टेनीसी की पहाड़ी रास्तों पर साइक्लिंग

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सद्‌गुरु ने टेनीसी के जंगली और पहाड़ी रास्तों पर साइकिल चला कर अपनी स्फूर्ति को आजमाया। आज के स्पॉट में सद्‌गुरु साइक्लिंग के अपने अनुभवों के साथ इसके लाभ भी बता रहे हैं-

पिछले दो हफ्तों के सफर और कामकाज की चहल-पहल के बाद यहां टेनीसी के आइआइआइ में थोड़ी शांति और सुकून है।

चेन्नई मेगा प्रोग्राम के धमाके और सिंगापुर की धूम के बाद इन दो हफ्तों के लिए टेनीसी की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच आइआइआइ में रहने से थके हुए बदन को ताजगी और मन को बड़ा सुकून मिला है। खुशकिस्मती से मेरी आत्मा कभी नहीं थकती, मेरा जोश और उत्साह कभी ढीला नहीं पड़ता।

यहां की पहाड़ी चढ़ाइयों पर पेडल दबाते हुए साइकिल को ऊपर चढ़ाते वक्त सांस यों फूलती है मानो फेफड़े मुंह में आ गए हों। मैंने दक्षिण भारत में दूर-दूर तक साइकिल चलाई है। 17 बरस की उम्र में तो एक बार मैंने लगभग तय ही कर लिया था कि मॉस्को तक साइकिल चलाते हुए जाऊंगा; लेकिन. . .

हाल के दिनों में कई मुश्किल हालात सामने आए, पर अपने आसपास के लोगों और साथियों की जबरदस्त निष्ठा और प्रेम के कारण हम इन हालात से पार हो पाए हैं। मुश्किल हालात में ही लोग यह दिखा पाते हैं कि वे कौन हैं। उनकी ताकत, हिम्मत, मकसद का जज्बा और इन सबसे बढ़ कर उनका प्रेम ऐसे रूपों में सामने आता है, जो सामान्य रोजमर्रा की आरामदेह जिंदगी में संभव नहीं हो पाता।

कल से आइआइआइ में पहला ‘इनर वे’ प्रोग्राम शुरू होने जा रहा है। ईशा, यूएसए अगले साल बहुत कुछ करने की तैयारी में जुटा है। अगले हफ्ते के आखिरी दो दिन हम सेन फ्रांसिस्को में ‘इनर इंजिनियरिंग’ का एक प्रोग्राम करने जा रहे हैं। यूएस के स्वयंसेवक भारत वाले प्रोग्राम की बराबरी करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए बिलकुल एक अलग अंदाज में काम करने की जरूरत होगी। चुनौती के साथ-साथ यह एक खुशी का मौका होगा कि हम सब नई परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढाल कर यूं काम करेंगे जैसा हमने पहले कभी नहीं किया।

यहां आइआइआइ में यह एक 1300 एकड़ की जगह है, जिस पर पहाड़ियों और जंगलों के बीच ढेर सारी पगडंडियां हैं, जिनमें बड़े दिनों बाद मुझे साइकिल चलाने का मौका मिला है। एक हिंदुस्तानी ने मुझे यहां एक पहाड़ी साइकिल भेंट की है। यहां की पहाड़ी चढ़ाइयों पर पेडल दबाते हुए साइकिल को ऊपर चढ़ाते वक्त सांस यों फूलती है मानो फेफड़े मुंह में आ गए हों। मैंने दक्षिण भारत में दूर-दूर तक साइकिल चलाई है। 17 बरस की उम्र में तो एक बार मैंने लगभग तय ही कर लिया था कि मॉस्को तक साइकिल चलाते हुए जाऊंगा; लेकिन मेरी सुरक्षा को ले कर चिंतित माता-पिता ने इस ख्वाब को पूरा नहीं होने दिया। यहां मैं फिर एक बार साइकिल पर सवार हूं और महसूस कर रहा हूं कि उम्र ढलने का सचमुच क्या मतलब होता है। हाल ही में कैलास ट्रेक के वक्त भी मेरी असली परीक्षा हो गई थी, पर साइकिल आपमें बिलकुल अलग तरह का खींचाव पैदा करता है। किसी कार से मरने के लिए उसके नीचे आना जरूरी नहीं है। गाड़ी चलाने और बिना मेहनत किए हर जगह घूमने से न सिर्फ हमारे अंदर की स्फूर्ति और ओज सूखता जा रहा है। इतना ही नहीं इससे हमारी पृथ्वी का भी बड़ा नुकसान हो रहा है। मजबूती और ताकत के साथ जीना क्या होता है यह जानने के लिए साइकिल पर सवारी कीजिए और पहाड़ियों पर ट्रेकिंग कीजिए। हो सकता है, तिब्बत में एक साइक्लिंग अभियान किया जाए। आप तैयार हैं?

प्रेम व प्रसाद,

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  • Vinod

    आप तो बस ऐसा जोश भर देते हो की सीधा साइकिल की दूकान पे ही बाँदा दिखेगा, सपना तो कैलास का है पर सुना है वहां साइकिल नहीं जा सकती तो पैदल ही सही