ईशा क्रिया: ज्यादा प्राणवान और जीवंत होने के विधि – भाग 2

पिछले ब्लॉग में आप ने जीवन में ध्यान के महत्व के बारे में पढ़ा। ईशा क्रिया, एक सरल ध्यान है, जिसे करके आप घर बैठे सीख सकते हैं और जिसके नियमित अभ्यास से बहुत से लाभ उठा सकते हैं…आइये इस विडियो के माध्यम से जानते हैं, ईशा क्रिया के निर्देश:

इस क्रिया से जुड़े, और अक्सर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

 

  • साँस का क्या महत्व है? अच्छी तरह साँस लेने से आदमी स्वस्थ रहता है। क्या इसके दूसरे फायदे भी हैं?
  • सद्‌गुरु: सांस वो धागा है, जो आपको शरीर से बांध कर रखता है। अगर मैं आपकी सांसें ले लूं तो आपका शरीर छूट जाएगा। यह सांस ही है, जिसने आपको शरीर से बांध रखा है। जिसे आप अपना शरीर और जिसे ‘मैं’ कहते हैं, वे दोनों आपस में सांस से ही बंधे हैं। यह सांस ही आपके कई रूपों को तय करती है।जब आप विचारों और भावनाओं के विभिन्न स्तरों से गुजरते हैं, तो आप अलग-अलग तरह से सांस लेते हैं। आप शांत हैं तो एक तरह से सांस लेते हैं। आप खुश हैं, आप दूसरी तरह से सांस लेते हैं। आप दु:खी हैं, तो आप अलग तरह से सांस लेते हैं।
    यह ऊर्जा या प्राण, शरीर में खास तरीके से चलता है, यह मनमाने ढंग से नहीं चलता। इसके चलने के 72,000 विभिन्न ढंग हैं। दूसरे शब्दों में, हमारी प्रणाली में 72,000 रास्ते हैं जिनसे यह चलता है। इन रास्तों को नाड़ियां कहते हैं।
    क्या आपने यह महसूस किया है? इसके ठीक उल्टा है प्राणायाम और क्रिया का विज्ञान। जिसमें एक खास तरह से, सचेतन सांस लेकर अपने सोचने, महसूस करने, समझने और जीवन को अनुभव करने का ढंग बदला जा सकता है। शरीर और मन के साथ कुछ दूसरे काम करने के लिए इन सांसों को एक यंत्र के रूप में कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। आप देखेंगे कि ईशा क्रिया में हम सांस लेने की एक साधारण प्रक्रिया का इस्तेमाल कर रहें हैं, पर क्रिया सिर्फ सांस में नहीं है। सांस सिर्फ एक उपकरण है। सांस तो एक शुरूआत है, पर जो होता है वह अद्भुत है। आप जिस तरह से सांस लेते हैं, उसी तरह से आप सोचते हैं। आप जिस तरह से सोचते हैं, उसी तरह से आप सांस लेते हैं। आपका पूरा जीवन, आपका पूरा अचेतन मन आपकी सांसों में लिखा हुआ है। अगर आप सिर्फ अपनी सांसों को पढ़ें, आपका अतीत, वर्तमान और भविष्य आपकी सांस लेने की शैली में लिखा हुआ है।एक बार जब आप इसे जान जाते हैं, जीवन बहुत अलग हो जाता है। इसे अनुभव करना होता है, यह ऐसा नहीं है जिसे आप प्रवचन से सीख सकते हैं। अगर आप बस यहां बैठने का आनंद जानते हैं, यानी कुछ सोचे बिना, कुछ किए बिना, बस बैठने का आनंद जानते हैं, सहज एक जीवन के रूप में बैठना, तब जीवन बहुत अलग हो जाता है।यह असल में क्या है, आज इसका वैज्ञानिक सबूत है कि बिना शराब की एक बूंद लिए, बिना कोई चीज लिए, आप यहां सहज बैठकर, अपने आप नशे में मतवाले व मदहोश हो सकते हैं। अगर आप एक खास तरह से जागरूक हैं, तो आप अपनी आंतरिक प्रणाली को इस तरह से चला सकते हैं कि आप सिर्फ यहां बैठने मात्र से परमानंद में चले जाते हैं। एक बार जब केवल बैठना और सांस लेना इतना बड़ा आनंद बन जाए, आप बहुत हंसमुख, विनम्र और अद्भुत हो जाते हैं, क्योंकि तब आप अपने अंदर एक ऊंची अवस्था में होते हैं। दिमाग पहले से ज्यादा तेज हो जाता है ।
  • जरा-सा ऊपर उठे चेहरे के साथ मुझे क्यों बैठना चाहिए?
  • सद्‌गुरु: जरा-सा ऊपर उठे चेहरे के साथ आप इसलिए नहीं बैठते हैं कि आप आसमान में तैरती कोई चीज देखना चाहते हैं या कोई कल्पना करना चाहते हैं। आप चेहरा ऊपर की ओर इसलिए रखतें हैं, क्योंकि जब आपकी प्रणाली ऊपर की ओर केंद्रित होती है, यह ग्रहणशील हो जाती है। यह एक खिड़की खोलने जैसा है। यह कृपा का पात्र होने जैसा है। जब आप इच्छुक और ग्रहणशील हो जाते हैं, आपका शरीर अपने आप ऊपर की ओर खिंचने लगता है।
