शिव का महत्व

सद्गुरु बता रहे हैं कि शिव का क्या महत्व है और मानवता के लिए उनके योगदान को अनूठा क्यों माना जा सकता है?

प्रश्न: सद्गुरु आप शिव को बहुत महत्व देते हैं। आप अन्य गुरुओं के बारे में इतनी चर्चा क्यों नहीं करते जैसे जे़न मास्टर आदि?

सद्गुरु: क्योंकि उनमें से मेरे लिए कोई भी इतना जबरदस्त नहीं है, जितन मैं चाहता हूँ। हम शिव बनाम किसी और की बात नहीं कर रहे। आप जिसे शिव कहते हैं, उसमें बाकी सब शामिल है। ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने मानवता की सेवा के लिए बहुत कुछ किया है। पर अगर बोध या अनुभूति की बात करें तो उनके जैसा कोई नहीं है।

तो आप ज़ेन की बात कर रहे हैं। शिव से बड़े ज़ेन गुरु कौन हो सकते हैं? क्या आपने जे़न मास्टर गुटेई के बारे में सुना है? वे जब भी जे़न की बात करते तो हमेशा अपनी एक अंगुली उठाते ताकि ये दिखा सकें कि ‘सब एक हैं।’। इन ज़ेन मठों में, चार या पाँच बरस के बच्चों को भिक्षु बना दिया जाता था। एक बच्चे ने गुटेई को ऐसा करते देखा, तो जब उससे कोई भी कुछ कहता तो वह भी अपनी तर्जनी अंगुली उठा देता। गुटेई ने भी इसे देखा पर उन्होंने उस लड़के के सोलह बरस होने का इंतजार किया। फिर एक दिन गुटेई ने लड़के को बुलाया और अपनी अंगुली उठाई। लड़के ने भी अपनी सहज प्रवृत्ति के कारण यही किया। गुटेई ने लड़के की अंगुली चाकू से काट दी और कहते हैं कि उसे आत्म ज्ञान प्राप्त हो गया। उसे अचानक समझ आ गया कि यह किसी एक की नहीं, बल्कि कुछ न होने और शून्य की बात है।

शिव तो बहुत समय पहले ही, इससे भी पार चले गए थे। एक दिन, लंबी अनुपस्थिति के बाद वे घर वापिस आए। उन्होंने अपने बेटे को भी नहीं देखा था जो अब दस या ग्यारह बरस का था। जब वे घर आए तो हाथ में छोटा सा त्रिशूल थामे लड़के ने उन्हें रोकना चाहा। शिव ने उसका त्रिशूल तो नहीं लिया परंतु उसका शीश काट दिया। पार्वती यह देख बहुत रुष्ट हुईं। उन्हें मनाने के लिए शिव ने बालक के धड़ पर गण का शीश लगा दिया और वह बहुत ही समझदार हो गया। भारत में आज भी, लोग बच्चों की शिक्षा का आरंभ करने से पूर्व, इसी लड़के का पूजन करते हैं। अब लोगों ने थोड़ा बदलाव कर दिया है और गण का शीश गज के शीश में बदल गया है परंतु उसे विवेक और बुद्धिमता का प्रतीक माना जाता है। कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है, जिसका ज्ञान वह न रखता हो।

वह पहला जे़न कर्म था। इस संसार में ऐसा कुछ नहीं जो शिव के जीवन में न हुआ हो। वे बहुत ही जटिल और संपूर्ण हैं। उन्होंने कोई सीख नहीं दी, उनके पास केवल विधियाँ थीं जो कि सौ प्रतिशत वैज्ञानिक हैं। उन्होंने 112 उपाय प्रस्तुत किए जिनके माध्यम से मनुष्य आत्म ज्ञान पा सकता है क्योंकि मानव के शरीर में 114 चक्र हैं और उनमें से दो भौतिक शरीर से बाहर हैं। उन्होंने कहा, ‘वह तल केवल उनके लिए है जो सबसे परे हैं। मनुष्यों के लिए केवल 112 उपाय या विधियाँ हैं।’ और उन्होंने स्पष्ट विधियाँ दीं जिनके माध्यम से आप जीवन को बनाने वाले 112 आयामों को अपने लिए फायदेमंद बना सकते हैं। उनमें से, हर एक विधि ऐसी है, जिसके माध्यम से आप आत्म ज्ञानी हो सकते हैं।

शिव किसी दर्शन की नहीं, जीवन की यांत्रिकी या प्रक्रिया की बात कर रहे थे। कोई सीख, कोई दर्शन, कोई सामाजिक संदर्भ नहीं – केवल विज्ञान। इसी विज्ञान से गुरुओं ने तकनीकें रचीं। उन्होंने ऐसा करने का विज्ञान दिया। आप वर्तमान में जिन तकनीकों का आनंद उठा रहे हैं, भले ही वे स्मार्टफोन हों या कंप्यूटर या फिर कोई दूसरा उपकरण, सभी के पीछे एक विज्ञान छिपा है। यह विज्ञान आपके काम का नहीं है। आप केवल तकनीक का प्रयोग करते हैं पर अगर किसी ने उस विज्ञान को न सीखा होता तो आज यह तकनीक आपके पास न होती।

तो शिव ने जो भी कहा वह केवल विज्ञान है। उन्होंने यह कार्य सप्तर्षियों पर छोड़ा कि वे तकनीक को इस तरह बनाएँ – कि वह उन लोगों के लिए अनुकूल हो, जो उस दिन उनके सामने बैठे हों। तकनीक को बनाया जा सकता है। अपनी जरूरतों के आधार पर, हम एक खास उपकरण बना सकते हैं परंतु बुनियादी विज्ञान वही रहेगा। जो उपकरण आज प्रासंगिक दिखते हैं, वही कल अप्रासंगिक भी हो सकते हैं। जाने कितने ही ऐसे उपकरण हैं जो हमें कभी उपयोगी लगते थे, वे आज नए उपकरणों के कारण उपयोगी नहीं रहे – परंतु विज्ञान तो एक ही है।

तो आदियोगी के साथ, हम बुनियादी विज्ञान की बात कर रहे हैं। ऐसे समय में, जब विविध कारणों से, मानवता ऐसी अवस्था में है, तब यह बहुत महत्व रखता है कि मूल विज्ञान को बल प्रदान किया जाए।.

शिव के चित्र के लिए आर्ट लैब का आभार.