मुख्य विशेषता यह है कि यह अलग-अलग सरकारी विभागों की सभी जल संबंधी परियोजनाओं को अपने नीचे लाता है ताकि उन्हें असरदार तरीके से लागू किया जा सके। एमजेएसए के अंतर्गत कोई नया निर्माण नहीं हो रहा है। रिज में जल ग्रहण क्षेत्र से लेकर घाटी, जहां अतिरिक्त जल बहता है, तक जल के संरक्षण और हारवेस्टिंग या दोहन के लिए एमजेएसए ‘रिज टू वैली’ उपाय को अपनाता है।

इन सभी वाटर हारवेस्टिंग निर्माणों के आस-पास 28 लाख पेड़ लगाए गए। वन विभाग को पंचवर्षीय रखरखाव योजना सौंपी गई है, जो इस परियोजना के तहत पेड़ लगाने के लिए नोडल एजेंसी है। इस कार्यक्रम की एक मूलभूत विशेषता यह रही है कि योजना, क्रियान्वयन और रखरखाव – सभी चरणों में लोगों को शामिल किया गया। अधिकारियों और इंजीनियरों के साथ गांव के निवासियों, जो वाटर हारवेस्टिंग विधियों के बारे में अच्छी तरह जानते हैं, ने भी सर्वेक्षण में भाग लिया। यह सर्वेक्षण स्थान और उस इलाके के अनुकूल वाटर हारवेस्टिंग ढांचा तय करने के लिए कराया गया। इससे सबसे उपयुक्त वाटर हारवेस्टिंग ढांचों का चयन हो पाया।

इन ढांचों का स्थान तय करने के लिए भूमिगत जल स्तर, मिट्टी की नमी, भौगोलिक स्थिति और वर्षा के बारे में आंकड़े प्राप्त करने के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और रिमोट सेंसिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है। परियोजनाओं को ट्रैक करने के लिए जियो टैगिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है और सरकार द्वारा इसकी प्रगति को ऑनलाइन प्रकाशित किया जा रहा है।

गुजरात: गांव की अप्रयुक्त जमीन पर जंगल लगाए गए और बंजर इलाकों में फिर से वन रोपण किया गया। नहरों, नदियों और झीलों के किनारे पेड़ लगाए गए। निजी और खराब हो चुकी कृषि भूमि पर भी वृक्षारोपण किया गया।

2011 में गुजरात ने मनरेगा निधियों का इस्तेमाल करते हुए खेतों पर प्रति हेक्टेयर 400 पेड़ उगाने के लिए फार्म फॉरेस्ट्री योजना शुरू की। इसे बढ़ावा देने और किसानों को शिक्षित करने के लिए हर साल 750 किसान शिविर आयोजित किए गए।

महाराष्ट्र: महाराष्ट्र को हरा-भरा बनाने के लिए महाराष्ट्र ने ईशा फाउंडेशन के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया है। सरकार की 2019 तक 50 करोड़ पेड़ लगाने की योजना है।

मध्य प्रदेश: नर्मदा नदी की स्थिति के बारे में लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने और इंसानों तथा नदियेां के बीच संबंध को प्रदर्शित करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहार ने नर्मदा सेवा यात्रा शुरू की। मध्य प्रदेश सरकार ने ईशा फाउंडेशन की मदद से नर्मदा को पुनर्जीवित करने की एक व्यापक योजना शुरू की है। इसमें किसानों को बागवानी अपनाने के लिए सहायता दी जाएगी और नदियों के तटों पर सरकारी जमीन में जंगली पेड़ लगाए जाएंगे।

विदेशी धरती पर

अमेरिका: वर्जीनिया स्टेट ने प्रदूषण को जलमार्गों में घुसने से रोकने, नदियों के तटों को मजबूत बनाने, वन्य जीवन को भोजन और आवास प्रदान करने तथा गर्म मौसम के समय धाराओं को ठंडा रखने के लिए फेयरफैक्स काउंटी में एक नदीतटीय वनीकरण (रिपेरियन रिफॉरेस्टेशन) परियोजना के लिए आर्थिक मदद की। 800 मील तक पेड़ों की पट्टियां लगाई गई हैं। इस योजना में और 15,000 मील तटीय बफर लगाए जाने हैं।

यूनाइटेड स्टेट्स के अधिकांश वन विभाग प्रवाहों के तटों पर पेड़ लगाने और उनके रखरखाव को प्रोत्साहित करते हैं। कन्सास वन सेवा के अनुसार, ‘प्रवाह के तट पर मौजूद पेड़ पर्यावरण के साथ-साथ भूस्वामियों को भी ढेर सारे फायदे देते हैं। जल की गुणवत्ता में वृद्धि होती है, तट मजबूत बनते हैं, वन्यजीवन को आवास मिलता है और मनोरंजन की गतिविधियां भी बढ़ती हैं। लकड़ी और दूसरे वन्य उत्पादों के उत्पादन से इन इलाकों से एक स्थायी आय भी हो सकती है।’

यूरोपीय संघ: डैन्यूब नदी में नई जान लाने के लिए यूरोपीय सरकार की एक परियोजना है। उसका एक मुख्य घटक इंसानी गतिविधियों से प्रभावित प्राकृतिक इकोसिस्टम को बहाल करना है। इसका तरीका है, डैन्यूब नदी से सटे हुए एक इकोलॉजिकल कॉरिडोर रिवर ग्रीनवे यानी हरी पट्टी की स्थापना।

