उड़ना है तो बोझ कम कीजिए

उड़ना है तो बोझ कम कीजिए
उड़ना है तो बोझ कम कीजिए

सद्‌गुरुहम अगर उड़ना चाहते हैं तो बोझ कम करना ही होगा। आखिर यह बोझ कैसा बोझ है जो हमें उड़ने से रोक रहा है – आज के स्पॉट में सद्‌गुरु यही बता रहे हैं। 

जैसे ही हम ‘आध्यात्मिक’ शब्द बोलते हैं, लोग डिटैचमेंट यानी अनासक्ति की बात करने लगते हैं। जैसे ही आप किसी भी तरह के संबंध रखने की बात करते हैं, लोग उसे एटैचमेंट या लगाव से जोड़ने लगते हैं। ‘आप लोगों का लगाव मुझसे नहीं है, यही तो समस्या है।’ आखिर यह अटैचमेंट और डिटैचमेंट है क्या? जन्म अटैचमेंट के साथ होता है। अपनी मां के शरीर से अटैचमेंट के बिना आपका जन्म ही नहीं होता। मृत्यु भी एक तरह का अटैचमेंट ही है, लेकिन यह कहीं ज्यादा इनक्लूसिव है, इसमें आप इस धरती के साथ एक हो जाते हैं। लेकिन चूंकि यह एक बिना भेदभाव भरा लगाव है, इसलिए इसका कोई नकारात्मक असर नहीं होता।

अपने शरीर व मन को अलग और खास समझने से अटैचमेंट पैदा होता है। चूंकि आपको लगता है कि आपके शरीर व मन एक्सक्लूसिव हैं, इसलिए आप जाल में फंस जाते हैं। यहां तक कि कई बार तो आपको मरने के समय तक अहसास नहीं हो पाता कि आपने अपने लिए एक कैदखाना तैयार कर रखा था, जहां कोई भीतर जा ही नहीं सकता था। चूंकि आप फंस चुके होते हैं, इसलिए आप उस पिंजरे के सीखचों से अपने हाथ निकाल कर किसी को थामना चाहते हैं, ताकि आपके भीतर किसी से जुड़ाव का अहसास बना रहे। आप उस बदकिस्मत इंसान को पकड़ लेते हैं, जो आपके पास से होकर गुजरा, और फिर आपने उसे जाने नहीं दिया। इसे ही प्रेम संबंध कहते हैं। और फिर आप इस एक इंसान के साथ गहराई से जुड़ जाते ह, क्योंकि आपने खुद को बाकी पूरी दुनिया से काट रखा है। दूसरी ओर आमतौर पर उस इंसान की स्थिति भी आपसे कोई बेहतर नहीं होती, इसलिए वह भी आपके साथ गहराई से अटैच्ड हो जाता है।

मृत्यु भी एक तरह का अटैचमेंट ही है, लेकिन यह कहीं ज्यादा इनक्लूसिव है, इसमें आप इस धरती के साथ एक हो जाते हैं। लेकिन चूंकि यह एक बिना भेदभाव भरा लगाव है, इसलिए इसका कोई नकारात्मक असर नहीं होता।

इस तरह से आप दोनों ही एक दूसरे के लिए बेइंतहा अत्याचार का कारण बनते हैं। लेकिन आप फिर भी जुड़े रहते हैं, क्योंकि अगर आपने उसे जाने दिया तो अपने पिंजरे में आप फिर से अकेले रह जाएंगे। सवा सात अरब लोगों के होते हुए सिर्फ एक इंसान के न होने से आप खुद को भयानक तरीके से अकेला महसूस करने लगते हैं। किसी से जुड़ाव की जरूरत की वजह यह गलतफहमी है कि आप अपने आप में स्वतंत्र अस्तित्व हैं। आपकी हर सांस इस बात का स्पष्ट प्रमाण कि आप अपने आप में एक स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हैं। आप इस संपूर्ण अस्तित्व के साथ लगातार लेन-देन में हैं।

