समय : सच है या फिर माया?

समय किसी भी हाल में नहीं थमता।  ये बस बढ़ता ही चला जाता है।  क्या समय कहीं शुरू था?  और क्या यह कहीं पर जा कर ख़त्म हो जाएगा ? यह एक ऐसा विषय है जिस पर सदियों की मेहनत के बाद भी वैज्ञानिक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकें हैं। तो फिर क्या है सच्चाई ? 

सद्‌गुरुसमय बस माया है। आप जानते हैं, माया क्या है? समय एक आभासी प्रक्रिया है। चाहे मैं 3 बजे आऊं या 4 बजे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये असल में एक भ्रम है लेकिन, पर जिस तरह से ये हमारे जीवन में घटित होता है, उस तरह से भ्रम नहीं है। आप जिस पल अपने तार्किक दिमाग की सीमाओं से परे जाते हैं, समय और स्थान जैसी कोई चीज नहीं रह जाती। जो यहां है, वह वहाँ है, जो वहां है, वह यहां है। एक बार जब आप अपनी तार्किक प्रक्रिया की सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं, तो जो अब है, वो तब था, जो तब था, वो अब है। इस ब्रह्मांड को रिक्त स्थान के विशाल फैलाव के रूप में देखा जा सकता है या उसे सरसों के एक दाने की तरह भी देखा जा सकता है, दोनों संभव हैं। फिलहाल आप आकाश की विशालता को अपनी पुतलियों में समा सकते हैं। अगर आप आकाश में उड़ रहे हों और नीचे देखें, तो आप पूरी धरती को अपनी आंखों के अंदर समा सकते हैं। ऊपर क्यों जाना? यहीं से अगर आप तारामंडलों का विशाल फैलाव देखें, तो आप उसे इतनी छोटी सी पुतली से देख सकते हैं।

तो समय और स्थान एक खास प्रवाह है जिसे आप अंतहीन आकाश में फैला सकते हैं, या आप (छोटे आकार का इशारा करते हैं) उसे इस तरह बना सकते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक सिद्धांत गोल-गोल घूमते रहते हैं और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाते। विज्ञान भी इसके बहुत करीब आ रहा है, वे कई रूपों में यह बात कह रहे हैं लेकिन बस वे उसे एक साथ नहीं जोड़ पा रहे हैं।

कहा अटका हुआ है विज्ञान?

अगर आप क्वांटम सिद्धांत और सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत को अलग-अलग देखें, तो वे भी यही कह रहे हैं। जब आइंस्टीन कहते हैं कि सब कुछ संबंधित या सापेक्ष है, तो उसका अर्थ वही है, क्वांटम सिद्धांत में जो कहा गया है, वह भी सच है लेकिन ये दो अलग-अलग चीजें हैं – वैज्ञानिक दोनों को साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, मगर वे जोड़ नहीं पा रहे क्योंकि दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। मुख्य रूप से इसका मतलब यह है कि आणविक और ब्रह्मांडीय एक-दूसरे के विपरीत हैं, जो हास्यास्पद है। फिलहाल आधुनिक विज्ञान वहीं है। वे जानते हैं कि इसके बारे में यह सच है, उसके बारे में वह सच है लेकिन उन्हें एक साथ लाना संभव नहीं हो पा रहा है। तार्किक रूप से यह नहीं हो सकता इसलिए वे धीरे-धीरे पहेलीनुमा तर्क की ओर जा रहे हैं। वह अतार्किक है, बस उसे एक नया नाम दे दिया गया है। 1960 के दशक में एक बार ऐसा हुआ। नीलगाय अब भी पाए जाते हैं, हाल में मैंने उन्हें देखा। उनकी चमड़ी का रंग हल्का नीला होता है। उनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि उन्होंने उत्तरी मैदानों में फसलों को नष्ट करना शुरू कर दिया। खाने के मामले में वे काफी विनाशकारी जानवर हैं। वे विशाल झुंडों में आते हैं और सब कुछ, खासकर फसलें नष्ट कर डालते हैं।

