गर्भ धारण : सूक्ष्‍म शरीर कब प्रवेश करता है गर्भ में?

गर्भ धारण : सूक्ष्‍म शरीर कब प्रवेश करता है गर्भ में?

सद्‌गुरुक्या माँ के गर्भ धारण करते ही उसमें पल रहा भ्रू्ण जीवित हो जाता है? या फिर कुछ समय बाद प्रवेश करता है भ्रूण में जीवन? कैसे चुनता है कोई प्राणी अपने लिए गर्भ? आइये जानते हैं इस प्रश्न और उत्तर की श्रृंखला से जिसमें जीवन के सृजन के बारे में चर्चा हो रही है…

आदित्य: तो सद्‌गुरु, क्या सृजन करने से हमारा मतलब एक औरत का गर्भ धारण करने से है?

सद्‌गुरु: एक औरत गर्भ धारण करती है, क्योंकि दो कोशिकाएं मिलती हैं।

आदित्य: तो क्या गर्भ धारण के वक्त ही कोई ऊर्जा-शरीर गर्भ में प्रवेश करता है?

सद्‌गुरु: नहीं, यह उस वक्त नहीं होता। उस वक्त, वह मौजूद नहीं होता। जैसे-जैसे एक औरत के गर्भ में भौतिक-शरीर धीरे-धीरे बढऩे लगता है… देखिए यह कुछ वैसे ही है जैसे कि कोई घोंसला मौजूद था, किसी चिडिय़ा ने घोंसला बनाया था; एक दूसरी चिडिय़ा ने आकर वहां अंडे दिए और जीवन बनने लगा। यह बस ऐसा ही है। किन्हीं दो बेवकूफ ों ने मिलन किया और उन्होंने एक शरीर का सृजन करना शुरू किया। कोई दूसरा जो जन्म लेने के लिए तैयार है, वह हमेशा एक शरीर की तलाश में रहता है; उसे वह मिल जाता है। लेकिन उसके पास चयन के लिए कुछ विकल्प होते हैं। उसके पास शरीर चुनने का विकल्प कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसने अपना जीवन कितना सचेतन होकर जिया था।

प्राणी कैसे चुनता है गर्भ?

आदित्य: क्या यह विकल्प हमेशा होता है, सद्‌गुरु?

सद्‌गुरु: थोड़ा-बहुत विकल्प हमेशा होता है; लेकिन जब मैं विकल्प कहता हूं, तो यह ऐसा नहीं है कि आप एक दुकान में जाएं और बहुत सारी कमीजों में से कोई कमीज छांट कर खरीद लें। इस तरह का विकल्प नहीं होता है। यह एक कार्मिक विकल्प है। एक प्राणिक-शरीर के लिए एक खास दिशा में, एक खास गर्भ में, एक खास शरीर में जाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। वह स्वाभाविक झुकाव हमेशा होता है। देखिए, यहां भी जब आप एक भौतिक शरीर में जीवित हैं, तो कुछ खास लोगों को पाने का आपका स्वाभाविक रुझान होता है, क्योंकि आपके कर्म ही उस तरह के हैं। तो उसी तरह, जब आपके पास भौतिक-शरीर नहीं होता, तो यह और भी ज्यादा अचेतन तरीके से होता है, लेकिन तब भी, जो कार्मिक-तत्व आप लिए फि रते हैं, वह एक खास तरह के शरीर की तलाश करता है। तो जैसे ही उसे वह शरीर मिल जाता है, तो फि र उस प्राण की जीवंतता उस भौतिक शरीर की गुणवत्ता को बढ़ाने लगती है। यह सिर्फ मां ही नहीं है जो बच्चे को बनाती है, उसका निर्माण करती है। ऐसी लाखों मिसालें हैं, जब मां कमजोर, कुपोषित, यहां तक कि सडक़ों पर रहती थी और फि र भी उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। दूसरी तरफ , एक औरत जो संपन्न परिवार से है, जहां हर चीज का ख्याल रखा गया है और वह खुद अच्छी सेहत वाली है, वह एक बहुत कमजोर बच्चे को जन्म देती है। ऐसे अनगिनत मौके होते हैं। ऐसा उस प्राणिक-शरीर की जीवंतता या उसे ऊर्जा या कंपन कह लें, की वजह से होता है, जिसने उस खास शरीर को चुना है। इसी वजह से इस तरह का फर्क होता है। प्राणिक-शरीर के पास जिस तरह की जीवंतता है, वही तय करती है कि वह किस तरह का शरीर बनाती है। तो शरीर के सृजन का काम सिर्फ मां का ही नहीं होता। वहां जिस तरह का प्राणी आया है, एक हद तक वह भी इसे बनाता है।

कब प्रवेश करता है प्राणी गर्भ में?

आदित्य: तो सद्‌गुरु, गर्भ के अंदर जो शरीर होता है, उसमें यह प्राण असल में कब प्रवेश करता है?

सद्‌गुरु: देखिए, गर्भ धारण के बाद लगभग चालीस से अड़तालीस दिन तक यह बस एक शरीर ही रहता है। ऐसा कहा जाता है कि जब औरत को गर्भ धारण किए हुए चालीस दिन से ज्यादा हो जाएं, तो उसे गर्भपात नहीं कराना चाहिए, क्योंकि तब तक उसमें प्राणी आ चुका होता है। उसके पहले वह एक प्राणी नहीं होता है। शरीर के सिर्फ छोटे आकार की वजह से ही नहीं, बल्कि उस समय तक उसमें प्राण नहीं आया होता। वह बस कोशिकाओं का एक ढेर होता है। अब कोशिकाओं का यह ढेर प्राणी बन जाता है। हो सकता है अभी तक वह एक इंसान की तरह न हो, लेकिन कई मायनों में वह एक इंसान होता है। भले ही उसका व्यक्तित्व उस तरह से जाहिर न हो, लेकिन जिस तरह से एक बच्चा मां की कोख में पैर मारता है, वह भी हर बच्चे के लिए अलग होता है।

आदित्य: सद्‌गुरु, एक प्राणिक-शरीर जो कमजोर हो चुका है, इससे पहले कि एक भौतिक-शरीर को फि र से धारण करे, वह अपनी जीवंतता को फि र से कैसे हासिल करता है?

सद्‌गुरु: योग क्रिया के जरिए जो एक चीज हम कर रहे हैं – वह है खुद को जीवंत बनाना। यह तमामों दूसरे तरीकों से भी हो सकता है। जंगल में बस टहलना ही आपको जीवंत बना सकता है, अच्छा भोजन आपको पुनर्यौवन दे सकता है। योगाभ्यास आपको पुनर्यौवन दे सकता है। यह एक अलग आयाम है। यह सब तभी होता है, जब आपके पास एक शरीर हो। अब, जब आप शरीर छोड़ देते हैं, उसके बाद भी अगर प्राणिक-शरीर बहुत ज्यादा जीवंत है, मान लेते हैं कि मरते वक्त यह भरपूर जीवन में है, तो कुछ समय तक यह दूसरा शरीर हासिल नहीं कर सकता। इसके लिए, प्राणिक-शरीर को एक खास तरह से शांत होने की जरूरत होती है। सिर्फ तभी वह एक नया शरीर धारण कर सकता है। इसीलिए हम कह रहे हैं कि अगर वे किसी दुर्घटना में मरते हैं, तो वे एक लंबे समय तक बिना शरीर के बने रहेंगे, जिसे लोग आम तौर पर भूत-प्रेत कहते हैं।


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