संथारा : जैन धर्म में मृत्यु की धार्मिक प्रक्रिया

संथारा : जैन धर्म में मृत्यु की धार्मिक प्रक्रिया

सद्‌गुरुजैन धर्म की साधना संथारा कुछ समय पहले चर्चा का विषय बनी। क्या है ये साधना? क्या सभी कर सकते हैं इसे? जानते हैं इस साधना के बारे में और इसके अनेक पहलूओं के बारे में

क्या है संथारा?

जैन धर्म में एक साधना है, जिसे संथारा करते हैं। इसमें जब इंसान बूढ़ा हो जाता है तब वह कुछ बुद्धिमान लोगों से सलाह करके तय करता है कि अब उसके दुनिया से जाने का समय आ गया है। फि र धीरे-धीरे वह अपनी खुराक घटानी शुरू कर देता है।

अब मरना कानूनन सही है। यह हमेशा से सही रहा है, लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि ऐसे मरना गैरकानूनी है।
वह पहले से कम खाने लगता है, फिर वह खुराक और कम करता है। इस तरह वह अपनी खुराक लगातार कम करता जाता है, फिर एक स्थिति ऐसी आती है कि वह कुछ भी खाना या पीना बंद कर देता है। इस स्थिति में वह लगभग छह से आठ दिन रहता है और फि र वह दुनिया से चला जाता है। इसके लिए जबरदस्त अनुशासन और एकाग्रता के साथ-साथ एक खास तरह के विवेक की जरूरत होती है, ताकि आप यह कर सकें। जैनियों में यह चलन है, लेकिन योगियों के बीच यह एक नियम है।

यह भूख मरने वाली बात नहीं है

जो लोग बिना उपवास के शरीर को छोडऩे की विधि नहीं जानते, वे सब अपने देह त्याग के लिए इसी तरीके को अपनाते हैं। वे बस अपने शरीर को कमजोर करते व सिकोड़ते जाते हैं। यह भूखे मरने वाली बात नहीं है। जब आप अपने और अपने शरीर के बीच का संबंध समझना चाहते हैं तो फिर आप एक आसान सी चीज कीजिए कि भोजन को बाहर रख दीजिए, जिससे आप इन दोनों के बीच के संबंध पर गौर कर सकें और समझ सकें कि आप क्या हैं और आपका शरीर क्या है।

 अपने यहां पूरी परंपरा है, जिसमें लोग बाकायदा काशी जाते हैं, क्योंकि वे वहां मरना चाहते हैं। काशी को अपने यहां ज्ञान के स्तंभ के रूप में तैयार किया गया। यह खुद में एक विशाल यंत्र है, जिसका दायरा 54 किलोमीटर में फैला है।
इस परंपरा को इस संदर्भ में देखें तो व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम दिनों में यह समझना चाहता है कि ‘कैसे इस शरीर ने मुझे थाम रखा है’ या फि र ‘कैसे मैंने इस शरीर को थाम रखा है’। इंसान इस तथ्य को समझना चाहता है। यह बेहद महत्वपूर्ण है कि इंसान इसे समझे। इस बारे में एक महत्वपूर्ण बात बताना चाहूंगा। बात तब की है, जब हम कैलाश यात्रा पर गए थे। हमें पता चला कि राजस्थान हाइकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि संथारा एक तरह से आत्महत्या है। जो भी इसे अपनाने की कोशिश करेगा, उसे गिरफ्तार कर कैद में डाल देना चाहिए, इतना ही नहीं, जो लोग इस प्रक्रिया का समर्थन करते हैं उन्हें भी आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में जेल में डाल देना चाहिए। राजस्थान में जैन धर्म को मानने वालों की की खासी आबादी है। जिस परंपरा का पालन जैन समाज हजारों सालों से करता आ रहा था, उसके बारे में ऐसा सुनकर वो दंग रह गए।

अंग्रेजों वाले क़ानून अब भी चल रहे हैं

अपने यहां के ज्यादातर कानून, लगभग पूरी आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता, 1860 में अंग्रेजों द्वारा लिखी गई है। आईपीसी का श्रेय जाता है कि एक धूर्त अंग्रेज अधिकारी मैकाले को।

