क्यों नहीं होती महिला पुजारिन?

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Sadhguru

भारत में अधिकांश सार्वाजनिक मंदिरों की देख-रेख पुजारी करते हैं, पुजारिनें नहीं। यह भेदभाव है या विज्ञान? सद्‌गुरु से जानते हैं इसका उत्तर-

प्रश्न:सद्‌गुरु, भारत में अधिकांश मंदिरों की देखभाल पुरुष पुजारी करते हैं, बहुत कम मंदिरों में पुजारिनें होती हैं। ऐसा क्यों?

सद्‌गुरु: पुरुष सभी मंदिरों की देखभाल क्यों कर रहे हैं? शायद स्त्रियां पुरुषों की देखभाल कर रही हैं! इतिहास में एक खास समय में किसी खास स्थिति और संदर्भ में परंपराएं बनीं। उदाहरण के लिए, आज कितनी सारी स्त्रियां दुनिया भर की सैर करती हैं और लंबी दूरी की यात्रा करती हैं, इसलिए नहीं कि दुनिया आजाद ख्याल हो गई है, बल्कि टेक्नोलॉजी के विकास की वजह से। टेक्नोलॉजी कुछ हद तक बराबरी लाई है। पहले स्थिति ऐसी थी कि घर से बाहर के काम पुरुष के लिए अधिक उपयुक्त थे, स्त्री के लिए नहीं।

मंदिर की देखभाल कौन करेगा, यह सवाल श्रेष्ठता या हीनता का नहीं है, यह उपयुक्तता का सवाल है। अलग-अलग तरह के कामों के लिए, अलग-अलग तरह के लोग उपयुक्त होते हैं। उसी के अनुसार, वह काम होता है। यह लिंग की बात नहीं, गुण की बात है।

यह एक पहलू है। इसके और आयाम भी हैं। इस देश में, केवल सार्वजनिक मंदिरों की देखभाल पुरुष करते थे, क्योंकि जनता को संभालने के लिए वे अधिक उपयुक्त थे। पर ऐसा कोई घर नहीं था, जहां कोई छोटा-मोटा मंदिर न हो, और इन निजी मंदिरों की देखभाल हमेशा स्त्रियां करती थीं। इसलिए उस अर्थ में, ज्यादातर मंदिरों के प्रबंधन और देखभाल का काम तो पुरुषों से अधिक स्त्रियों के पास था, और अब भी ऐसा ही है।

एक और पहलू यह है कि वह किस तरह का मंदिर है। कुछ ऐसे मंदिर हैं, जहां हम निश्चित रूप से नहीं चाहेंगे कि स्त्रियेां वहां पर हों। इसी तरह कुछ ऐसे मंदिर हैं जहां हम पुरुषों का होना पसंद नहीं करेंगे। यह इस पर निर्भर करता है कि मंदिरों को कैसे और किस उद्देश्य से प्रतिष्ठित किया गया है। इसके आधार पर, कुछ परंपराएं बनाई गईं। पुरुष और स्त्रियां भिन्न हैं लेकिन इंसानों के साथ समस्या यह है कि हर भिन्नता को एक भेदभाव की प्रक्रिया में बदल दिया जाता है। हर समाज रंग, लिंग, जाति, वर्ग या ऐसी चीजों के आधार पर अलग-अलग स्तर के भेदभाव बना लेता है। हर किस्म की बेकार बातों की बुनियाद पर लोग हमेशा खुद को श्रेष्ठ और किसी दूसरे को हीन बनाने के तरीके खोजते हैं।

मंदिर की देखभाल कौन करेगा, यह सवाल श्रेष्ठता या हीनता का नहीं है, यह उपयुक्तता का सवाल है। अलग-अलग तरह के कामों के लिए, अलग-अलग तरह के लोग उपयुक्त होते हैं। उसी के अनुसार, वह काम होता है। यह लिंग की बात नहीं, गुण की बात है। कुछ विशेषताएं महिलाओं में सहज होती हैं। कुछ अन्य गुण पुरुषों में अधिक आसानी से पाए जाते हैं। लेकिन इसका कोई निश्चित अनुपात नहीं होता है। कुछ स्त्रियां ऐसे कामों में निपुण हो सकती हैं, जो आम तौर पर एक पुरुष अच्छी तरह कर सकता है। कुछ पुरुष ऐसी चीजों में बहुत माहिर होते हैं जो आम तौर पर स्त्रियों से संबंधित माने जाते हैं। अभी ईशा में, हम लड़कों और लड़कियों को बिना किसी भेदभाव के पढ़ा-लिखा रहे हैं, लेकिन अगर मैं एक साइकिल लाऊं, उन्हें एक पाना (स्पैनर) दूं और कहूं कि इस साइकिल के पुर्जे अलग-अलग करके उसे फिर से लगाओ, तो संभव है कि एक लड़का इसे एक लड़की के मुकाबले जल्दी और बेहतर तरीके से करे, लेकिन यह जरूरी नहीं है। अगर मैं उन्हें फूलों का ढेर देकर माला बनाने को कहूं, तो जरूरी तो नहीं मगर अधिक संभावना है कि लड़कियां इसे लड़कों से जल्दी और बेहतर करेंगी।

पुरुष और स्त्रियां भिन्न हैं लेकिन इंसानों के साथ समस्या यह है कि हर भिन्नता को एक भेदभाव की प्रक्रिया में बदल दिया जाता है। हर समाज रंग, लिंग, जाति, वर्ग या ऐसी चीजों के आधार पर अलग-अलग स्तर के भेदभाव बना लेता है।

जब आप दुनिया में काम करते हैं, तो आप निश्चितताओं के साथ काम नहीं करते, आप हमेशा संभावनाओं के साथ काम करते हैं। सभी परंपराएं और संस्कृतियां बड़ी संभावनाओं पर आधारित थीं, निश्चितताओं पर नहीं। इसलिए जब हम कहते हैं, “पुरुषों को यह करने दो, स्त्रियों को वह करने दो,” तो वह निश्चिततता नहीं होती, वह संभावना होती है कि अगर आप इस तरह के काम पुरुषों को देंगे, तो वे बेहतर तरीके से करेंगे और अगर उस तरह के काम स्त्रियों को देंगे, तो वे उसे बेहतर करेंगी। यह एक छोटा सा झुकाव है, कोई संपूर्ण तथ्य नहीं है लेकिन उस छोटे से झुकाव से बहुत फर्क पड़ता है। अगर पृथ्वी अपनी धुरी पर हर समय सीधी घूमती, तो सालों भर एक ही मौसम होता। लेकिन उस जरा से झुकाव की वजह से, कितनी सारी चीजें हो रही हैं! इसलिए जब हम पुरुष और स्त्री कहते हैं, तो हम उस जरा से झुकाव की बात करते हैं, उस झुकाव का लाभ उठाने की बात करते हैं। क्योंकि जीवन निश्चितताओं के साथ नहीं, हमेशा संभावनाओं के साथ काम करता है।

अगर हम आम की एक गुठली देखकर कहते हैं, “यह खूब मीठे फल देगा। इसे लगा देते हैं।” तो यह एक संभावना है, निश्चितता नहीं। आपके भौतिक अस्तित्व में कोई निश्चितता नहीं है। सब कुछ सिर्फ एक संभावना है। अगर आप निपुण हैं, तो संभावना को हकीकत में बदल सकते हैं।

 


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