इंग्लैंड: उत्तरी यॉर्कशायर में पिकरिंग के नगरनिगम अधिकारियों ने बाढ़ की घटनाएं कम करने के लिए वृक्षारोपण का उपाय अपनाया। बाकी इलाकों में स्थिति इससे उलटी है, जहां भारी बारिश तबाही लाने वाली बाढ़ लाती है। इस प्रयास को ‘स्लोइंग द फ्लो’ अर्थात प्रवाह को धीमा करना कहा गया है। इस योजना के एक विश्लेषण से पता चला कि इन उपायों ने चरम पर नदी के प्रवाह को 15-20 फीसदी कम कर दिया। 10 साल में चार बार भयानक बाढ़ आने के बाद 2009 में यह योजना शुरू की गई। 2007 में आई बाढ़ ने लगभग 70 लाख पौंड का नुकसान किया था।

इस योजना में 40,000 पेड़ लगाना और हीदर मूरलैंड (दलदली जमीन) की बहाली शामिल है। इन सभी का मकसद नदी में जल प्रवाह को धीमा करना और बाढ़ की भयावहता को कम करना है। इस परियोजना पर सरकार 500,000 पौंड खर्च करेगी। हाल के सालों में बाढ़ की जो भयंकर घटनाएं हुईं, उसके बाद बाढ़ के जोखिम को कम करने के लिए अधिक प्राकृतिक दृष्टिकोण अपनाया गया।

इस अध्ययन के प्रमुख लेखक बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के साइमन डिक्सन ने कहा, ‘हमारा मानना है कि बाढ़ का जोखिम कम करने में वृक्षारोपण बहुत बड़ा योगदान कर सकता है। इसे एक व्यापक बाढ़ प्रबंधन दृष्टिकोण का हिस्सा होना चाहिए जिसमें पारंपरिक बाढ़ सुरक्षा शामिल हो। वृक्षारोपण संवेदनशील इलाकों तक बारिश के पानी के प्रवाह को धीमा करने में मदद कर सकता है।’

पाकिस्तान: अप्रैल 2016 में पाकिस्तान में मूसलाधार बारिश और भूस्खलन से 140 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और संपत्ति को नुकसान पहुंचा। माना जा रहा है कि वनों की कटाई और पहाड़ी ढलानों के कटाव से विनाश की गंभीरता और बढ़ गई। पर्यावरणविदों के अनुसार, ‘हालांकि जलवायु परिवर्तन वर्षा की तीव्रता को बढ़ा रहा है, मगर दुर्भाग्य से वनों की कटाई बड़े पैमाने पर नुकसान को बढ़ावा देती है।’

इस अनुभव के बाद, इमरान खान की अगुआई में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी ने उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा (केपी) प्रांत में ‘हरित विकास पहल’ शुरू की। इस पहल के तहत, पार्टी साठ सालों से चल रही वनों की कटाई को उलटना चाहती है। बड़े पैमाने पर वनरोपण परियोजना शुरू की गई, जिसका नाम ‘द बिलियन ट्री सुनामी’ रखा गया।

निजी नर्सरियों में जून 2015 से अब तक करीब 25 करोड़ पौधे उगाए गए हैं। बाकी 45 करोड़ पौधे वन क्षेत्र में कुदरती तौर पर उगाए जा रहे हैं, जिनकी देख रेख स्थानीय समुदाय कर रहा है। इलाके के लगभग हर जिले में ऐसी नर्सरियां मौजूद हैं। अधिकांश निजी हैं और उनकी मांग बढ़ रही है।

थर्डपोल के अनुसार, ‘युवा नर्सरियां’ पैकेज में, प्रांतीय सरकार लगभग 25000 पौधों और साथ ही 25 फीसदी अग्रिम लागत के साथ किचन नर्सरी स्थापित करने के लिए बेरोजगार युवाओं या ग्रामीण महिलाओं के साथ एक सुरक्षित वापसी खरीद समझौता करती हैं। इसके बाद नर्सरी हर माह 12000 से 15000 पाकिस्तानी रुपये की कमाई कर सकती है, जो उस इलाके के हिसाब से अच्छी-खासी रकम है। वास्तव में अधिकांश छोटी या घरेलू नर्सरियां फिलहाल ग्रामीण महिलाओं द्वारा चलाई जा रही हैं, जो अपनी आमदनी बढ़ाने में सफल हुई हैं।’

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ सरकार की इस कोशिश में मदद कर रही है। इमरान खान ने ‘एक पेड़, एक जीवन’ पहल भी शुरू की जिसके तहत बच्चों को पौधे लगाने और पेड़ों की देखभाल करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

पाकिस्तान की संघ सरकार भी ‘ग्रीन पाकिस्तान प्रोग्राम’ के साथ इसमें योगदान दे रही है, जिसका मकसद पांच साल में 10 करोड़ पेड़ लगाना है।

दुनिया भर में कृषि वानिकी नदी वाटरशेड या नदी जल-विभाजन मैनेजमेंट का एक असरदार उपाय साबित हुआ है। कई जगहों पर अध्ययन करवाए गए हैं। इंडोनेशिया अपने वाटरशेड को फिर से हरा-भरा करने के लिए 1970 से एक कार्यक्रम चला रहा है, जो पेयजल, सिंचाई और देश के सबसे गरीब समुदायों की मदद करने वाले अन्य कार्यकलापों के लिए महत्वपूर्ण है। इन इकोलॉजिकल या पर्यावरण सम्बन्धी फायदों के अलावा, किसानों को अधिक उपज, बढ़ी हुई आमदनी, जलवायु परिवर्तन में संतुलन, प्राकृतिक वनों पर कम निर्भरता, पेड़ों में चिड़ियों के घोंसलों के कारण कीड़ों की कम घटनाएं और अधिक जैवईंधन उत्पादन के रूप में लाभ हुए हैं।

 

References