आदियोगी – एक प्रतिष्ठित उपस्थिति

शिव एक तरह से तीसरे नेत्र के प्रतीक हैं। उनके अनेक नामों में से एक नाम त्रयम्बक या त्रिनेत्र भी है, जिसका मतलब है तीसरी आंख वाला। तीसरी आंख की वजह से ही वे उसे भी महसूस कर सकते हैं, जो ‘है ही नहीं’। ‘जो है’ वह एक भौतिक अभिव्यक्ति है और ‘जो है ही नहीं’ वह अभौतिक। अभी आप जिन चीजों को अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियों से नहीं महसूस कर सकते, वह आपके अनुभव में नहीं है। अगर इंसान कोशिश करे तो वह उसे भी देख सकता है, जो ‘है ही नहीं’, जो भौतिक नहीं है – यानी शि-व को। अभी हम जो भी हैं उससे और ज्यादा होने की चाहत ने कई जानें ली हैं, इसके चलते कई प्रजातियां खत्म हो गईं। यहां तक कि इसकी वजह से इस धरती का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है। पैसा, संपत्ति, रिश्ते, परिवार या ऐसी किसी भी चीज को इकठ्ठा करना या जोड़ना आपको ज्यादा या बड़ा होने का अहसास तो करा सकता है, लेकिन सिर्फ दूसरों की तुलना में। इन सब चीज़ों से आपका अपना कोई विस्तार नहीं होता। जीवन के अनुभव करने के तरीके में विस्तार केवल तभी आता है, जब आपका बोध या अनुभूति बढ़ती है।

हम लोग आदियोगी को मूर्तिरूप में प्रतिष्ठित कर दुनिया में उनकी मौजूदगी को साकार करने की योजना बना रहे हैं, ताकि लोग समझ सकें कि केवल बोध या अनुभूति ही जीवन को सही मायने में विस्तार देती हैं। हम लोग फिलहाल आदियोगी की 112 फुट ऊंचे चेहरे को बनाने के काम में लगे हैं। 112 की यह संख्या हमारे अस्तित्व के लिए प्रतीकात्मक और वैज्ञानिक दोनों ही रूपों से महत्वसिस्टम में मौजूद 112 चक्रों पर काम करना होता है। आदियोगी की यह मूर्ति इस धरती पर सबसे बड़ी शक्ल होगी। आदियोगी की मूर्ति के साथ ही उन पर लिखी गई एक किताब भी सामने आएगी और उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में उन पर एक फिल्म भी बन कर आ जाए।

शिव के चेहरे को प्रतिष्ठित करने के पीछे मकसद दुनिया में एक और स्मारक या इमारत खड़ी करना नहीं है, बल्कि इसे एक जबरदस्त शक्ति के रूप में इस्तेमाल करना है, जो इस दुनिया के विश्वासियों को खोजियों में बदल सके। खोजी – जो जीवन व उससे परे की सच्चाई की खोज कर सकें। आप जानते हैं कि ये आंख बंद कर के विश्वास करने वाले लोग कैसी भयानक चीजें करने में सक्षम होते हैं। इस धरती पर जितने भी संघर्ष हुए हैं, वे एक व्यक्ति के विश्वास बनाम दूसरे व्यक्ति के विश्वास के टकराव के चलते हुए। हालांकि कुछ लोग इन्हें अच्छाई व बुराई का संघर्ष कहना चाहेंगे। जैसे ही आप किसी एक चीज में अपना विश्वास निश्चित कर लेते हैं, चाहे वह चीज कुछ भी हो, आप बाकी हर चीज के प्रति अपनी अंाखें मंूद लेते हैं, । विश्वास के सिस्टम को काम करने के लिए एक झुंड या समूह की जरूरत होती है। अगर आप अपनी बुद्धि लगाकर सोचेंगे तो वह विश्वास भरभराकर गिर पड़ेगा। जिज्ञासा की प्रकृति व्यक्तिगत होती है। हर इंसान को अपने भीतर ही खोज करनी होती है।