  • ध्वनि ’आ…‘(आऽऽऽ) के उच्चारण का मुझ पर क्या असर होगा?
  • सद्‌गुरु: जब आप ध्वनि ‘आ…’ का उच्चारण करते हैं, आपके शरीर का भरण-पोषण केंद्र जागृत हो जाता है। यह केंद्र मणिपूरक चक्र है। मणिपूरक चक्र आपकी नाभि से पौन इंच नीचे होता है। जब आप अपनी मां के गर्भ में थे, तब यह ‘भरण-पोषण’ नली वहां जुड़ी थी। अब नली नहीं है, पर यह भरण-पोषण केंद्र अब भी आप के नाभि में है। जैसा इंसान का एक भौतिक शरीर होता है, वैसे ही एक पूरा ऊर्जा शरीर भी होता है, जिसे हम आमतौर पर प्राण या जीवन शक्ति के रूप में जानते हैं। यह ऊर्जा या प्राण, शरीर में खास तरीके से चलता है, यह मनमाने ढंग से नहीं चलता। इसके चलने के 72,000 विभिन्न ढंग हैं। दूसरे शब्दों में, हमारी प्रणाली में 72,000 रास्ते हैं जिनसे यह चलता है। इन रास्तों को नाड़ियां कहते हैं। इनका कोई भौतिक रूप नहीं होता, अगर आप शरीर को काटकर और अंदर देखें तो आपको ये नाड़ियां नहीं मिलेंगी। लेकिन जैसे ही आप ज्यादा जागरूक होते जाते हैं, आप महसूस करेंगे कि ऊर्जा मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि तय रास्तों से प्रवाहित हो रही हैं।
    आप चेहरा ऊपर की ओर इसलिए रखतें हैं, क्योंकि जब आपकी प्रणाली ऊपर की ओर केंद्रित होती है, यह ग्रहणशील हो जाती है।
    जब आप ‘आ…’ का उच्चारण करतें हैं, आप देखेंगे कि कंपन नाभि से पौन इंच नीचे शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाता हैं। ध्वनि ‘आ…’ एकमात्र कंपन है, जो पूरे शरीर में फैलता है, क्योंकि यह अकेला स्थान है जहां 72,000 नाड़ियाँ मिलती हैं और फिर से बंट जाती हैं। ये सब मणिपूरक पर मिलती हैं और खुद को फिर से बांट लेती हैं। यह शरीर में ऐसा एकमात्र बिंदु है। अगर आप ध्वनि ‘आ…’ का उच्चारण करते हैं, उसका कंपन पूरी प्रणाली में फैल जाता हैं।यह कंपन आपके भरण-पोषण केंद्र को ऊर्जा से भरने में काफी मदद कर सकता है। इस केंद्र के जागृत होने से सेहत, सक्रियता, समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है।
  • ईशा क्रिया के लिए क्या खाली पेट होना चाहिए? खाने और इस क्रिया के बीच कितने समय का अंतर होना चाहिये?
  • खाली पेट होना आवश्यक नहीं है। खाने के तुरत बाद भी इसे किया जा सकता है। हालांकि खाना खाने के बाद पेट भरे होने से आपको नींद आ सकती है।
  • क्या ध्यान कुछ दिनों तक ही करने की जरूरत है? या इसे जीवन भर करना होगा?
  • ध्यान एक प्रक्रिया है जो आपके दैनिक जीवन का हिस्सा बन सकती है, उसी तरह जैसे आप और काम करते हैं। आप मंजन करने का उदाहरण ले, शुरू में आपसे कहा गया कि ये आपको करना ही है, लेकिन जैसे ही आपने इसका महत्व समझ लिया आप इसे खुद ब खुद करने लगे, बिना इसके बारे में सोचे। यही बात ध्यान के साथ लागू होती है। जब एक बार आप इसका महत्व समझ लेते हैं तब कोई खास कोशिश किये बिना, स्वाभाविक रूप से यह आपके जीवन का एक अंग बन जायेगा। लेकिन ऐसा होने से पहले, शुरू में आपको इसे नियमित रूप से करना पड़ेगा। इसीलिए हम ज़ोर देते हैं कि बिना नागा किये इसको दिन में दो बार 48 दिन तक करना है ।

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  • Queen of warrior

    Without any specific reason I feel very negative in every situation. Even I know somewhere in my mind that this is not good for my health but don’t know how to stop this unmanageable feeling.This is making my mind very tired and exhausted. I want live my life like normal people do.please help me out.