मिलिए कुछ अनोखे संतों से- 2

Inner Parikrima

इस पोस्ट के पहले हिस्से मेंध्यानलिंग की आंतरिक परिक्रमा में लगे पत्थरों के पैनल पर दर्शाए गए तीन संतों की कहानियां आपने पढ़ी थी। अब बाकी दो पैनल्स में दर्शाई गई कहानियां आपके लिए पेश है-

मेइपोरुल नयनार

 

मेइपोरुल नयनार दक्षिण भारत के एक समृद्ध राज्य के राजा थे। पड़ोसी राज्य का राजा मुथानाथन, मेइपोरुल से जलता था और उसने उनके राज्य को जीतने की कोशिश की। लेकिन वह विफल रहा और उसने लड़ाई में अपने बहुत से सैनिक खो दिए। फिर उसने ठान लिया कि अगर मेइपोरुल नयनार को लड़ाई में नहीं मारा जा सकता, तो उसे छल से मारना होगा।

मुथानाथन ने एक शिव भक्त का चोला पहना और मेइपोरुल के महल पहुंचा। अपने माथे और बाहों पर भभूत लगाए मुथानाथन ने खुद को एक शैव संत बताया। उसने कहा कि वह मेइपोरुल नयनार को शिक्षा देने आया है। मेइपोरुल खुद शिव भक्‍त थे, इसलिए उन्होंने यह नियम बनाया था कि किसी शिव भक्‍त को उनसे मिलने से न रोका जाए। उत्तम भोजन और कपड़ों से मुथानाथन का स्वागत करते हुए, रक्षक उसे मेइपोरुल के निजी कमरे में ले गया, जहां मेइपोरुल अपनी पत्‍नी के साथ बैठे हुए थे। संत बने मुथानाथन ने मेइपोरुल की पत्‍नी से कहा कि वह एकांत में यह शिक्षा देना चाहता है। मेइपोरुल और मुथानाथन को अकेले छोड़कर वो कमरे से बाहर चली गईं।

जैसे ही मेइपोरुल हाथ जोड़े हुए मुथानाथन के करीब आए, भेषधारी नकली संत ने तेजी से अपना खंजर निकाला और उनकी पीठ में भोंक दिया। गहरे जख्म के साथ खून में लथपथ मेइपोरुल पीड़ा से कराह रहे थे। उनके कराहने की आवाज सुन कर रक्षक दौड़ते हुए अंदर आया। इस दृश्य को देखकर वह भौंचक्‍का रह गया। उसने मुथानाथन को मारने के लिए हथियार निकाला। लेकिन मुथानाथन के माथे और बाहों पर भभूत देख कर मेइपोरुल ने रक्षक को यह कहते हुए रोक दिया, “इस आदमी ने पवित्र भस्म लगाई हुई है। यह शिव का आदमी है। इसे कोई नुकसान मत पहुंचाओ। इसे देश की सीमा से बाहर ले कर जाओ और अपने घर वापस जाने को कहो।” रक्षक गुस्से से जल रहा था लेकिन वह अपने स्वामी की बात नहीं ठुकरा सकता था। कहा जाता है कि मेइपोरुल की भक्ति से प्रसन्‍न होकर शिव ने खुद उनके अंतिम समय में आकर दर्शन और आशीर्वाद दिया।

कन्नप्पा नयनार

 

एक मशहूर धनुर्धर थिम्मन एक दिन शिकार के लिए गए। जंगल में उन्हें एक मंदिर मिला, जिसमें एक शिवलिंग था। थिम्मन के मन में शिव के लिए एक गहरा प्रेम भर गया और उन्होंने वहां कुछ अर्पण करना चाहा। लेकिन उन्हें समझ नहीं आया कि कैसे और किस विधि ये काम करें। उन्होंने भोलेपन में अपने पास मौजूद मांस लिंग पर अर्पित कर दिया और खुश होकर चले गए कि शिव ने उनका चढ़ावा स्वीकार कर लिया।

