काशी: कर्मकांडों की नगरी

काशी : कर्म काण्डों की नगरी
काशी : कर्म काण्डों की नगरी

काशी के कर्मकांड प्रसिद्ध हैं। लेकिन क्या आध्यात्मिक विकास के लिए कर्मकांड जरुरी हैं? क्या है आखिर महत्व इन कर्मकांडों का? प्रसून जोशी के कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब दे रहे हैं सद्‌गुरु।

प्रसून : सद्‌गुरु, जब एक इंसान के विकास और मुक्ति के लिए यहां इतनी शक्तिशाली प्रक्रिया मौजूद है, तो काशी में जाकर धार्मिक कर्मकांड करने की क्‍या जरूरत है? आपने मुझे बताया था कि इस जगह को एक खास ढांचे या यंत्र के हिसाब से तैयार किया गया है। इस वजह से तो यहां आपकी सिर्फ उपस्थिति ही काफी होनी चाहिए, फिर भी मैं यहां बहुत से लोगों को कई तरह के कर्मकांड करने के लिए आते देखता हूं। आखिर इन रस्मों का क्या महत्व है?

सद्‌गुरुसद्‌गुरु : काशी रस्मों और कर्मकांडों से भरी पड़ी है। यह हमेशा से ही विधि-विधानों का केंद्र रही है। अपने भीतर कुछ करने से बढ़ कर तो कुछ और है ही नहीं। अगर आप कोई भीतरी प्रक्रिया करते हैं, तो यह सबसे अच्छा तरीका है। जब एक बार आपको एक प्रक्रिया में दीक्षा दी जाती है, तो फिर आपको वही करना चाहिए। यह कर्मकांड जैसी चीजें आम लोगों के लिए बनी थीं। आम लोगों को यह तो पता होता था कि उन्हें अपने साथ कुछ करने की जरूरत है, लेकिन क्या करें और कैसे करें, इसे वे नहीं जानते थे। ऐसी हालत में, इस तरह का एक यंत्र और इसके साथ बनाए गए जटिल कर्मकांड, आम लोगों के लिए बहुत काम के हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में बहुत से लोग एक साथ शामिल हो सकते हैं।

जब वहां लोगों ने यह पूरी प्रक्रिया शुरू की, ठीक वैसे ही जैसे भगवान शिव ने उन सात ऋषियों को सिखाई थी, तो मैंने महसूस किया कि वहां ऊर्जा का ढेर लगता चला गया और वहां असीम उर्जा प्रकट हो गई।
यहां पहले एक सप्तऋषि पूजा होती थी। सप्तऋषि से मतलब है वे सात ऋषि, जो भगवान शिव के सबसे पहले शिष्य थे। जब वे उनका संदेश बाकी दुनिया तक ले जाने को तैयार हुए, तब उन्होंने शिव से पूछा, ‘हम आपकी आराधना किस तरह करें?’ भगवान शिव ने उनको एक विधि बताई। उन्होंने कहा, ‘अगर तुम इसे इस तरह से करोगे, तो मैं वहां खुद आ जाउंगा।’ तो शिव ने उनको वह विधि सिखाई थी, और उसे उन्होंने आगे लोगों को सिखाया और यह प्रक्रिया आज भी उसी परंपरा में चली आ रही है। जब मैं वहां पहली बार गया, तब मैंने महसूस किया कि वहां कुछ खास है। इसलिए मैं अगले दिन भी वहां गया और जाकर बैठा। जब वहां लोगों ने यह पूरी प्रक्रिया शुरू की, ठीक वैसे ही जैसे भगवान शिव ने उन सात ऋषियों को सिखाई थी, तो मैंने महसूस किया कि वहां ऊर्जा का ढेर लगता चला गया और वहां असीम उर्जा प्रकट हो गई। हो सकता है कि दूसरे लोग इसे महसूस न कर पाएं, लेकिन मेरे लिए यह एकदम जीती-जागती सच्चाई है। लोगों को इसका एहसास होने पर उनके आंसू फूट पड़ेंगे। लोग नहीं समझ पाते कि यह सब क्या है। जो इस प्रक्रिया को कर रहे होते हैं, उनको भी पता नहीं होता कि यह सब कैसे हो रहा है। लेकिन चूंकि उनको यह प्रक्रिया सिखाई गई है, इसलिए वे इसे करते जा रहे हैं और इस तरह यह लगातार संपन्न होती चली आ रही है।