जरूरी नहीं कि आपका अटैचमेंट किसी दूसरे इंसान को लेकर ही हो। आप सबसे ज्यादा अटैच्ड तो अपने शरीर और अपनी विचारों व भावनाओं से होते हैं। आपके विचार आपके लिए सबसे अधिक महत्व रखते हैं। आपको लगता है कि इस ब्रम्हांड को भी वैसा ही होना चाहिए, जैसा आप सोचते हैं। अगर यह ब्रम्हांड आपकी सोच के अनुसार नहीं चलता तो आपको यह कभी अहसास नहीं होता कि आपके सोच में भी कोई गलती हो सकती है, आपको लगता है कि जरूर इस ब्रम्हांड में ही कोई न कोई गलती होगी।

अटैचमेंट के पीछे एक वजह यह भी होता है कि आप खुद को बहुत सीरियसली लेते हैं। अगर आप अपनी इस अटैचमेंट को टुकड़े – टुकड़े करके खत्म कर देते हैं तो आपके लिए जीवन भर एक आध्यात्मिक तमाशा चलता रहेगा। हो सकता है कि आप अपनी अटैचमेंट से छुटकारा पाने के लिए मुस्कुराना बंद कर देते हों। आपका अटैचमेंट एक ऐसी चीज है, जिसे आपने अपने मन में तैयार किया है। अगर आप इसे बनाना बंद कर देंगे तो यह फिर रहेगा ही नहीं। दरअसल खुद को बहुत अधिक महत्व देने का साइड इफेक्ट है अटैचमेंट। अगर आप साइड इफेक्ट्स नहीं चाहते हैं, तो आपको गोली निगलिए ही नहीं चाहिए। जब तक आप खुद को महत्व देना बंद करते, तब तक आपको आध्यात्मिक प्रक्रिया कहीं नहीं पहुंचा सकती।

सवा सात अरब लोगों के होते हुए सिर्फ एक इंसान के न होने से आप खुद को भयानक तरीके से अकेला महसूस करने लगते हैं। किसी से जुड़ाव की जरूरत की वजह यह गलतफहमी है कि आप अपने आप में स्वतंत्र अस्तित्व हैं।

ज्यादातर लोग अपने होश में तब आते हैं, जब जिंदगी कहीं न कहीं उन्हें ठोकर मारती है। कितने दुख की बात है। क्या होना यह नहीं चाहिए कि जो आपके लिए सबसे बेहतर है, वही आपकी प्राथमिकता हो? यह चीज आपके जीवन में किसी विनाश, त्रासदी या बीमारी के चलते नहीं होनी चाहिए। जब सारी चीजें अच्छी चल रही हों तो यही समय अपने जीवन की परम संभावनाओं को देखने का होता है। उस समय का इंतजार मत कीजिए कि जीवन आपको ऐसे ठोकर मारे, जहां से आपका उबरना भी संभव न हो। एक बार जब आप इस दुनिया की अपेक्षा अपने मन में खुद को इतना महत्वपूर्ण बना लेते हैं, तो फिर आप निहित स्वार्थ में उलझ जाते हैं। उससे पसंद व नापसंद का जन्म होता है। जैसे-जैसे आपकी अज्ञानता बढ़ती है, यह चीज प्रेम व नफरत में बदलती जाती है, आसक्ति व विरक्ति में बदलती जाती है। ये सब खुद को महत्व देने के लक्षण हैं। आप जो कुछ भी हैं, उसे लेकर अपने बारे में बढ़ा-चढ़ाकर गलतफहमी पालने से आप जीवन भर कई तरीकों से परेशान होते रहेंगे। सबसे बड़ी बात, जब मृत्यु का पल नजदीक आएगा तो यह सबसे पीड़ाजनक विदाई होगी।

