क्या है शरीर के 112 चक्रों का महत्व?

क्या है शरीर के 112 चक्रों का महत्व?

सद्‌गुरुहमारी ऊर्जा प्रणाली में 112 चक्र हैं। इनमें से कुछ चक्र शरीर में एक ही जगह होते हैं, जबकि कुछ अन्य चक्र गतिशील होते हैं। कैसे प्रभावित करते हैं हमें ये चक्र ? जानते हैं कि इनका हमारे विचारों, भावनाओं पर क्या असर पड़ता है

भौतिक अस्तित्व और ऊर्जाअस्तित्व की एक खास ज्यामिति है। परमाणु से लेकर ब्रह्मांड तक, दुनिया की हर चीज जिस तरह काम करती है, उसके पीछे ज्यामिति की सटीकता है। ज्यामिति के सबसे मूलभूत और सबसे स्थायी आकारों में से एक है – त्रिकोण। मानव की ऊर्जा-प्रणाली में, दो समबाहु त्रिकोण होते हैं – एक नीचे है जिसका मुख ऊपर की तरफ है और ऊपर है जिसका मुख नीचे की ओर है। आम तौर पर ये दोनों त्रिकोण अनाहत से ठीक ऊपर मिलते हैं। अपने मन और कल्पना के साथ काम करने के लिए जरूरी है कि इन दोनों त्रिकोणों का तालमेल ठीक रहे – कम से कम कुछ सीमा तक तो ठीक रहना जरूरी है। आदर्श तालमेल यह होगा कि दोनों त्रिकोण एक-दूसरे को इस तरह काटें कि छह बिंदुओं वाला एक तारा बने जिसके बाहरी हिस्से में छह समबाहु त्रिकोण हों।

विशुद्धि चक्र कल्पना का आधार है

जरूरी तालमेल होने पर आप अपनी कल्पना को साकार करने में सक्षम होंगे। अपनी कल्पना की शक्ति को बढ़ाने के लिए आपको ऊपर की ओर मुख वाले त्रिकोण को, जो शरीर की ज्यामिति के अर्थों में बुनियाद है, को ऊपर की तरफ इस तरह उठाना होगा कि इसमें विशुद्धि भी शामिल हो जाए।

अगर आपके पास ऐसी कोई साधना नहीं है, तो आप एक आसान तरीका आजमा सकते हैं – एक खास समय तक भूखे रहने से भी यह लाभ मिलता है।
विशुद्धि चक्र आपकी कल्पना का आधार है। इस त्रिकोण को ऊपर उठाने और उसे वहां थामे रखने के लिए खास तरह की साधना होती है। अगर आपके पास ऐसी कोई साधना नहीं है, तो आप एक आसान तरीका आजमा सकते हैं – एक खास समय तक भूखे रहने से भी यह लाभ मिलता है। आम तौर पर जब पेट खाली होता है, तो नीचे वाला त्रिकोण अपने आप ऊपर उठ जाता है। भोजन कर लेने के बाद, वह फिर से नीचे चला जाता है।

चक्रों को सक्रिय रखने का महत्व

शरीर में एक सौ चौदह चक्र होते हैं। ऊर्जा शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियां होती हैं जिनसे ऊर्जा प्रवाहित होती है, और एक सौ चौदह महत्वपूर्ण मिलन बिंदु होते हैं, जहां काफी संख्या में नाड़ियां मिलती हैं और फिर बंट जाती हैं।

इन बिंदुओं को आम तौर पर चक्र कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है पहिया या वृत्त। हालांकि वास्तव में वे त्रिकोण होते हैं।
इन बिंदुओं को आम तौर पर चक्र कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है पहिया या वृत्त। हालांकि वास्तव में वे त्रिकोण होते हैं। हम उन्हें ‘चक्र’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह गति – आगे बढ़ने की ओर संकेत करता है। इन एक सौ चौदह चक्रों में से दो भौतिक क्षेत्र के बाहर हैं। ज्यादातर इंसानों के लिए ये दोनों बहुत अस्पष्ट होते हैं, जब तक कि वे इसके लिए जरूरी साधना न करें। बाकी एक सौ बारह चक्रों में से कुछ दैहिक स्तर पर शरीर के कुछ खास हिस्सों में स्थित हैं। बाकी चक्र कुछ हद तक गतिशील हो सकते हैं।

सभी कार्यों में प्रभावशाली होने के लिए चक्र लचीले होने चाहिए

आपके शरीर में चक्र किस तरह गतिशील हैं कि यह इस पर निर्भर करता है कि आप खुद के साथ क्या करते हैं। अगर आप अलग-अलग तरह की गतिविधियों और विभिन्न स्थितियों में सामंजस्य बिठाने में खुद को समर्थ बनाना चाहते हैं, तो शरीर की प्राण संबंधी प्रक्रिया या चक्र प्रणाली को उसी के अनुसार व्यवस्थित करने की जरूरत है।