उस मंदिर की देखभाल एक ब्राह्मण करता था जो उस मंदिर से कहीं दूर रहता था। हालांकि वह शिव का भक्‍त था लेकिन वह रोजाना इतनी दूर मंदिर तक नहीं आ सकता था इसलिए वह सिर्फ पंद्रह दिनों में एक बार आता था। अगले दिन जब ब्राह्मण वहां पहुंचा, तो लिंग के बगल में मांस पड़ा देखकर वह भौंचक्‍का रह गया। यह सोचते हुए कि यह किसी जानवर का काम होगा, उसने मंदिर की सफाई कर दी, अपनी पूजा की और चला गया। अगले दिन, थिम्मन और मांस अर्पण करने के लिए लाए। उन्हें किसी पूजा पाठ की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बैठकर शिव से अपने दिल की बात करने लगे। वह मांस चढ़ाने के लिए रोज आने लगे। एक दिन उन्हें लगा कि लिंग की सफाई जरूरी है लेकिन उनके पास पानी लाने के लिए कोई बरतन नहीं था। इसलिए वह झरने तक गए और अपने मुंह में पानी भर कर लाए और वही पानी लिंग पर डाल दिया।

जब ब्राह्मण वापस मंदिर आया तो मंदिर में मांस और लिंग पर थूक देखकर घृणा से भर गया। वह जानता था कि ऐसा कोई जानवर नहीं कर सकता। यह कोई इंसान ही कर सकता था। उसने मंदिर साफ किया, लिंग को शुद्ध करने के लिए मंत्र पढ़े। फिर पूजा पाठ करके चला गया। लेकिन हर बार आने पर उसे लिंग उसी अशुद्ध अवस्था में मिलता। एक दिन उसने आंसुओं से भरकर शिव से पूछा, “हे देवों के देव, आप अपना इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।” शिव ने जवाब दिया, “जिसे तुम अपमान मानते हो, वह एक दूसरे भक्त का अर्पण है। मैं उसकी भक्ति से बंधा हुआ हूं और वह जो भी अर्पित करता है, उसे स्वीकार करता हूं। अगर तुम उसकी भक्ति की गहराई देखना चाहते हो, तो पास में कहीं जा कर छिप जाओ और देखो। वह आने ही वाला है।”

ब्राह्मण एक झाड़ी के पीछे छिप गया। थिम्मन मांस और पानी के साथ आया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शिव हमेशा की तरह उसका चढ़ावा स्वीकार नहीं कर रहे। वह सोचने लगा कि उसने कौन सा पाप कर दिया है। उसने लिंग को करीब से देखा तो पाया कि लिंग की दाहिनी आंख से कुछ रिस रहा है। उसने उस आंख में जड़ी-बूटी लगाई ताकि वह ठीक हो सके लेकिन उससे और रक्‍त आने लगा। आखिरकार, उसने अपनी आंख देने का फैसला किया। उसने अपना एक चाकू निकाला, अपनी दाहिनी आंख निकाली और उसे लिंग पर रख दिया। रक्‍त टपकना बंद हो गया और थिम्मन ने राहत की सांस ली। लेकिन तभी उसका ध्यान गया कि लिंग की बाईं आंख से भी रक्‍त निकल रहा है। उसने तत्काल अपनी दूसरी आंख निकालने के लिए चाकू निकाल लिया, लेकिन फिर उसे लगा कि वह देख नहीं पाएगा कि उस आंख को कहां रखना है। तो उसने लिंग पर अपना पैर रखा और अपनी आंख निकाल ली। उसकी अपार भक्ति को देखते हुए, शिव ने थिम्मन को दर्शन दिए। उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई और वह शिव के आगे दंडवत हो गया। उसे कन्नप्पा नयनार के नाम से जाना गया। कन्ना यानी आंखें अर्पित करने वाला नयनार यानी शिव भक्त।

संपादक की टिप्पणी

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    nice posts…