शिव के अलग-अलग रूप – सदाशिव और रूद्र

शिव के अलग-अलग रूप – सदाशिव और रूद्र

सद्‌गुरुसद्‌गुरु हमें शिव के अलग-अलग रूपों रूद्र और सदाशिव के बारे में बता रहे हैं। वे ये भी बता रहे हैं कि चाहे हम कोई भी काम करें, कुछ समय बाद गतिशीलता बोरिंग हो जाती है। ध्यान का मतलब है ऐसी गतिशीलता जिसमें स्थिरता का एहसास हो।

हर वो चीज जो भौतिक है, वह सब स्वभाव से गतिशील है। यहां तक कि परमाणु के भीतर भी गतिविधि हो रही है। यह पूरा ब्रह्मांड गतिविधि ही है। दरअसल, भौतिकता का स्वभाव ही यही है। यह अपने आप को लगातार गतिशील रखता है। अगर यह स्थिर हो गया तो इसका अस्तित्व ही रुक जाएगा। दरअसल, सभी भौतिक संरचनाएं बुनियादी रूप से खास तरह का स्पंदन हैं। आधुनिक विज्ञान इसी नतीजे पर पहुंच रहा है। बहुत पुराने समय से ही लोग कहते आ रहे हैं कि सबसे पहले शब्द ही था। शब्द क्या है – महज एक ध्वनि।

शिव गरजने पर रूद्र कहलाते हैं

अगर मैं किसी ऐसी भाषा का एक शब्द बोलूं, जिसे आप जानते नहीं हैं, तो आपके लिए उसका क्या मतलब होगा? वह आपके लिए सिर्फ एक ध्वनि होगी।

जब वह गरजते हैं तो हम उन्हें रुद्र कहते हैं। आधुनिक विज्ञान इसे बिग बैंग कहता है। लेकिन आधुनिक विज्ञान जानता है कि यह सिर्फ एक विस्फोट नहीं था, बल्कि यह विस्फोटों की एक श्रृंखला थी।
ध्वनि किसी स्पंदन का ही नतीजा होती है। तो जो भी भौतिक रचना है, उसके भीतर एक खास तरह का स्पंदन व खास तरह की गति होगी। जो भौतिक नहीं है, वह निश्चल है। यहां निश्चलता व स्थिरता, गतिशीलता की विरोधी नहीं है। वह निश्चल है, क्योंकि वह है ही नहीं। आपको इस आयाम को समझाने के लिए इस संस्कृति में हमने तरह-तरह के चरित्रों का निर्माण किया है। इसमें से एक शिव हैं। शिव का मतलब है, जो है ही नहीं। वह स्थिर हैं। लेकिन कभी-कभार उनमें कुछ चीजें होती हैं। कभी-कभी वह गरजते हैं। जब वह गरजते हैं तो हम उन्हें रुद्र कहते हैं। आधुनिक विज्ञान इसे बिग बैंग कहता है। लेकिन आधुनिक विज्ञान जानता है कि यह सिर्फ एक विस्फोट नहीं था, बल्कि यह विस्फोटों की एक श्रृंखला थी।

सदाशिव – शिव का शाश्वत स्थिर रूप

कई विस्फोट अगर एक साथ हों तो ज्यादातर यह एक गर्जन का रूप ले लेते हैं। तो हमने कहा कि वह गरजेंगे।

जो भी चीज भौतिक आकार लेती है, वह तत्व के स्तर पर गतिशील होती है, इसके बिना भौतिक रूप लेना संभव ही नहीं है। अगर उसमें गति नहीं होगी, तो वह खत्म हो जाएगी।
वह स्थिर हैं, लेकिन वह गरजेंगे। लेकिन अगर आप उनमें गहराई में उतर जाएं, तो वह सदाशिव हो जाते हैं यानी शाश्वत स्थिर। एक शाश्वत स्थिरता होती है। एक स्थिरता होती है, जिसमें से गतिशीलता या गर्जन के फूटने की क्षमता होती है, जो चीजों का निर्माण करती है। और सृष्टि के रूप में विशाल गतिविधि भी होती है। जो भी चीज भौतिक आकार लेती है, वह तत्व के स्तर पर गतिशील होती है, इसके बिना भौतिक रूप लेना संभव ही नहीं है। अगर उसमें गति नहीं होगी, तो वह खत्म हो जाएगी। फिलहाल अगर आप जिंदा है तो इसकी वजह यह है कि आपके भीतर बहुत सारी चीजें काम कर रही हैं – जैसे आपका ह्रदय काम कर रहा है।

