पूर्णिमा या अमावस्या – साधना में कौन सा दिन मदद करता है?

सद्‌गुरुअध्यात्मिक साधकों के लिए पूर्णिमा और अमावस्या दोनों एक अलग अहमियत रखते हैं। आख़िर दोनों का क्या प्रभाव पड़ सकता है हमारी साधना पर या हमारे जीवन पर?

प्रश्न: पारंपरिक रूप से भारतीय अध्यात्म में चंद्रमा के चरणों को काफी महत्व दिया जाता है। सद्गुरू, पूर्णिमा और अमावस्या का असल में महत्व क्या है?

सद्‌गुरु: पूर्णिमा की रात और किसी दूसरी रात के बीच बहुत अंतर होता है। जो लोग थोड़े पागल होते हैं, उन्हें यह अंतर अच्छी तरह पता होता है!

देखिए यह एक तरह से माइक्रोफोन की तरह है। माइक्रोफोन क्या करता है – वह वॉल्यूम बढ़ा देता है, बातचीत वही रहती है लेकिन अचानक आवाज तेज और साफ हो जाती है। इसी तरह, अगर पहले थोड़ा सा पागलपन रहा हो, तो जब आप उसमें थोड़ी और ऊर्जा डालते हैं तो सब कुछ बढ़-चढ़ कर दिखता है। पूर्णिमा के दिन ऊर्जा थोड़ी अधिक होती है। सिर्फ पागलपन ही नहीं बढ़ता। अगर आप शांत हैं, तो आप और अधिक शांत हो जाएंगे। अगर आप आनंदित हैं तो आप अधिक आनंदित हो जाएंगे। यानी आपका जो भी गुण है, वह और बढ़ जाएगा। लोगों को सिर्फ पागलपन दिखता है क्योंकि अधिकतर लोग उसी अवस्था में होते हैं। लेकिन अगर आप बहुत प्रेमपूर्ण हैं, तो पूर्णिमा के दिन आपका प्रेम भी अधिक छलकेगा।

ध्यान करने वाले व्यक्ति के लिए पूर्णिमा बेहतर होती है। मगर अमावस्या कुछ खास अनुष्ठान और प्रक्रियाएं करने के लिए अच्छा है। अमावस्या की रात को आपकी ऊर्जा उग्र हो जाती है।

सवाल है कि कौन सी चीज ऊर्जा को बढ़ा देती है? पहली वजह है इसमें एक खास सौंदर्य का होना। अगर आप किसी सुंदर चीज को देखते हैं, तो उस वस्तु के प्रति आपकी ग्रहणशीलता अचानक बढ़ जाती है। अगर आप किसी चीज को बदसूरत मानते हैं तो जैसे ही आप उसकी ओर देखते हैं, आपकी ग्रहणशीलता कम हो जाती है। पूर्णिमा के चांद में एक खास सौंदर्य होता है, जो निश्चित रूप से आपकी ग्रहणशीलता को बढ़ा देता है।

दूसरा पहलू यह है कि पृथ्वी अपने उपग्रह के साथ एक खास अवस्था में चली जाती है, जो वाईब्रेशंस को बहुत सीधा और शक्तिशाली बना देता है। चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण इस दिन लहरें ऊंची उठती हैं। पानी ऊपर तक छलकता है और ऊंचा उछलने की कोशिश करता है। इसी तरह, आपका ख़ून भी उछलने की कोशिश करता है। जब आपके दिमाग़ में ख़ून का संचार बढ़ता है, तो आपका जो भी गुण है, वह बढ़ जाता है।

ध्यान के लिए पूर्णिमा, और अनुष्ठानों के लिए अमावस्या बेहतर है

अब अमावस्या पर आते हैं। पूर्णिमा और अमावस्या को ध्यान की गुणवत्ता में बहुत फर्क होता है। ध्यान करने वाले व्यक्ति के लिए पूर्णिमा बेहतर होती है। मगर अमावस्या कुछ खास अनुष्ठान और प्रक्रियाएं करने के लिए अच्छा है। अमावस्या की रात को आपकी ऊर्जा उग्र हो जाती है। किसी मदमस्त हाथी की तरह आपकी ऊर्जा बेकाबू हो जाती है। इसीलिए तांत्रिक लोग अमावस्या की रातों का इस्तेमाल करते हैं। उस दिन ऊर्जा गतिशील रहती है। पूर्णिमा की रातों में सौम्यता का गुण होता है जो अधिक सूक्ष्म, सुखद और सुंदर होता है – प्रेम की तरह। अमावस्या की ऊर्जा अधिक बुनियादी होती है। अगर आप इन दोनों की तुलना करना चाहते हैं, तो आप कह सकते हैं कि अमावस्या अधिक सेक्स-केंद्रित और पूर्णिमा अधिक प्रेम-केंद्रित है। अमावस्या की प्रकृति अधिक स्थूल और अधिक शक्तिशाली होती है। पूर्णिमा की प्रकृति सूक्ष्म होती है। वह शक्ति इतनी सूक्ष्म होती है कि आप उसे महसूस नहीं कर सकते। कुंडलिनी भी इसी तरह बर्ताव करती है: पूर्णिमा को वह बहुत सौम्यता से बढ़ती है और अमावस्या को वह शोरशराबे और धमाके के साथ बढ़ती है। अमावस्या को कुण्डलिनी अधिक हिंसा से भरी होती है।