सबसे जरुरी यह है कि इस संस्कृति को कुछ इस तरह से बनाया जाए, कि यहां हमेशा अकेले व्यक्ति खोजियों के रूप में मिलें, कभी कोई धर्म महत्वपूर्ण न हो। जिज्ञासुओं के बारे में अच्छी बात यह होती है कि वे प्रसन्नतापूर्वक भ्रमित रहते हैं। जब आपको किसी चीज की तलाश रहती है तो आपको उसको पाने की कोशिश में लगे रहते हैं, आपके पास लड़ने के लिए कुछ नहीं होता। आज दुनिया में इस चीज की सख्त जरूरत है। आज जिस तरह से इंसान सशक्त हुआ है, ऐसे में हमारे पास रचने और विनाश करने की जबरदस्त क्षमता है। जब हम कुछ खोजने व पाने की कोशिश में लगे होते हैं तो हम चीजों का निर्माण करते हैं। जब हम लड़ते हैं तो हम चीजों का विनाश करते हैं। विश्वास करने का मतलब एक ऐसे आयाम के बारे में निश्चित होना है, जिसके बारे में आपको कुछ पता ही नहीं है। विश्वास आपको बिना स्पष्टता के, आत्मविश्वास देता है, जो कि विनाशकारी है। जिज्ञासा का मतलब है- चेतनापूर्वक निश्चितता से अनिश्चितता की ओर बढ़ना। जब आप हमेशा किसी नए इलाके में कदम रख रहे होते हैं तो इसका मतलब है कि आप सचमुच प्रगति कर रहे हैं। अगर इलाका जाना-पहचाना है तो आपमें निश्चितता आ जाती है। जब आप किसी एक जगह का ही बार-बार चक्कर लगाते हैं तो जाहिर है कि आप कहीं और नहीं जा रहे हैं। जो लोग जिंदगी के विभिन्न आयामों को खंगाल रहे होते हैं, वे हमेशा अनिश्चित होते हैं। महान वैज्ञानिक हमेशा किंतु व परंतु के रूप में बात करते हैं।

हम लोग अगली शिवरात्रि यानी 24-25 फरवरी 2017 को आदियोगी की इस प्रतिमा का अनावरण करेंगे। इस निर्धारित समय तक काम को पूरा करने के लिए लोग यहां दिन-रात काम कर रहे हैं। हम इस प्रतिमा को दुनिया को लोकार्पित करेंगे। यह अपने आप में जीवन की अभूतपूर्व घटना होगी। आप में से जो लोग ध्यानलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा का अनुभव करने का अवसर चूक गए थे, उनके लिए यह काफी कुछ उसी तरह का अनुभव करने का मौका होगा। साथ ही दुनिया में आदियोगी के बारे में जितना हो सके उतना प्रचार करने का भी मौका होगा। यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हमारी आने वाली पीढ़ी विश्वासियों की न हो, जिज्ञासुओं की हो। अगली पीढ़ी ऐसे विश्वासियों की न हो, जो किसी ऐसे काल्पनिक स्वर्ग की चाहत में रहें, जहां वे सिर्फ मरने के बाद ही पहुंच सकते हैं। विश्वास यही करता है, यह आपको उन चीजों के बारे में इतना सुनिश्चित बना देता है, जिनके बारे में आप कुछ नहीं जानते। दुनिया में एक नई जागरूकता की शुरुआत की दृष्टि से आदियोगी बेहद महत्वपूर्ण हैं। एक नई जागरूकता – जिसमें आत्म-रूपांतरण के साधन आम लोगों को उपलब्ध होंगे। जिस तरह से आज दुनिया के ज्यादातर लोग जानते हैं कि दांतों को साफ कैसे रखा जाए, वैसे ही उन्हें पता होना चाहिए कि कैसे वे अपने आप को शांतिमय और प्रसन्न रख सकते हैं। इंसान को अपने शरीर और मन को संभालना जरूर आना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो इंसान खुद में एक जबरदस्त संभावना, एक अद्भुत क्षमता होगा।

