मिलिए कुछ अनोखे संतों से

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ध्यानलिंग की भीतरी घेरे में कलात्मक रूप से गढ़े हुए कुछ ग्रेनाइट के पैनल लगे हुए हैं, जिन पर आत्म‌-ज्ञान प्राप्त कुछ दक्षिण भारतीय संतों की कहानियों का चित्रों में वर्णन किया गया है। आइए आप भी जानिए इन संतों की अनोखी कथा-

अक्का महादेवी

अक्का महादेवी शिव की भक्त थीं। बचपन से ही उन्होंने खुद को पूरी तरह शिव के प्रति समर्पित कर दिया था और उन्हें अपने पति के रूप में देखती थीं। एक दिन एक राजा की नजर उन पर पड़ी। वह इतनी खूबसूरत थीं कि राजा ने उनसे विवाह कर लिया। लेकिन अपने मन और चेतना में तो वह शिव से विवाह कर चुकी थीं। कुछ सालों की निराशा के बाद, राजा इतना भड़क गया कि वह उन्हें दरबार तक ले आया और उन पर व्याभिचार के आरोप लगाए। महादेवी ने कहा, “अरे मूर्ख इंसान! मैं तुम्हारी पत्‍नी नहीं हूं। तुम एक सामाजिक घटना के कारण मुझे पत्‍नी मानते हो लेकिन ऐसा नहीं है। मेरे पास जो कुछ भी है, उसे मैं पहले ही किसी और को दे चुकी हूं।” राजा ने अपना आपा खो दिया और बोला, “तुम्हारे पास जो भी है, वह मेरा है। गहने, कपड़े, सब कुछ। तो तुम कैसे कह सकती हो कि तुम्हारी ज़िन्दगी किसी और की है!” फिर पूरे दरबार के सामने 18 वर्ष की नवयुवती अक्‍का महादेवी ने अपने सारे कपड़े त्याग दिए और वहां से चली गईं। उस दिन से वह नग्न अवस्था में ही रहीं, उन्होंने सिर्फ कपड़ों का आवरण ही नहीं, बल्कि अहं और लज्जा का, यहां तक कि खुद का आवरण भी उन्होंने त्याग दिया। उन्होंने बहुत उम्दा कविताएं लिखीं, उनकी भक्ति और प्रेम को तीव्र रूपों में अभिव्यक्ति मिली। उनकी भक्ति ऐसी अनोखी थी कि वह हर रोज भिक्षा मांगते हुए शिव से कहतीं-

शिव ऐसा करो कि मुझे भोजन न मिले। आपका हिस्सा बनने के लिए मैं जिस बेकरारी और पीड़ा से गुजर रही हूं, मेरा शरीर भी उसे प्रकट करे। अगर मैं भोजन करूंगी, तो मेरा शरीर तृप्त हो जाएगा और उसे पता भी नहीं चलेगा कि मैं क्या महसूस कर रही हूं। इसलिए ऐसा करो कि मुझे भोजन नसीब न हो। अगर भोजन मेरे हाथों में आ जाए, तो वह मेरे मुंह में जाने से पहले मिट्टी में गिर जाए। अगर वह मिट्टी में गिर जाए, तो इसके पहले कि मेरी जैसी मूर्खा उसे उठाने की कोशिश करे, कोई कुत्ता आकर उसे ले जाए।

यह उनकी हर रोज़ की प्रार्थना थी।

पूसलार

पूसलार एक संत थे जो दक्षिण भारत के एक शहर में रहते थे। उस इलाके का राजा एक विशाल शिव मंदिर बनवा रहा था। बहुत सालों के बाद मंदिर का निर्माण कार्य पूरा होने वाला था। वह मंदिर जो राजा के जीवन के सपना था, उसके उद्घाटन समारोह से एक रात पहले राजा के सपने में शिव आए और कहा, “मैं तुम्हारे मंदिर के उद्घाटन में नहीं आ पाऊंगा। क्योंकि पूसलार ने इसी शहर में दूसरा मंदिर बनवाया है। मुझे वहां जाना है। उसके मंदिर का भी उद्घाटन कल ही है।”

राजा एक भय के साथ जागा क्योंकि इतने सालों तक यह मंदिर बनाने के लिए मेहनत करने के बाद, इतना पैसा और श्रम लगने के बाद, शिव कह रहे हैं कि उन्हें इसी शहर में पूसलार के बनवाए हुए किसी दूसरे मंदिर में जाना है। “कौन है यह पूसलार और यह कौन सा मंदिर है, जिसके बारे में मैं नहीं जानता?” वह पूसलार की तलाश में लग गया।

बहुत दिनों की तलाश के बाद, उन्हें एक छोटी सी झोंपड़ी में पूसलार मिले, जो पेशे से मोची थे। उन दिनों मोची के पेशे को हिकारत की नजर से देखा जाता था। राजा ने जाकर उनसे पूछा, “तुम्हारा मंदिर कहां है? शिव का कहना है कि वह तुम्हारे मंदिर में जाएंगे, मेरे मंदिर में नहीं। कहां है मंदिर?” पूसलार बोले, “मैंने उसे अपने मन में बनाया है।”

उन्होंने एक-एक ईंट, एक-एक पत्थर करके धीरे-धीरे कई सालों तक अपने मन में वह मंदिर बनाया था और ऐसा मंदिर पत्थरों और ईंटों से बने मंदिर से कहीं अधिक असली होता है।

सदाशिव ब्रह्मेंद्र

दक्षिण भारत में सदाशिव ब्रह्मेंद्र नाम के एक योगी थे। वह निर्काया थे, यानी उन्हें शरीर की कोई सुध नहीं थी। जिस व्यक्ति को शरीर की सुध नहीं होती, उसे कपड़े पहनने का ध्यान भी नहीं आता। इसलिए वह नग्‍न ही घूमते थे। उन्हें किसी तरह की सीमा और संपत्ति का भी होश नहीं था। एक दिन वह कावेरी नदी के तट पर स्थित राजा के उद्यान में पहुंच गए। राजा अपनी रानियों के साथ आराम कर रहा था। तभी उसने सदाशिव ब्रह्मेंद्र को उद्यान में स्त्रियों के सामने नग्‍न चलते देखा। सदाशिव ब्रह्मेंद्र के लिए पुरुष या स्त्री का कोई भेद नहीं था। राजा क्रोधित हो गया। “कौन है यह मूर्ख जो मेरी रानियों के सामने नग्न हो कर आ गया है।” उसने अपने सैनिकों को बुलाकर आदेश दिया, “पता लगाओ कि यह मूर्ख कौन है?” सिपाही उसके पीछे दौड़े और योगी को पुकारा। उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और बस चलते रहे। सिपाहियों ने क्रोधित होकर अपनी तलवार निकाल ली और उन पर वार किया। उनका दाहिना हाथ कट गया। लेकिन उनकी चाल नहीं थमी। वह चलते रहे। यह देखकर सैनिक डर गए। उन्हें लगा कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। अपना हाथ कटने के बाद भी वह चल रहा है! राजा और सिपाही उनके पीछे दौड़े, उनके पैरों पर गिर पड़े और उन्हें वापस उद्यान में ले कर आए। उन्होंने अपना बाकी जीवन उसी उद्यान में बिताया और वहीं पर शरीर त्यागा।

संपादक की टिप्पणी

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