Brick by Brick

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If there is something that you want to do in your life, invariably that will demand that you do so many things that you don’t want to do. See now, all I want to do is fly, but I have to do a lot of math. So what I avoided all my life, now I have to sit down and do it because I want to do what I want to do. This is so with everything.

People think of freedom, but to bring freedom you will have to build a police force, build prisons, you will have to shore up the walls around you, build fences, fix boundaries to become free. Now, all you want to do is sit and meditate, but then you have to build a meditation hall, then you have to build a place to sleep, then you have to build so many things. This is a process of facilitation. How much you want to facilitate – the more it is, the more you will start doing many, many things you don’t want to do. Unless what you want really matters to you, you will not have the energy or the inclination to do what you don’t want to do.

Nothing worthwhile in your life happens with fancifulness, it needs to be built brick by brick. Only then it works and it stays.

The Federal Aviation Authority test, which one normally takes 4-5 months to prepare, have been trying to complete in the past 5 days and am already hitting 90% in the mock tests. Managing even the math with a little bit of help. Tomorrow is the written part of the test. Considering the weather forecast, looks like I’ll be completing the cross-country part of the test only on my next trip. Traveling to New Jersey on Friday and then Toronto for Shambhavi programs and then onto India.

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जब भी आप अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं तो निर्विवाद रूप से अकसर आपको ऐसी वो तमाम चीजें करनी पड़ती हैं, जिन्हें आप कतई नहीं करना चाहते। अब मुझे ही देख लीजिए, मैं सिर्फ उड़ना चाहता हूं, लेकिन मुझे करना क्या पड़ रहा है, ढेर सारे गणित से माथापच्ची। जिस चीज से मैंने ताउम्र बचने की कोशिश की, अब मुझे बैठकर वही सब करना पड़ रहा है। दरअसल, अपनी मनचाही चीज को करने के लिए मुझे ये सब करना पड़ रहा है। जीवन में यह बात हर चीज पर लागू होती है।

लोग आजादी के बारे में सोचते हैं, उसे पाने की बात करते हैं, लेकिन आजादी पाने के लिए पहले आपको पुलिस दल तैयार करना होगा, जेलें बनानी होंगी, अपने इर्द-गिर्द मजबूत दीवार तैयार करनी होगी, चारदीवारी खींचनी होगी और आजादी के लिए अपनी हदें तय करनी होंगी। आज आप सब चुपचाप बैठकर ध्यान लगाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए ध्यान कक्ष या हॉल बनाना होगा, फिर आपको सोने के लिए एक जगह तैयार करनी होगी और फिर आपको बहुत सारी चीजें बनानी होंगी। दरअसल, यह चीजों को सरल बनाने व सुविधा पैदा करने का एक सिलसिला है। सवाल है कि आप कितने अधिक सुविधाजनक होना चाहते हैं? जितना आप सुविधाजनक होना चाहेंगे, उतनी ही आपको वो तमाम चीजें करनी पडे़ंगी, जो आप नहीं करना चाहते। दरअसल, जो भी काम आप करना चाहते है, उसकी चाहत ही आपसे अनचाहे काम करवाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो आपमें उन अनचाहे कामों को करने की न तो शक्ति होती और न ही रुझान।

आपके जीवन में कोई भी अच्छी चीज सिर्फ सोचनेभर से या जहनी तौर पर नहीं बनती, इसे ईंट दर ईंट या एक-एक पुर्जा जोड़ कर बनाना पड़ता है। तभी यह टिकती है और काम करती है।

मैं फिलहाल पिछले पांच दिनों से अमेरिका में फेडरल एविएशन अथॉरिटी टेस्ट की तैयारी में जुटा हूं। एक सामान्य व्यक्ति को इसकी तैयारी में चार से पांच महीने का समय लगता है, लेकिन मैं पिछले पांच दिनों से इसे पास करने की कोशिश में लगा हूं। इतना ही नहीं, इसके मॉक टेस्ट में लगभग 90 फीसदी तक सफल हुआ हूं। यहां तक कि गणित के मोर्चे पर भी मैं थोड़ी बहुत मदद लेकर किसी तरह काम चला रहां हूं। कल इस टेस्ट की लिखित परीक्षा है। हालांकि मौसम की भविष्यवाणी को देखते हुए लगता है कि इस टेस्ट का क्रॉस कंट्री वाला हिस्सा मैं अपने अगले दौरे में ही पूरा कर पाऊंगा। शुक्रवार को मैं न्यूजर्सी के लिए निकलूंगा, उसके बाद शांभवी कार्यक्रम के सिलिसिले में टोरंटो जाऊंगा, फिर भारत लौटूंगा।

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அன்பும் அருளும்,

Sadhguru
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