कहीं न कहीं आप स्थिरता चाहते हैं

भौतिकता की मूल प्रकृति ही गतिशीलता है। इसलिए जब हम ध्यानावस्था की बात करते हैं तो हमारा मतलब स्थिरता से नहीं होता, बल्कि हम बात करते हैं कि अपने भीतर चलने वाली गतिविधियों की लय ऐसी कर दी जाए कि महसूस हो, मानो कुछ भी न हो रहा हो।

मान लीजिए हम मरने वाले नहीं हैं, तब यह जीवन एक भयानक श्राप बनकर रह जाएगा। इसलिए गतिशीलता अच्छी बात है, लेकिन एक सीमा तक ही। कहीं न कहीं हर व्यक्ति स्थिरता चाहेगा।
एक समय ऐसा था – 1940 के दशकों में – जब आप कार स्टार्ट करते थे तो उसमें से तेज आवाज आती थी। आज तो आपको पता भी नहीं चलता कि आपकी कार स्टार्ट है या बंद है। इसका यह मतलब नहीं है कि यह अब कम स्पीड में है। बात सिर्फ इतनी है कि यह पहले से ज्यादा लयबद्ध हो गई है। ध्यान में हम इस तरह की स्थिरता की ही बात कर रहे हैं। हम शरीर से जुड़ी तकनीक को इस तरह से अपग्रेड करने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर के भीतर सारी गतिविधियां पूरी तीव्रता में हों, लेकिन शांत होकर बैठने पर ऐसा लगे मानो कुछ हो ही नहीं रहा। हमारी सारी मशीनें समय के साथ-साथ कम शोर करने वाली होती जा रही हैं। आप इस गतिशीलता से परे के आयाम को छूना चाहते हैं, क्योंकि गतिशीलता का आयाम शानदार होते हुए भी, ज्यादा देर के बाद बोरिंग हो जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह गतिविधि किस तरह की है, कुछ समय बाद वह आपके लिए ऊबाऊ होने लगती है। यह गतिशीलता कहीं न कहीं खत्म होगी – इसी उम्मीद के साथ हम सब जिंदा हैं, काम कर रहे हैं और ढेर सारी चीजें करने के लिए तैयार हैं। दरअसल, हम सबको पता है कि एक न एक दिन हम सभी को मरना है। मान लीजिए हम मरने वाले नहीं हैं, तब यह जीवन एक भयानक श्राप बनकर रह जाएगा। इसलिए गतिशीलता अच्छी बात है, लेकिन एक सीमा तक ही। कहीं न कहीं हर व्यक्ति स्थिरता चाहेगा।

ध्यानमय होने पर सब कुछ आसान हो जाएगा

लेकिन हर रोज अगर आप एक खास समय तक स्थिर हैं तो एक गरिमापूर्ण व लयबद्ध तरीके से अपनी गतिविधियां करने की आपकी क्षमता काफी बढ़ जाएगी।

अगर आप रोज स्थिर व शांत बैठने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में आप एक पल के लिए भी स्थिर हो पाते हैं, तो आप देखेंगे कि सहज होकर आनंदपूर्वक कार्य करना, आपके लिए एक जीवंत अनुभव बन सकता है।
आपका जीवन सुचारु ढंग से चलने लगेगा। तब काम को लेकर और आपके अस्तित्व को लेकर कोई तनाव नहीं होगा। उस स्थिति में मान लीजिए कि आपको सौ साल तक भी काम करना पड़े तो कोई दिक्कत नहीं होगी। तब सब चीजें बेहद शांत तरीके से होंगी, आप इन गतिविधियों की तीव्रता का आनंद ले पाएंगे, आप इसकी तीव्रता से पीड़ित नहीं होंगे। शुरू में आप बीस मील भी यात्रा कर लेते थे तो आपके लिए काफी हो जाता था। लेकिन आज आप दो हजार मील भी यात्रा कर सकते हैं। उसकी वजह है कि अब यात्रा करना आसान हो गया है। यही बात इस शरीर व जीवन पर लागू होती है। अगर आप रोज स्थिर व शांत बैठने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में आप एक पल के लिए भी स्थिर हो पाते हैं, तो आप देखेंगे कि सहज होकर आनंदपूर्वक कार्य करना, आपके लिए एक जीवंत अनुभव बन सकता है।


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