आपके शरीर में चक्र किस तरह गतिशील हैं कि यह इस पर निर्भर करता है कि आप खुद के साथ क्या करते हैं।
चक्रों को गतिशील रखने के लिए कुछ करना जरूरी है क्योंकि चक्रों की गतिशीलता यह तय करती है कि अलग-अलग तरह की जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न परिस्थितियों में आप कितने लचीले और प्रभावी हैं। ज्यादातर इंसानों के साथ समस्या यह होती है कि एक स्थिति में वे अच्छी तरह काम कर पाते हैं मगर दूसरी स्थिति में वे पूरी तरह असफल हो जाते हैं। इसकी वजह यह है कि वे सिर्फ एक खास तरीके से सोच सकते हैं, महसूस कर सकते हैं और काम कर सकते हैं।

आपको हर काम अच्छी तरह करने में सक्षम होना चाहिए। लेकिन अगर आपकी ऊर्जा प्रणाली अकड़ी हुई है और उसमें लचीलापन नहीं है, तो यह नहीं होगा। इसलिए अपने सिस्टम को गतिशील रखना महत्वपूर्ण है। सिर्फ इसलिए नहीं क्योंकि हम दुनिया में अलग-अलग तरह के क्रियाकलाप करना चाहते हैं। यह आपके अनुभव को भी एक खास लचीलापन देता है जिससे आप किसी भी तरह की परिस्थिति में सहज होते हैं। सहज होने के लिए, आपकी ऊर्जा को लचीला होना चाहिए। इन एक सौ बारह चक्रों का इस्तेमाल आपकी परम प्रकृति तक पहुंचने के एक सौ बारह मार्गों के रूप में किया जा सकता है। इसी वजह से आदियोगी ने परम तत्व की प्राप्ति के एक सौ बारह तरीके बताए।

ऊर्जा के दो त्रिकोण परस्पर मिलने चाहिएं

आपके शरीर विज्ञान के इस जटिल त्रिकोणीय ढांचे को अपने मन मुताबिक चलाने में सक्षम होने के लिए एक अलग स्तर की साधना चाहिए। मगर सबसे मूलभूत चीज यह है कि इन दोनों त्रिकोणों को परस्पर काटना चाहिए।

मेरे शब्दों से आपको ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। मैं सिर्फ आपको भ्रमित करने के लिए कुछ कहता हूं। आप बातचीत से किसी को ज्ञान नहीं दे सकते।
जैसा मैंने कहा अगर आप दोनों समबाहु त्रिकोणों को ऐसे बिंदु तक ले आएं, जहां वे एक-दूसरे को इस तरह काटते हों कि छह समबाहु त्रिकोणों वाला एक तारा बन जाए, तो आपका सिस्टम संतुलित और बहुत ग्रहणशील हो जाता है। मेरा काम आप तक कुछ संप्रेषित करना यानी पहुंचाना है, जिसके लिए आपमें ग्रहणशीलता की जरूरत है। मेरे शब्दों से आपको ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। मैं सिर्फ आपको भ्रमित करने के लिए कुछ कहता हूं। आप बातचीत से किसी को ज्ञान नहीं दे सकते। रूपांतरण की शक्ति तो उपस्थिति में होती है।

निष्कर्ष से भ्रम और फिर चेतनता तक

बातचीत से सिर्फ लोगों के मूर्खतापूर्ण निष्कर्षों को नष्ट किया जा सकता है। निष्कर्षों के नष्ट होने पर भ्रम पैदा होता है। दुनिया में हर चीज के बारे में खुशी-खुशी भ्रमित होना एक अच्छी स्थिति है। इसका मतलब है कि आप लगातार हर चीज पर ध्यान दे रहे हैं।

आपके पास जितने निष्कर्ष होते हैं, आपके दिमाग और शरीर में उतनी ही अकड़न होती है।
जब आपको एहसास होता है कि आप कुछ नहीं जानते, तो आप ग्रहणशील हो जाते हैं। अगर आपके पास हर चीज के बारे में निष्कर्ष हो, तो फिर कोई ग्रहणशीलता नहीं होती। अगर आप हर चीज को लेकर निष्कर्ष रखते हैं, तो आपको किसी चीज पर ध्यान देने की जरूरत नहीं होती – आप किसी मरे हुए इंसान की तरह जीवन जी सकते हैं। आपके पास जितने निष्कर्ष होते हैं, आपके दिमाग और शरीर में उतनी ही अकड़न होती है।