फिलहाल लोग हर चीज को एक संघर्ष में बदलने में सक्षम हैं और इसकी वजह है कि उनके पास आत्म-रूपांतरण के साधन नहीं है। अब वक्त आ गया है कि हम बदलाव लाएं और इसकी शुरुआत अपने घरों और अपने सामाजिक परिवेश से करें। इसके लिए हम ऐसी संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं, जहां हम इस बात पर ज्यादा ध्यान दे सकें कि इंसानी तंत्र कैसे काम करता है। अगर आप यह समझ लेते हैं कि आपका सिस्टम कैसे काम करता है तो आप कई शानदार तरीकों से इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। वर्ना आप एक इत्तेफाक वाली जिंदगी जिएंगे, जिसका मतलब है कि आप स्वाभावित तौर पर बैचेन और व्याकुल रहेंगे। उस स्थिति में सबसे आसान चीज़ें भी एक जबरदस्त संघर्ष होंगी। आज ज्यादातर इंसान क्या कर रहे हैं? वे जीवन-यापन के लिए कमा रहे हैं। अगर उनकी इच्छा होती है तो वे बच्चे पैदा करते हैं। उसके बाद वे एक दिन मर जाएंगे। इस धरती का हर दूसरा जीव भी यही कर रहा है, बल्कि कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से कर रहा है। मुद्दा यह नहीं है कि इंसान ने जो भी चीज बनाई है, वह हर चीज खराब है। विज्ञान और तकनीक मूल रूप से दुनिया के लिए क्या कर सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका इस्तेमाल कैसे लोगों के हाथ में है। असली मुद्दा यह है कि ऐसे लोग तैयार किए जाएं, जो इस विज्ञान और तकनीक का समझदारी पूर्ण ढंग से इस्तेामल करते हुए न सिर्फ अपने जीवन को बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकें, बल्कि इस धरती के दूसरे जीवों के जीवन को बेहतर कर सकें। न कि वे इन चीजेां को इस्तेमाल इस तरीके से करें कि वह अपने और अपने आसपास के जीवों के जीवन के लिए विनाशकारी साबित हों। वे इनका इस्तेामल ऐसे न करें, जिससे वे अपने लिए और आसपास के जीवों के लिए पीड़ा और समस्याओं का कारण बनें, जैसा कि आज हर तरफ हो रहा है।

आपने गौर किया होगा कि पिछले दो से तीन सालों में गर्मियो के दिन पहले की तुलना में सामान्य से कहीं ज्यादा गर्म थे। यहां तक कि हिमालय के इलाकों में भी आप ऐसा देख सकते हैं। भगीरथ नदी के उद्गम स्थान गोमुख में एक बर्फीली गुफा के मुहाने से पानी ऐसे निकलता था, जैसे कोई फव्वारा हो। यहां अब बर्फ इस कदर पिघल चुकी है कि आप इस गुफा के भीतर एक मील तक पैदल चल सकते हैं। यहां से सिर्फ एक पतली सी धार बाहर निकल रही है। पहले यहां की कई चोटियां जो पूरे साल बर्फ से ढंकी रहती थीं, वे कुछ महीनों को छोड़कर बाकी समय लगातार खाली रहती हैं। वहीं कावेरी नदी साल के तीन महीने समुद्र तक पहुँच ही नहीं पाती। सिर्फ एक ही पीढ़ी में हमने हजारों सालों से चली आ रही सदाबहार नदियों को मौसमी बना दिया। आखिर इन सबका क्या मतलब है, इसका सीधा सा मतलब है कि आज हमारे पास विज्ञान और तकनीक के उपलब्ध साधन गैर जिम्मेदार लोगों के हाथों में हैं। आज हमें और ज्यादा विज्ञान और तकनीक की जरूरत नहीं है, बल्कि जरूरत है एक-एक व्यक्ति के रूपांतरण की। आने वाले दशक में अगर रूपांतरण के साधन बड़े पैमाने पर प्रसारित नहीं किए गए तो हमारे बच्चों के लिए दुनिया में अच्छे तरीके से रहना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जाएगा।

हम लोगों ने हाल ही में नए सौर चक्र में प्रवेश किया है। अगले बारह साल कई तरीके से इस धरती के लिए आध्यात्मिक आंदोलन की दृष्टि से सुनहरे युग बनने जा रहे हैं। अगर हम आगामी दशक में सही चीजें करें तो हमें परिणाम आसानी से मिलेंगे। आज मानव बुद्धि जितनी तैयार है, आज से पहले कभी ऐसी नहीं रही। चीजें अपने आप घटित हो रही हैं, इत्तेफाक से 2016 की स्थितियां कुछ वैसी ही हैं, जैसी तब थी, जब आदि योगी ने पहली शिक्षा दी थी। ये सारी चीजें हमारे लिए अच्छी हैं। मेरी यह कामना और आशीर्वाद है कि बतौर पीढ़ी हमें अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए इसे साकार कर सकने का सौभाग्य प्राप्त हो। हम लोग आदियोगी की प्रतिष्ठित मौजूदगी से इसे साकार करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि हम उन्हें एक भगवान के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, हम उन्हें एक योगी की तरह देखते हैं। भगवान का मतलब हुआ कि आप उनकी पूजा करें। जबकि योगी का मतलब एक संभावना है। इसके लिए हम लोग एक ऐसा स्थान तैयार करना चाहते हैं, जहां रूपांतरण के साधन हर उस व्यक्ति को उपलब्ध रहेंगे, जो यहां आना चाहेगा, भले ही वह किसी भी धर्म, जाति, लिंग, पंथ या संप्रदाय का हो। ऐसा पहला प्रयोग अमेरिका के टेनेसी स्थित ईशा केंद्र में हुआ है। जहां कोई चमत्कार नहीं होता, जहां कोई अर्जी या मुराद नहीं मांगी जाती, वहां सिर्फ साधना होती है। लेकिन वहां आने वाले लोगों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

