कृष्ण पहुंचे नाग-कन्याओं के रूमानी टापू पर – भाग 1

कृष्ण पहुंचे नाग-कन्याओं के रूमानी टापू पर
कृष्ण पहुंचे नाग-कन्याओं के रूमानी टापू पर

अभी तक आपने पढ़ा कि कृष्ण अपने गुरु संदीपनी के पुत्र पुनर्दत्त को वापस लाने के लिए निकल पड़ते हैं। उसे समुद्री डाकुओं ने पकडक़र बेच दिया था। कृष्ण और उनके भाई बलराम समुद्री डाकुओं के जहाज पर चढऩे में सफल हो जाते हैं और अंतत: उस जगह पहुंच जाते हैं, जहां उनको पुनर्दत्त के मिलने की उम्मीद होती है।

कृष्ण एक ऐसे टापू पर पहुंचते हैं, जहां बिल्कुल अलग तरह की संस्कृति है। वहां की सामाजिक व्यवस्था मातृ-सत्तात्मक है। मातृ-सत्तात्मक समाज में परिवार का मुखिया पिता नहीं माता होती है। इसलिए वहां के राजपाट का उत्तराधिकारी भी कोई महिला होती थी और उसी का शासन वहां चलता था। वहां की रानी तंत्र-विद्या जानती थी और अपने आस-पास के लोगों पर उसका पूरा वश चलता था। उसे देवी मां की तरह लोग आदर देते थे और अक्सर वह ऐसी अवस्था में चली जाती थी, जहां उसमें ब्रह्मांड की देवी का वास होता था।

कृष्ण और उनके भाई को उनके ठहरने के स्थान की ओर ले जाया गया। छोटी राजकुमारी असिका कृष्ण को देखेते ही उन पर मोहित हो चुकी थी। वह कृष्ण से सटकर चलने लगी। उसके बाद से वह लगातार उनके आस-पास ही मंडराती रहती और दो दिन के भीतर ही उसे उनसे गहरा प्रेम हो गया।
वह उन चीजों को देख और कर सकती थी, जिसे आम लोग कभी समझ ही नहीं पाते थे। उसे होने वाली घटनाओं का समय से पहले ही आभास भी हो जाता था। कृष्ण उस टापू के करीब आ गए और अपनी नाव वहीं बांध दी। तट के रक्षकों से मिलने के लिए कृष्ण ने कुछ उपहार के साथ अपने भाई बलराम को भेजा, ताकि वे उनके आगमन की सूचना रानी को दें सकें और उनसे वहां उतरने की इजाजत लेकर आएं।

इतने समय में जहाज के अंदर हालात पूरी तरह बदल चुके थे। कृष्ण ने जाकर पूरे जहाज का जायजा लिया और वहां उनको लूटा हुआ काफी खजाना भी मिला। उन्होंने इस खजाने को अपनी निगरानी में ले लिया और उसे अलग-अलग करके ताले में बंद कर दिया। उन्होंने जहाज के नाविकों को भरपूर खाना दिया। यहां तक कि उन्होंने उनको नई धोतियां भी बांटी। उनकी सारी सजाएं भी माफ कर दी गईं। हुल्लू और हुक्कू को जहाज का पहरेदार बनाया गया, लेकिन उनके पास अब चाबुक नहीं था। इस तरह जहाज पर काम करने वाले लोगों की पूरी मंडली कृष्ण के लिए काम करने को तैयार थी। उनको कभी इतना रहमदिल मालिक नहीं मिला था।

कृष्ण के भाई बलराम टापू पर गए। वे उपहार देते हुए बोले, ‘वसुदेव के पुत्र कृष्ण पधारे हैं और यहां उतरने की आज्ञा चाहते हैं।’ कुछ देर बाद बलराम एक अधेड़ उम्र की महिला के साथ कृष्ण के पास लौटे, उसे देखने से लगता था कि वह टापू की कोई प्रमुख महिला होगी। अपनी नग्नता को छिपाने के लिए उसने सोने का कमरबन्द पहन रखा था और बहुत सारे कंठहार और चूडिय़ां भी पहनी हुई थीं। आने के साथ ही वह सीधे जहाज पर गई और कृष्ण को शहर में आने का न्योता दिया। कृष्ण के साथ कुछ और लोग भी नाव में सवार होकर उसके पीछे चल पड़े। वहां उतरने पर उनकी मुलाकात राजकुमारी लारिका, उसकी बहन असिका और वहां के राजुकमार से हुई, जो एक सभ्य व शालीन सा दिखने वाला युवक था।