इस विशालकाय ब्रम्हांड में आप दूसरे और प्राणियों की तरह एक और प्राणी भर हैं। अगर आपको यह बात समझ में नहीं आती तो आप किसी पहाड़ पर जाकर खड़े हो जाइए या हवाई जहाज में उड़कर नीचे चलने वाले लोगों को देखिए। आपको वहां से वे नन्हे जीव दिखाई देंगे, लेकिन इन नन्हे से जीवों मेंं खुद को लेकर कितनी गलतफहमी भरी हुई है! कहने को आप भी एक और नन्हे जीव हैं, लेकिन आप कितनी सारी खूबियों, कितने तरह की क्षमताओं से भरे हैं। अगर आप इस सच्चाई के प्रति सचेत हो जाएंगे तो आप स्वाभाविक तौर अपनी सबसे बड़ी संभावना की तरफ बढ़ेंगे। लेकिन जब तक आपके भीतर अपने को खास समझने का झूठा भाव भरा है, तब तक आपको ठोकर की जरूरत होगी। अब आप कहेंगे, ‘नहीं, सद्गुरु मैं तो अच्छा इंसान हूं।’ मैं जानता हूं आपमें से कई लोग बहुत अच्छे हैं और यही सबसे बड़ी समस्या है।

इस विशालकाय ब्रम्हांड में आप दूसरे और प्राणियों की तरह एक और प्राणी भर हैं। अगर आपको यह बात समझ में नहीं आती तो आप किसी पहाड़ पर जाकर खड़े हो जाइए या हवाई जहाज में उड़कर नीचे चलने वाले लोगों को देखिए।

एक बार की बात है कि न्यू यॉर्क की एक सड़क पर एक महिला चली जा रही थी। तभी एक नौजवाब उसके पास से गुजरा, जो उसका पर्स छीन कर भाग गया। तभी एक दूसरे नौजवान ने उस भागने वाले का पीछा किया और कुछ मिनटों बाद वह वापस लौटा तो उसके हाथ में महिला का पर्स था। उसने महिला को उसका पर्स वापस कर दिया। आभार से भरी उस महिला ने पर्स खोला और उसके भीतर झांका। पर्स में एक पचास डॉलर, दो बीस-बीस डॉलर और एक दस डॉलर का नोट था। उसने तहे दिल का उसका शुक्रिया अदा किया और बोली, ‘लेकिन मेरे पर्स में तो सौ डॉलर का एक नोट था। अब इसमें पचास, बीस-बीस और दस के नोट कैसे हैं? ऐसा कैसे हुआ?’ नौजवान ने जवाब दिया, ‘पिछली बार जब मैंने एक महिला को पर्स वापस किया था तो उसके पास छुट्टे नहीं थे।’

हम जानते हं कि आपको कैसे पकड़ा जाए। बात यहां आपकी अच्छाई की नहीं है। बात यहां आपकी उस जिदंगी की है, जैसी उसे होनी चाहिए। जो चीज इतनी सहज व स्वाभाविक होनी चाहिए, वह इतने बेतुके तरीके से मुश्किल कैसे हो गई? ज्यादातर लोगों को यह समाज ही बनाता है। हम लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए, अपनी सुविधा के लिए व कुछ चीजों को पाने के लिए परिवार का निर्माण करते हैं, समाज व देश बनाते हैं। लेकिन इसमें होता यह है कि इस सृष्टि के स्रोत द्वारा आपका निर्माण होने की बजाय समाज आपका निर्माण करने लगता है। यह समाज सभी तरह के लोगों से मिलकर बना है। जिनमें ज्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं होता कि वे अपनी जिंदगी के साथ क्या कर रहे हैं।