अफसोस की बात है कि हमें आजादी मिले सत्तर साल हो गए, लेकिन हमारे नीति निर्माताओं ने इन कानूनों को फि र से लिखने की जरूरत नहीं समझी।
मैकाले ने भारत की कुछ खूबियों को पहचान कर ब्रिटिश संसद को लिखा था- ‘इस देश की ताकत तीन चीजों में है। पहली है इनकी शिक्षण पद्धति – यहां बिना स्कूलों के ही लोग पढ़ते-लिखते और शिक्षित होते हैं।’ तब हर घर में शिक्षा दी जाती थी। तब न तो कोई स्कूल थे, न ही कोई कक्षाएं, न कोई स्कूल जाता था, फि र भी हर कोई पढ़ा लिखा था, सौ फीसदी साक्षरता थी। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तब सत्तर प्रतिशत लोग निरक्षर थे, जबकि पहले बिना स्कूल गए सौ प्रतिशत साक्षरता थी।

अंग्रेजों की भारत के बारे में सोच

मैकाले ने लिखा था – ‘घर से ही चलने वाली उनकी इस शिक्षा पद्धति को निश्चित रूप से नष्ट किया जाना चाहिए। हमें अंग्रेजी शिक्षा को लाना ही होगा, केवल तभी हम उन पर नियंत्रण कर सकेंगे।’ उसके बाद उसने यहां के आध्यात्मिक पद्धति के बारे में लिखा, ‘यहां कोई धर्मादेश नहीं चलता, कहीं कोई संगठन नहीं है, हर घर की अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है।’

इसके लिए जबरदस्त अनुशासन और एकाग्रता के साथ-साथ एक खास तरह के विवेक की जरूरत होती है, ताकि आप यह कर सकें। जैनियों में यह चलन है, लेकिन योगियों के बीच यह एक नियम है।
मैकाले ने लिखा – ‘यहां की शिक्षा व्यवस्था, आध्यात्मिक प्रकिया और पूरे समाज में एकता का भाव – ये तीन खूबियां हैं। हालांकि राजनैतिक तौर पर यहां के लोग आपस में बंटे हुए हैं। राजनैतिक तौर पर यहां लगभग दो सौ राज्य हैं, लेकिन फि र भी इनमें एक राष्ट्र का भाव है। अगर हम इस भाव को नहीं तोड़ते तो हम कभी इन पर राज नहीं कर पाएंगे।’ अफसोस की बात है कि हमें आजादी मिले सत्तर साल हो गए, लेकिन हमारे नीति निर्माताओं ने इन कानूनों को फि र से लिखने की जरूरत नहीं समझी। वे उन्हीं कानूनों का पालन करते रहे। तो राजस्थान के जज उसी कानून की व्याख्या कर रहे थे, जो लिखा हुआ है। इसलिए उन्होंने अपने फैसले में कहा, ‘संथारा, जो एक युगों पुरानी परंपरा है, यह अपने आप में एक तरह से आत्महत्या है। यह एक दंडनीय अपराध है।’

जैन धर्म के संथारा से जुड़े कानून

इस फैसले के बाद पूरे देश में जबरदस्त विवाद छिड़ गया। हम लोग कैलाश के रास्ते में थे। तब मैंने देश की एक बड़ी पत्रिका में इस बारे में एक आलेख लिखा था। जो उस समय दुनियाभर में काफी चर्चित हुआ। इस घटना के लगभग बीस दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए मरने को कानूनी जामा पहना दिया। अब मरना कानूनन सही है। यह हमेशा से सही रहा है, लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि ऐसे मरना गैरकानूनी है। अपने यहां पूरी परंपरा है, जिसमें लोग बाकायदा काशी जाते हैं, क्योंकि वे वहां मरना चाहते हैं। काशी को अपने यहां ज्ञान के स्तंभ के रूप में तैयार किया गया। यह खुद में एक विशाल यंत्र है, जिसका दायरा 54 किलोमीटर में फैला है। हमारे पूर्वजों ने एक विशालकाय यंत्र बनाया, जो शानदार तरीके से काम करता है। इसने हजारों ज्ञानी लोगों को पैदा किया है और यहां हर तरह का ज्ञान पैदा हुआ है।


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