रानी के पास जाते हुए रास्ते में कृष्ण को बताया गया कि वहां जाने पर सिर्फ महिलाओं को ही आदर देना। वही सबसे ज्यादा मायने रखती हैं। मिलने पर अभिवादन और दूसरी औपचारिकताएं पूरी हुईं। ताज पहनी हुई राजकुमारी भरे बदन वाली एक खूबसूरत महिला थी। उसकी तुलना में उसकी बहन दुबली थी, लेकिन खूबसूरती में उसके बराबर ही थी। उस जगह की रखवाली करने वालों में अधिकतर हथियारबंद महिलाएं ही थीं। हालांकि पुरुष सैनिक भी थे, लेकिन वे दूरी पर खड़े थे। वहां एक घाट भी था, जिसके किनारे पर मछली पकडऩे वाली नावें बंधी थीं। कृष्ण को बताया गया था कि उस टापू पर जाने वाले लोगों में से कभी कोई लौट कर नहीं आया, इसलिए उन्होंने सुरक्षा के साथ बाकी और चीजों का भी पूरा जायजा ले लिया।

उन्हें यह भी बताया गया था ‘आपके वहां पहुंचने से पहले ही दैवी शक्ति के जरिए रानी को पता चल जाएगा कि आप वहां पहुंच रहे हैं। वह भविष्य देखना जानती है। वह आपका नाम, आपके बारे में तमाम जानकारी, आप कहां से आए हैं और किस तारीख को आप टापू पर आएंगे, वगैरह सब जानती है। उसके पास हमारे संतों जैसी शक्ति है।’ इसलिए कृष्ण इस महिला से मिलने से पहले थोड़े सावधान थे।

रास्ते में कृष्ण को जो भी मिलता, वह सभी को आदर देते। फिर उन्हें रानी के पास ले जाया गया।

पुनर्दत्त ने कहा, ‘मैं तो यही सोच कर यहां शांति से रह रहा था कि मेरे पिता अब तक मुझे भूल चुके होंगे। अब आपने आकर मुझे बेचैन कर दिया है। लेकिन मेरी वापसी का कोई रास्ता नहीं है। अगर मैंने यहां से निकलने की कोशिश भी की, तो मैं यहीं मारा जाउंगा।’
जब वह महल में घुसे और आंगन के अंदर वाले हिस्से में पहुंचे, तो एक भद्र दिखने वाला पुरुष जिसे वहां का राजा कह कर उनसे मिलवाया गया, उन्हें अपने साथ रानी के पास ले गया। वहां आग जल रही थी। जब वे लोग वहां पहुंचकर आग के पास खड़े हुए, तो अचानक आग की लपटें उस पुरुष की लंबाई से भी उंची हो गईं और रानी उसमें से प्रकट हुई। उसने सभी का स्वागत किया। कृष्ण उनकी भाषा नहीं समझ पा रहे थे और न ही वे लोग कृष्ण की आर्य-भाषा को समझ पा रहे थे। लेकिन राजकुमार दोनों भाषाओं का पूरी समझदारी के साथ अनुवाद कर रहा था। कृष्ण ने राजा व राजकुमार से कहा, ‘मैं यहां अपने गुरु संदीपनी का प्रतिनिधि बनकर आया हूं।’ यह सुनते ही राजकुमार के चेहरे पर अचानक डर के भाव आ गए और वह कुछ बेचैन नजर आने लगा। कृष्ण को तभी समझ में आ गया कि वह इसी लडक़े की तलाश में यहां आए हैं। तभी कृष्ण ने अपने मन में किसी भी तरह से उसे यहां से निकालने की योजना बना ली।