इंसान में एक अंतर्निहित समझदारी होती है, जो उसे स्वाभाविक तौर पर हमारी परम प्रकृति की ओर ले जाती है। लोगों को लगता है कि कुछ लोग आध्यात्मिक हैं और बाकी दूसरे लोग आध्यात्मिक नहीं हैं। आध्यात्मिक होने का मतलब है कि चेतन रूप से अपनी परिपूर्णता की ओर आगे बढ़ना। अब इन तथाकथित ‘दूसरे लोगों’ पर नजर डालते हैं। अगर कोई पैसा, दौलत, आनंद, प्रेम, ज्ञान, मादक पदार्थ, शराब को चाहता है तो एक तरह से वे लोग भी खुद को पूरा करने की कोशिश में होते हैं। उन्हें लगता है कि ये चीजें उन्हें पूर्णता देंगी। यहां आध्यात्मिकता अपने रास्ते से भटकी हुई है। जब आप रास्ते से भटक जाते हैं फिर आपके मंजिल पर पहुंचने की संभावना बेहद क्षीण हो जाती है। अगर आप सफल होना चाहते हैं तो आपको सचेतन रूप से सही दिशा में आगे बढ़ना होगा।

आप जो एक्स्ट्रा बोझ़ लेकर चल रहे हैं, वह आपको अपनी पूरी ताकत से उड़ने की इजाजत नहीं दता। आपकी पीठ पर जो बोझ हैवो आपके अपने अभिमान का, अपने अहंकार का और अपने महत्व के भाव का है।
यह कोई नैतिकता का सवाल नहीं है। यह सवाल आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अगर आप अपनी समझ नहीं लगाते हैं तो आप जीवन की प्रकृति के विरोधी हैं। बुनियादी रूप से आपकी जिंदगी खुद को पूरा करने के लिए है। आप जीवन में जो कुछ भी करते हैं, चाहे आप शादी करते हैं, ब्रह्मचर्य लेते हैं या फिर कुछ और भी करते हैं, वो सिर्फ इसलिए क्योंकि आपको लगता है कि वो करना आपको जीवन में कहीं न कहीं पूर्णता दे रहा है। लेकिन अगर आप गोल गोल ही घूमते रहे तो जब आपको रास्ता मिलेगा, तब तक वक्त निकल चुका होगा। भारत में समय को हमेशा काल के रूप में दिखाया जाता है। यह एक कठोर सच्चाई है कि समय हम सब के लिए भाग रहा है। जब वक्त भाग रहा हो तो हमें जहां पहुंचना है, वहां जल्दी से जल्दी पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। भटकाव सिर्फ हमारे मन में होता है। जीवन आपको कभी खुद से दूर नहीं ले जा सकता।

अधिकांश लोगों को इसका अहसास नहीं होता कि जो कुछ भी उनके मन में चल रहा है, वह हकीकत नहीं है। उनके लिए सिर्फ उनके मन में चलने वाली चीजें ही नहीं, बल्कि उनके मोबाइल में चलने वाली चीजें भी हकीकत होती हैं। समस्या यह है कि आपके विचार आपसे बड़े हो गए हैं और वह हर चीज को डोमिनेट कर रहे हैं। कुछ साल पहले अमेरिका में शहद का उत्पादन अचानक गिर गया। इसका कारण जब पता किया गया तो पता लगा कि मुख्य कारण मधुमक्खियों की पीठ पर पराजीवीयों का बैठना था। इस बेहद छोटे से जीव के एक्स्ट्रा वजन के चलते मधुमक्खियां ज्यादा दूर तक नहीं जा पाती थीं और ज्यादा शहद नहीं इकठ्ठा कर पाती थीं, जिससे उनके छत्ते सूख गए और और शहद का उत्पादन गिर गया।

