कृष्ण जन्माष्टमी : भाग दो

कृष्ण जन्माष्टमी
कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर प्रस्तुत इस श्रृंखला की पहली कड़ी में आप पढ़ चुके हैं, कि कैसे एक आकाशवाणी के बाद कंस अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को जेल में बंद कर देता है, और उनके एक-एक कर छ: बच्चों की हत्या कर देता है। अब पढि़ए आगे की कहानी-

 

उसी समय बच्चे के जन्म के साथ एक चमत्कार हुआ। कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। सभी सिपाही सो गए और जंजीरें खुल गईं। शीघ्र ही वासुदेव ने अंतर्ज्ञान से दैवीय शक्ति को पहचान लिया, और बच्चे को लेकर यमुना नदी की ओर चल दिए। हालांकि सब जगह पानी बह रहा था, फिर भी उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि नदी के घाट सट गये और वह सरलता से पार कर गये।

देवकी और वासुदेव, कंस के तौर तरीकों से बेहद कुंठित हो गए थे। पूरे राज्य में प्रजा भी उससे बेहद डरी हुई थी। धीरे-धीरे दूसरे लोग भी कुंठित होने लगे और महल के अंदर ही फूट और अनबन होने लगी। जब सातवां बच्चा आया तब वासुदेव ने कुछ जुगाड़ करके उसे एक मरे हुए नवजात बालक से बदल दिया और अपने बच्चे को वहां से बाहर निकालने में सफल रहे। वे बोले, ‘यह बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ है। बताइए, हम क्या करें?  क्योंकि यह पहले से ही मरा हुआ है, इसीलिए आपको इसे मारने का सौभाग्य नहीं मिलेगा।‘  इस तरह वासुदेव और देवकी के सातवें बच्चे को यमुना पार पहुंचा दिया गया। यमुना नदी के एक ओर मथुरा और दूसरी ओर गोकुल है। इस बच्चे को वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के पास गोकुल पहुंचा दिया गया।

उस वक्त अधिकतर विवाह राजनैतिक संधि के तौर पर होते थे। उस वक्त जो राजा होता था, वह जहां भी राजनैतिक, सैनिक संबंध और शांति लाना चाहता था, वहां की कन्या से विवाह कर लेता था। दरअसल, राजा को पता होता था कि क्योंकि दूसरे दल ने उसे अपनी कन्या दे दी है, इसलिए वह उस पर हमला तो कर नहीं सकता। यह वह वक्त था, जब राजा एक के बाद एककितने ही विवाह करते रहते थे। यह कुटनीति का हिस्सा होता था।

खैर, वासुदेव और देवकी की जिस सातवीं संतान को रोहिणी के पास पहुंचाया गया था, उसका नाम बलराम रखा गया। बड़े होकर बलराम बहुत बलशाली हुए, उनके बल और वीरता की कई कहानियां मशहूर हुईं।

कृष्ण का अवतरण

उधर वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान आने से पहले कंस बहुत घबरा गया। वासुदेव और देवकी को नजऱबंद करके रखा गया था, लेकिन बाद में वासुदेव को जंजीरों में बांध दिया गया और देवकी को एक कारागार में डाल दिया गया। भाद्र कृष्ण अष्टमी को आधी रात को देवकी के यहां आठवीं संतान ने जन्म लिया। उस वक्त बादल गरज रहे थे और तेज बारिश हो रही थी। कुछ होने के डर से कंस ने किसी को भी कारागार में जाने की अनुमति नहीं दी थी। उसने पूतना नाम की अपनी एक भरोसेमंद राक्षसी को दाई के तौर पर देवकी पर नजर रखने को कहा था। योजना कुछ इस तरह थी कि जैसे ही बच्चे का जन्म होगा, पूतना उसे कंस को सौंप देगी और उसे मार दिया जाएगा। प्रसव पीड़ा शुरू हुई। दर्द होता और कम हो जाता, फिर होता और फिर कम हो जाता। पूतना प्रतीक्षा करती रही, पर कुछ नहीं हुआ। तभी वह अपने घर गई। शौचालय से लौटकर जैसे ही वह वापस कारागार आने के लिए निकली, मूसलाधार बारिश होने लगी। सडक़ों पर पानी भर गया और इस स्थिति में पूतना वापिस कारागार नहीं पहुंच सकी। उसी समय बच्चे के जन्म के साथ एक चमत्कार हुआ। कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। सभी सिपाही सो गए और जंजीरें खुल गईं। शीघ्र ही वासुदेव ने अंतर्ज्ञान से दैवीय शक्ति को पहचान लिया, और बच्चे को लेकर यमुना नदी की ओर चल दिए। हालांकि सब जगह पानी बह रहा था, फिर भी उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि नदी के घाट सट गये और वह सरलता से पार कर गये। वह नदी पार करके नन्द और उनकी पत्नी यशोदा के घर पहुंचे। तभी यशोदा ने एक बच्ची को जन्म दिया था, और वह पीड़ा के कारण बेसुध थीं। वासुदेव ने बच्ची को कृष्ण से बदल दिया, और उसे लेकर वापस जेल में आ गए।