आपको ध्यानलिंग में जाकर जरूर बैठना चाहिए। यहां कोई विधि-विधान नहीं होता, कोई मंत्र नहीं पढ़े जाते, न कोई पूजा की जाती है… उसे केवल ध्यान करने के लिए बनाया गया है। 
उस नाव चलाने वाले को देखिए, उसे यह नहीं पता कि इसका इंजन कैसे बनता है, उसने बस इसका इस्तेमाल करना सीखा है, और इससे काम चल रहा है। इसी तरह से लोगों ने भी बस इसका इस्तेमाल करना सीखा है, ठीक वैसे ही जैसे सप्तऋषियों ने किया होगा। जैसे सात ऋषियों ने किया होगा ठीक वैसे ही वहां सात लोगों ने बैठ कर इसे किया, और यह एक महान प्रक्रिया थी। मैंने किसी दूसरे मंदिर में इतना ज्यादा उर्जावान कुछ भी नहीं देखा। मैं बहुत कम मंदिरों में गया हूं। मैं उन्हीं स्थानों पर जाता हूं, जो ऊर्जा केंद्र होते हैं। मैं वहां प्रार्थना करने या कुछ मांगने नहीं जाता। मैंने अपनी जिंदगी में कभी किसी मंदिर में कोई अभिषेक या पूजा नहीं की। लेकिन यह एक अद्भुत विज्ञान है। आपको ध्यानलिंग में जाकर जरूर बैठना चाहिए। यहां कोई विधि-विधान नहीं होता, कोई मंत्र नहीं पढ़े जाते, न कोई पूजा की जाती है, कुछ भी ऐसा नहीं होता। वहां हमेशा पूरी तरह से मौन रहना होता है। उसे केवल ध्यान करने के लिए बनाया गया है। आप बस वहां आएं, बैठें और इसे महसूस करें। जो लोग नहीं जानते कि ध्यान क्या होता है, जो लोग ध्यान की कोई विधि नहीं जानते, आप उन्हें भी बिना किसी निर्देश के ध्यान की अवस्था में ले जा सकते हैं। दरअसल, ये सब एक तरह की तकनीक है, न कि विश्वास या आस्था। तकनीक, जो भूली जा चुकी हैं और काम नहीं कर रही हैं।

प्रसून: मेरा आपसे आखिरी सवाल है कि जब कोई इंसान काशी आए तो यहां पर वह कौन सी चीज है जिसका उसे जरूर अनुभव करना चाहिए?

सद्‌गुरु: सबसे पहली बात तो यह है कि थोड़ी बहुत तैयारी के साथ ही काशी आना चाहिए। मेरी राय में अगर आप काशी आ रहे हैं, तो उससे कम से कम तीन महीने पहले आप किसी सरल ध्यान प्रक्रिया में दीक्षा लें। कुछ समय के लिए रोज ध्यान करें, और खुद को थोड़ा और संवेदनशील बना कर आएं। साथ ही, अपनी सभी धारणाओं को घर छोड़ कर खुले दिमाग से यहां आएं।

स्रोत – काशी द ईटर्नल सीटी (डीविडी)

वाराणसी या काशी शहर का आध्यात्मिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। हर इंसान की इच्छा होती है कि जीवन में कम से कम एक बार वह यहां जरूर आए। ईशा पावन प्रवास आपके लिए ऐसा ही मौका लाया है, जिसमें आप वाराणसी की आध्यात्मिकता को आत्मसात कर सकते हैं:

इस वर्ष की वाराणसी यात्रा 21- 25 नवंबर 2013 के बीच होगी। अधिक जानकारी के लिए – www.sacredwalks.org  फोन – + 91 9488 111 555


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