कृष्ण और उनके भाई को उनके ठहरने के स्थान की ओर ले जाया गया। छोटी राजकुमारी असिका कृष्ण को देखेते ही उन पर मोहित हो चुकी थी। वह कृष्ण से सटकर चलने लगी। उसके बाद से वह लगातार उनके आस-पास ही मंडराती रहती और दो दिन के भीतर ही उसे उनसे गहरा प्रेम हो गया। कृष्ण को उसे खुद से दूर रखने में खासी दिक्कत हो रही थी, क्योंकि वे नागकन्याएं थीं। अपनी नग्नता को ढकने के लिए वे बस अपनी कमर पर सोने का कमरबन्द ही बांधती थीं और अपना दर्जा दिखाने के लिए माणिक या नीलम को नाग के फन के आकार में सिर पर धारण करती थीं। वे बिल्कुल अलग स्वभाव की थीं। वे बचपन से ही ऐसे माहौल में पली-बढ़ी थीं जहां उन्हें शरीर का सुख भोगना सिखाया गया था और यह बताया गया था कि महिलाओं को कैसा होना चाहिए। यह एक तरीका था, वहां आने वाले लोगों को वश में करने का। उनके पास और भी तरकीबे थीं, जिनकी काट लोगों के पास नहीं होती थी। इसलिए कृष्ण इस लडक़ी से बहुत होशियार थे और उसे अपने से दूर रखने की कोशिश कर रहे थे।

उन्होंने अपने गुरु-पुत्र पुनर्दत्त को, जो अब इस जगह का राजकुमार बन चुका था, एक कोने में ले जाकर कहा, ‘मैं तुम्हें घर ले जाने के लिए यहां आया हूं। तुम्हारे पिता का एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरता, जिस दिन वह तुम्हें याद न करते हों। वह तुम्हें लेकर बहुत दुखी हैं। तुम्हें जरूर वापस आना चाहिए।’ पुनर्दत्त ने कहा, ‘मैं तो यही सोच कर यहां शांति से रह रहा था कि मेरे पिता अब तक मुझे भूल चुके होंगे। अब आपने आकर मुझे बेचैन कर दिया है। लेकिन मेरी वापसी का कोई रास्ता नहीं है। अगर मैंने यहां से निकलने की कोशिश भी की, तो मैं यहीं मारा जाउंगा।’ कृष्ण ने कहा, ‘तुम उसकी चिंता मत करो, बस मेरे साथ आओ। मैं देखूंगा कि तुम्हें इस जगह से किस तरह बाहर लेकर जाना है।’ यह सुनकर पुनर्दत्त ने कहा, ‘मेरे यहां से नहीं जा सकने की सिर्फ यही एक वजह नहीं है। बल्कि इस जगह को छोडऩा मैं भी नहीं चाहता।’ कृष्ण ने जब कारण पूछा तो पुनर्दत्त ने जवाब दिया, ‘आप यह नहीं जानते हैं कि ये नागकन्याएं किन तरीकों से पुरुषों को अपने बस में कर लेती हैं। मैं इस हद तक इनका गुलाम बन चुका हूं कि अब यहां से मेरे बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं बचा है। साथ ही मैं हमेशा मारे जाने के डर से भी भयभीत रहता हूं, क्योंकि यह इस जगह की परंपरा है कि यहां अगर कोई नया पुरुष आता है, तो यहां चुनाव का उत्सव मनाया जाता है। चुनाव के उत्सव का मतलब है कि राजकुमार को टापू पर आने वाले उस नए पुरुष से मुकाबला करना होता है। अगर वह जीतता है, तो वह राजकुमारी का पति और राजकुमार बना रह सकता है। अगर वह इस मुकाबले में मर जाता है, तो नया पुरुष राजकुमारी का पति और राजकुमार बन जाता है। अभी तक मैं इस टापू पर आने वाले तीन आदमियों की हत्या कर चुका हूं। वे बेचारे गरीब आदमी तो युद्ध के बारे में कुछ जानते भी नहीं थे, ऐसे लोगों को मैंने मौत के घाट उतार दिया। और अब मुझे हमेशा यही डर सताता रहता है कि यहां कोई ऐसा आएगा, जो मुझसे बेहतर योद्धा होगा और वह मुझे खत्म कर देगा। मैं हमेशा इसी खतरे के साथ जीता रहता हूं। जबकि देवी मां यानी रानी माता, जो कई बार ब्रह्मांड की देवी को अपने अंदर धारण कर लेती हैं, बेहद ताकतवर हैं। वह महज अपने विचारों से हम पर शासन करती हैं। ऐसे में इस जगह को छोडऩे का मेरे लिए कोई रास्ता नहीं है।’

आगे जारी …


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