जब आप उपस्थित होने की कोशिश करते हैं, तो आपकी कोई उपस्थिति नहीं होती। अहं की कोई मौजूदगी नहीं होती। लेकिन जब आप अनुपस्थित हो जाते हैं, तो आपकी उपस्थिति जबर्दस्त होती है। 

पूर्णिमा एक शानदार मौजूदगी है। चंद्रमा की मौजूदगी इतनी साफ होती है कि आप जिधर भी देखें, सब कुछ चमकीला दिखता है। उसके वाईब्रेशंस और प्रकाश में ऐसा गुण होता है, जहां हर चीज में एक नया आभामंडल पैदा हो जाता है। पूर्णिमा का वाईब्रेशंस और एहसास चंद्रमा की दूसरी अवस्थाओं से बहुत अलग होता है। आपके अंदर इड़ा और पिंगला भी अलग तरह से काम करती हैं। प्राण या जीवन ऊर्जा एक अलग तरह से प्रवाहित होती है। वाईब्रेशंस के बदल जाने से आपकी समस्त ऊर्जा एक अलग तरह से प्रवाहित होती है।

ऐसा नहीं है कि आप हर दिन पूर्णिमा में नहीं रह सकते। आप रह सकते हैं। अगर आपका अपने सूर्य और चंद्रमा – पिंगला और इड़ा – पर थोड़ी महारत है तो तीखी धूप में भी आपके अंदर पूर्णिमा की सुंदरता रहती है। या आप हर दिन अमावस्या को चुन सकते हैं। या आप कुछ नहीं चुनते: प्रकृति में जो कुछ भी घटित हो रहा है, आप जीवन की सभी अवस्थाओं का उनके वास्तविक रूप में आनंद लेते हैं।

उपस्थिति और अनुपस्थिति का फर्क

जबकि पूर्णिमा एक शानदार उपस्थिति(मौजूदगी) है, अमावस्या अनुपस्थिति(गैरमौजूदगी) है। तार्किक दिमाग को हमेशा लगता है कि उपस्थिति शक्तिशाली है और अनुपस्थिति का मतलब कुछ नहीं है। मगर ऐसा नहीं है। जिस तरह प्रकाश की शक्ति होती है, प्रकाश की अनुपस्थिति यानी अंधकार की अपनी ताकत होती है। वास्तव में वह प्रकाश से अधिक जोरदार होती है। दिन के मुकाबले रात अधिक तीव्रतापूर्ण होती है क्योंकि अंधकार सिर्फ एक अनुपस्थिति है। यह कहना गलत है कि अंधकार का अस्तित्व होता है। उसमें प्रकाश अनुपस्थित होता है और उस अनुपस्थिति की एक तीव्र उपस्थिति होती है। वही चीज यहां हो सकती है।

जब आप अपनी चेतनता में भी ध्यानमग्न होते हैं, तो इसका मतलब है कि आप अनुपस्थित हो गए हैं। जब आप अनुपस्थित हो जाते हैं, तो आपकी उपस्थिति जबर्दस्त होती है। जब आप उपस्थित होने की कोशिश करते हैं, तो आपकी कोई उपस्थिति नहीं होती। अहं की कोई मौजूदगी नहीं होती। लेकिन जब आप अनुपस्थित हो जाते हैं, तो आपकी उपस्थिति जबर्दस्त होती है। यही चीज अमावस्या पर लागू होती है। धीरे-धीरे चंद्रमा गायब हो गया है और उस अनुपस्थिति ने एक खास शक्ति पैदा की है। इसीलिए अमावस्या को महत्वपूर्ण माना जाता है।

एक मेहनती, मजबूत, आक्रामक व्यक्ति के लिए अमावस्या निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पहलू है। बहुत संवेदनशील और सौम्य व्यक्ति के लिए पूर्णिमा एक अहम पहलू है। दोनों की अपनी शक्ति है। गुणों के संदर्भ में पूर्णिमा प्रेम है और अमावस्या आक्रामकता(जोश) है। मगर हम दोनों का लाभ उठा सकते हैं। दोनों ऊर्जा हैं।


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