अगर हम जरुरी माहौल तैयार कर लेते हैं, तो ऐसे स्थान, जहां लोगों को अपने आत्म-रूपांतरण के साधन मिल सकें दुनिया में हर जगह संभव हो जाएँगे। अगर आवश्यक निष्ठा व समर्पण और एक शक्तिशाली जगह तैयार हो जाती है तो लोग निश्चित तौर पर आएंगे। आज पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा लोग जिज्ञासु हो रहे हैं – वे खोज रहे हैं। अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा लोग समाज में प्रचलित विश्वासों या मतों से निराश हो रहे हैं और उनका मोह भंग हो रहा है। हालांकि लोगों का एक बड़ा समूह आज भी अपने विश्वासों से चिपका हुआ है, भले ही वे विश्वास उनके किसी काम नहीं आ रहे हैं, उनसे उनका कुछ भी भला नहीं हो रहा है। इसकी वजह बस इतनी है कि लोगों के पास इसका कोई बेहतर विकल्प नहीं है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन्हें बेहतर विकल्प मुहैया कराएं, क्योंकि इसी में दुनिया की बेहतरी व भलाई है।

अगर हमें एक शांतिमय दुनिया चाहिए तो इसके लिए हमें शांतिप्रिय लोग चाहिए। अगर हमें प्रेममय दुनिया चाहिए तो इसके लिए हमें प्रेममय लोग चाहिए। अगर हमें एक समझदार दुनिया चाहिए तो इसके लिए हमें समझदार लोग चाहिए। अगर हम एक ऐसी मानवता बनाना चाहते हैं, जिनके साथ हम रहना चाहें, जिनसे हम इस दुनिया को बसाना चाहें, और हम चाहते हैं कि जिन लोगों के साथ हमारे बच्चे रहें, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आने वाले दस से बारह सालों की अवधि में हर बच्चा दस या बारह साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते इस सरल सी प्रकिया को सीख ले, जिसमें वह आंख बंद कर कम से कम आठ-दस मिनट चुपचाप स्थिर होकर एक जगह बैठ सके। इस धरती पर हर इंसान को आत्म-रूपांतरण के कुछ आसान से साधनों या तरीकों की जानकारी होनी चाहिए। जब तक हम उनके जीवन में इसे नहीं लाएंगे, तब तक हिंसा व विनाश जारी रहेगा और दुनिया में यह कई गुना तक बढ़ता रहेगा। एक अनुमान के अनुसार, साल 2050 तक इस धरती पर अनुमानित आबादी लगभग 9.7 अरब होगी। धरती पर जितनी भीड़ बढ़ेगी, उतने ही गंभीर हालात होंगे। अगर हमें आस-पास रहना है तो यह बेहद जरूरी है कि लोग जितना हो सके, उतने खुशमिजाज, शांतिमय और प्रसन्न हों। इसीलिए रूपांतरण के ये साधन इतने ज्यादा महत्वपूर्ण हो उठे हैं।

मैं चाहता हूं कि आप सब मिल कर किसी तरह से यह सुनिश्चित करें कि इस दुनिया में हर व्यक्ति आदियोगी के लोकापर्ण के बारे में जाने। ऐसा नहीं है कि जैसे ही लोग आदियोगी के चेहरे को देखेंगे, वे योग करना शुरू कर देंगे, लेकिन ‘आदियोगी’ शब्द धीरे-धीरे उन पर काम करेगा। पूरी दुनिया को पता लगना चाहिए कि एक खुशमिजाज और सुखद इंसान बनाने के लिए कोई कदम उठाया गया है। किसी भी पीढ़ी के लिए यह सबसे बुनियादी काम है कि वह इस दुनिया को, जैसी उन्हें मिली थी, उससे बेहतर बनाकर यहां से जाए। अगर हम पर्यावरण की दृष्टि से बात करें तो हमारे जीवनकाल में इसे जितना नुकसान हो चुका है, उसे हम वापस पलट तो नहीं सकते, लेकिन हम कम से कम लोगों को बेहतर हालात में तो छोड़ सकते हैं। अगर लोग शांतिमय और प्रेममय होंगे तो मुझे विश्वास है कि वे पर्यावरण को भी सुधार देंगे। आइए, हम सब मिल कर इसे साकार करें।

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