देवकी और वासुदेव कहने लगे, ‘यह बच्ची तुम्हे नहीं मार सकती। यदि यह लडक़ा होता, तभी तुम्हारा काल बनता। इसलिए इस बच्ची को छोड़ दो।’  लेकिन कंस बोला कि वह कोई संभावना नहीं रखना चाहता। उसने तुरंत बच्ची को उठाया, और जैसे ही वह उसे ज़मीन पर पटकने लगा, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश की ओर उड़ गई और हंसकर बोली, ‘तुझे मारने वाला तो कहीं और है।’

तभी बच्ची रोने लगी। सिपाहियों ने कंस को सूचित कर दिया। तब तक पूतना भी आ चुकी थी। कंस ने जब लडक़ी को देखा तो उसे लगा कि कुछ गलत हुआ है, इसलिए उसने पूतना से पूछा, ‘क्या तू बच्ची के जन्म के समय वहीं थी ?’  पूतना डर गई और बोली, ‘मैंने अपनी आंखों से देखा है, यह देवकी की ही बच्ची है।’  देवकी और वासुदेव कहने लगे, ‘यह बच्ची तुम्हे नहीं मार सकती। यदि यह लडक़ा होता, तभी तुम्हारा काल बनता। इसलिए इस बच्ची को छोड़ दो।’  लेकिन कंस बोला कि वह कोई संभावना नहीं रखना चाहता। उसने तुरंत बच्ची को उठाया, और जैसे ही वह उसे ज़मीन पर पटकने लगा, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश की ओर उड़ गई और हंसकर बोली, ‘तुझे मारने वाला तो कहीं और है।’

अब कंस को सच में वहम हो गया। उसने वहां सब से पूछताछ की। सिपाही सो गए थे और पूतना चली गई थी। जाहिर है, कोई भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं था। लेकिन कंस संतुष्ट नहीं हुआ। उस बच्ची की कही गई बात उसे मन ही मन परेशान करती रही। भाद्र का महीना था। उसने भाद्र मास में जन्मे सभी बच्चों को मारने के लिए अपने लोग भेज दिए। शुरू में ये लोग कुछ बच्चों को लेकर आए और उन्हें मार दिया, लेकिन इससे जनता के बीच असंतोष और गुस्सा पनप गया। लोगों ने इसका विरोध किया। कंस को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा। फिर उसने पूतना को बुलाकर कहा, ”सैनिकों द्वारा बच्चों को मारने का विरोध हो रहा है। तुम महिला हो। तुम घर-घर जाओ और भाद्र के महीने में पैदा हुए बच्चों को मार डालो।’  पूतना ने ऐसा करने से मना कर दिया, लेकिन कंस के जोर देने पर उसने हामी भर दी।

पूतना हर घर में जाती और श्रावण मास में पैदा हुए बच्चों को मार देती। इस तरह उसने नौ बच्चों को मार दिया। वह और बच्चों को नहीं मारना चाहती थी। वह कंस के पास गई और बोली, ”काम हो गया है।’  कंस बोला, ”तुम झूठ बोल रही हो। ऐसा कैसे हो सकता है कि भाद्र के महीने में बस नौ ही बच्चे पैदा हुए हों। और भी बच्चे होंगे। जाओ और पता करो।’  पूतना गई और फिर आकर कंस से कहा, ”बस नौ ही बच्चों ने इस महीने जन्म लिया था। मैंने उन सभी को मार डाला है। अब इस महीने पैदा हुआ कोई बच्चा नहीं बचा है।‘

तो इस तरह कृष्ण को पशु पालक  समाज में पहुंचा दिया गया। एक  राजान्यास का बेटा होने के बावजूद उनका लालन पालन एक आम ग्वाले जैसा हुआ। उनके बचपन की कई कहानियां आपने सुनी होंगी। उनकी जिंदगी में तमाम दिलचस्प घटनाएं और चमत्कार हुए। इनके बारे में हम जल्दी ही बात करेंगे।

आगे जारी …

Image courtesy: Shivani Naidu

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