हाल में मैंने उन्हें देखा। मैं जिस गोल्फ-कोर्स में था, उसका मालिक रो रहा था क्योंकि केवल चार नीलगायों ने रात में आकर सारी घास खा डाली। मैं जिस समय की बात कर रहा हूं, उनकी संख्या काफी बढ़ गई थी। फैसला किया गया कि उनकी संख्या कम की जाए। एक खास संख्या में उन्हें गोली मारा जाना था, इसलिए सेना के निशानेबाजों को उन्हें गोली मारने को कहा गया। फौरन इस बात को लेकर शोर मच गया क्योंकि भारत में किसी गाय को मारना बहुत बड़ा पाप है। इसलिए इसके विरोध में खूब हंगामा होने लगा। ये जानवर असल में गायें नहीं होते, उन्हें नीलगाय के नाम से जाना जाता है। इसलिए प्रधानमंत्री ने फौरन चतुराई दिखाते हुए कहा, ‘सभी नीले घोड़ों को गोली मार दो।’ हजारों की संख्या में उन्हें गोली मार दी गई। लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि नीले घोड़ों को गोली मारी जा रही थी। तो यह ऐसा ही है… हम बहुत से रूपों में अपने दिमाग से खेल रहे हैं। समय जैसी कोई चीज नहीं है। हमने खुद समझने में सुविधा के लिए समय को खंडों में बांट दिया है, वरना कल और आज में कुछ भी अलग नहीं है। कोई बीता कल और आज नहीं है। अपने समझने के लिए हम बीता कल, आज, आने वाला कल, 2 बजे, 3 बजे, 4 बजे कहते हैं – यह सब हमने ही बनाया है, वरना हम समय से परे नहीं, बस थोड़े से खोए होते।

क्या है समय से परे जाने का मतलब?

समयातीत होने का ये मतलब नहीं कि आप समय की पाबन्दी का ध्यान रखना छोड़ दें। आप समयातीत या समय से परे तभी होंगे, जब आप अपनी तार्किक प्रक्रिया की सीमाओं से परे जाएंगे। अगर आप यहां बैठे हैं और आपके दिमाग में कोई विचार नहीं चल रहा है तो आप देखेंगे कि एक दिन बीत जाएगा मगर अपने अनुभव में आप एक मिनट जैसा महसूस करेंगे। वह दिन यूं ही निकल जाएगा। मुझे लगता है.. नहीं, मैं अपना ही मजाक क्यों बना रहा हूं? मुझे अब भी लगता है कि मैं बस 18-20 साल का हूं.. मुझे अब भी ऐसा ही लगता है, मगर लोग मुझे देखकर सोचते हैं ‘उनको क्या हो रहा है? वह इस तरह क्यों उछल रहे हैं? वह इस तरह क्यों खेल रहे हैं?’ इसके बहुत से तरीके हैं – आपने अपने तरीकों से इसका अनुभव किया होगा – किसी खास दिन अगर आप बहुत खुश होते हैं, तो एक दिन एक पल की तरह गुजर जाता है, है न? अगर आप निराश हैं, तो एक घंटा एक साल की तरह बीतता है। समय बहुत सापेक्ष अनुभव है। पूरा अनंत काल इस पल में कैद है। यह पल पूरे अनंत में फैला हुआ है – इसको कृपया ध्यान से देखें। हमेशा यही एक पल होता है, मगर बहुत कुछ घट रहा है। सृजन होता है और नष्ट हो जाता है, फिर भी यही एक पल होता है। इसलिए यह एक पल अनंत काल में फैला हुआ है या पूरा अनंत काल इस पल में कैद है, दोनों तरह से यह सच है मगर आपके अनुभव में वह आपको चारो ओर घुमा देता है। लोग पैदा होते हैं, मरते हैं और आप पैदा होते हैं, मरते हैं, फिर कोई और पैदा होता है और मरता है, खुद ग्रह भी उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं – यह सब घट रहा है। क्या यह सब मायावी है? नहीं।

सिर्फ अनुभव मायावी है

जब हमने माया कहा, तो हमारा कहने का मतलब यह नहीं था कि यह अस्तित्व मायावी या भ्रामक है, हमने सिर्फ यह कहा कि आप जिस रूप से उसे अनुभव कर रहे हैं, वह मायावी है। अस्तित्व मायावी नहीं है, आप जिस रूप में उसे जानते हैं, वह मायावी है। आप फिलहाल उसे जिस रूप में देख रहे हैं, वह मायावी है। अगर आप इस भ्रम से, इस मायाजाल से निकलने का रास्ता ढूंढ लेते हैं, तो हम कहते हैं कि वह धर्म है। अगर आप उसमें फंस जाते हैं, तो हम उसे कर्म कहते हैं। अगर आप बाहर निकलने का तरीका तलाश लेते हैं तो हम उसे धर्म कहते हैं। धर्म का मतलब सिर्फ अपना पैसा देना नहीं है, वह अलग तरह का धर्म है। दान को भी धर्म कहा जाता है, उसके लिए भी यही शब्द इस्तेमाल किया जाता है। हम उसके बारे में बात नहीं कर रहे हैं। जब आप धर्म का नाम लेते हैं, तो वह बाहर निकलने का रास्ता होता है। कर्म उस प्रक्रिया में फंसने का नाम है। आपका अनुभव मायावी है, अस्तित्व मायावी नहीं है।


संबन्धित पोस्ट


Type in below box in English and press Convert