हठ योग भी मन से जुड़ा है

अगर आप रोज हठ योग करते हैं, तो आप ध्यान देते होंगे कि जिस दिन आपका रवैया अकड़ा हुआ होता है, उस दिन आपका शरीर भी नहीं मुड़ता। जिस दिन आप खुश और दिमागी तौर पर लचीले होते हैं, आपका शरीर भी बेहतर तरीके से मुड़ता है।

वास्तव में लोगों के पास जितने विकल्प होते हैं, वे उतने ही ज्यादा बीमार पड़ते हैं।
आपकी चेतनता की प्रकृति आपके जीवन के हर पल, आपके शरीर की हर कोशिका में अभिव्यक्त होती है। यही वजह है कि आजकल दुनिया में बहुत सी बीमारियां हैं, जिन्हें इंसान खुद पैदा करता है। पहले कभी इंसानों के पास भोजन के इतने विकल्प नहीं थे, जितने आज हैं। पहले के समय में, लोग वह खाते थे, जो स्थानीय तौर पर उपलब्ध होता था। आजकल इतनी विविधता के बावजूद, बहुत सी बीमारियां हैं। वास्तव में लोगों के पास जितने विकल्प होते हैं, वे उतने ही ज्यादा बीमार पड़ते हैं।

चेतना की प्रकृति स्वास्थ्य तय करती है

अमेरिका शायद उन देशों में से एक है जहां भोजन के विकल्पों की सबसे अधिक विविधता है, लेकिन वे स्वास्थ्य सेवाओं पर भी बड़े पैमाने पर खर्च कर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर उनका खर्च तीन ट्रिलियन डॉलर प्रतिवर्ष है।

अगर आप अपनी चेतना की प्रकृति को ठीक रखना नहीं जानते, तो आप नहीं जान पाएंगे कि अपने शरीर को स्वस्थ कैसे रखें।
यह मानवता के खिलाफ एक अपराध है। जिन लोगों को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, उनका बीमार होना समझ में आता है। मगर अच्छी तरह खाने वाले लोग अगर बीमार पड़ें, तो इसका मतलब है कि कहीं कोई बुनियादी गलती है। हम यह समझ नहीं पाए हैं कि हमारे शरीर की हर कोशिका हमारी चेतना की प्रकृति से बनी है। अगर आप अपनी चेतना की प्रकृति को ठीक रखना नहीं जानते, तो आप नहीं जान पाएंगे कि अपने शरीर को स्वस्थ कैसे रखें। फिर आपका शरीर संयोग से काम करेगा, जो कि होना जरुरी नहीं है।

चेतनता ही हमें सभी जीवों अलग बनाती है

हम इंसान वह सब कुछ करते हैं, जो बाकी जीव करते हैं – हम खाते हैं, सोते हैं, बच्चे पैदा करते हैं और मर जाते हैं। उनसे हमें अलग करने वाली एक चीज यह है कि हम इन सब को लेकर बहुत हंगामा करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि हम इन सारी चीजों को पूरी चेतनता में कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, आप पूरी चेतनता में खा सकते हैं। मान लीजिए, आपको बहुत भूख लगी है।

अगर आप सिर्फ क्रिया में नहीं, बल्कि विचार, भावना और ऊर्जा में, जीवन के हर पहलू को चेतन बना देंगे – तो आप दुनिया के शिखर पर हो सकते हैं।
अगर आप कोई और जीव होते, तो आप खाने लायक कोई भी चीज लेकर उसे झटपट खा लेते। मगर एक इंसान के रूप में आप भोजन के समय का इंतजार करते हैं, मेज पर बैठते हैं, मंत्र पढ़ते हैं और दोनों हाथों से अपने मुंह में ठूंसने की बजाय, दाहिने हाथ से खाते हैं। इसी को चेतनता कहते हैं। अगर आप सिर्फ शरीर की बात सुनेंगे, तो आप तुरंत खाना चाहेंगे। मगर चूंकि आपके पास शरीर की बाध्यता को रोकने के लिए जरूरी बुद्धि और जागरूकता है, आप चेतन तरीके से प्रतिक्रिया कर सकते हैं। अगर कोई बहुत बाध्यकारी तरीके से बर्ताव करता है, तो कहा जाता है कि वह जानवर की तरह है। इसलिए यह बाध्यता से चेतनता तक की यात्रा है।

चेतनता आपको अपनी प्रवृत्तियों से मुक्त होने की संभावना प्रदान करती है। चाहे अभी तक आप हर तरह की प्रवृत्तियों के वश में रहे हों, अगर अब आप पूरी चेतना में प्रतिक्रिया करते हैं, तो आपके और आपकी जमा की हुई प्रवृत्तियों के बीच एक दूरी होगी। अगर आप सिर्फ क्रिया में नहीं, बल्कि विचार, भावना और ऊर्जा में, जीवन के हर पहलू को चेतन बना देंगे – तो आप दुनिया के शिखर पर हो सकते हैं।


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