यही चीज इंसानों पर भी लागू होती है। आप जो एक्स्ट्रा बोझ़ लेकर चल रहे हैं, वह आपको अपनी पूरी ताकत से उड़ने की इजाजत नहीं दता। आपकी पीठ पर जो बोझ है- वो आपके अपने अभिमान का, अपने अहंकार का और अपने महत्व के भाव का है। ये तीनों चीजें बेहद भारी बोझ हैं, जो आपको लंबी दूरी की उड़ान नहीं भरने दे रहे हैं। फिर भी अगर आप पूरी दूरी की उड़ान भरना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे पहले आवश्यक ऊर्जा की जरूरत पड़ेगी। अगर आपके पास यह आवश्यक ऊर्जा नहीं होगी और उसके ऊपर से आपके पीठ पर इन सारी चीजों को बोझ होगा तो आप ज्यादा दूर तक नहीं जा पाएंगे।

अगर आप अपना, अभिमान, अपना अहंकार व खुद के महत्व का बोझ उतार कर नीचे रख देंगे तो आपको कृपा हासिल हो जाएगी।
आपमें जो लोग दक्षिण भारत में रहते हैं या रहे हैं, उन्होंने कुछ हरे व भूरे से ड्रैगनफ्लाई को देखा होगा। हर साल यह छोटे ये पंतगे अफ्रीका तक की यात्रा तय करते हैं, वहां प्रजजन करते हैं और फिर उनकी अगली पीढ़ी मॉनसूनी हवाओं पर सवार होकर भारत वापस लौटती है। वे लोग हिंद महासागर को सिर्फ अपने पंखों के भरोसे ही नहीं पार करते, बल्कि हवाओं के साथ उड़कर पार करते हैं। ये पतंगे अपनी यात्रा हवाओं की कृपा के भरोसे तय करते हैं। अगर आप अपने जीवन में एक दूरी तय करना चाहते हैं तो आपको कृपा की जरूरत होगी। कृपा हमेशा उपलब्ध होती है। सवाल यह है कि आप कैसे उसके प्रति खुद को ग्रहणशील बनाते हैं? अगर आप चाहते हैं कि आध्यात्मिक प्रक्रिया हो तो आपको अपनी पीठ पर से उन बोझ रूपी उन सूक्ष्म परजीवियों से छुटकारा पाना होगा।

अगर आप अपना, अभिमान, अपना अहंकार व खुद के महत्व का बोझ उतार कर नीचे रख देंगे तो आपको कृपा हासिल हो जाएगी। जब भी आप मेरे जैसे किसी गुरु के साथ बैठें तो सबसे पहले आपको पता होना चाहिए कि आपको चाहिए क्या। एक बार ऐसा हुआ हुआ कि एक अपराधी अदालत में किसी जज से अपील की, ‘महोदय, अग आप मुझे कुछ समय दे दें तो मैं साबित कर दूंगा कि मैं निर्दोष हूं।’ जज ने उसकी ओर देखा और कहा, ‘ठीक है, अगले दस साल तुम्हें दिए।’ ऐसे में अपराधी को अपने लिए समय मिल गया, जो पूरी तरह से उसका अपना था।

अगर आप सांत्वना चाहते हैं तो आपको जिसमें भी यकीन हो, उसकी पूजा करने से आपको मदद मिलेगी। अगर आपको एक समाधान की तलाश है तो आत्म विर्सजन ही एकमात्र समाधान है। फिलहाल यह मॉनसून का समय है। मॉनसून के बादल हर उस जगह जाते हैं, जहां हवा जाती है। जब वे खुद को बहा देते हैं तो बारिश होती है। जब बारिश होगी तो तब मोर नाचने लगेंगे, फूल खिल उठेंगे, फसलें बढ़ने लगेंगी, लोग खाना खाएंगे। तब यह जीवन खूबसूरत हो उठता है, क्योंकि बादल ने खुद का विर्सजन किया और बरस गए। इसी तरह मॉनसून के मौसम में आपको भी खुद को विसर्जित करना सीखना चाहिए। हवा का वहीं झोका हरेक के लिए बह रहा है। अब आप इसमें से कितना ग्रहण कर पाते हैं, यह आप पर निर्भर है।

 


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