सूर्य क्रिया: जीने की एक शक्तिशाली प्रक्रिया

सूर्य क्रिया
सूर्य क्रिया

इस हफ्ते के स्पाट में सद्‌गुरु, हठयोग टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम के सहभागियों के साथ हुए सत्संग के दौरान सूर्य-क्रिया दीक्षा और उसके फायदों के बारे में उठे एक सवाल का जवाब दे रहे हैं।

प्रश्न : सद्‌गुरु, सूर्य‌-क्रिया में दीक्षा लेने का क्या महत्व है और इससे हमारे सिस्टम में किस तरह के बदलाव आते हैं?

सद्‌गुरु– योग का मकसद यही है कि शरीर एक बाधा न रहे, संभावना बन जाए। ऐसा होने के लिए जरूरी है कि आपके सिस्टम में हर चीज कम-से-कम विरोध, कम-से-कम घर्षण के साथ काम करे। मेकैनिकल साइंस की हमारी समझ के हिसाब से भी हम किसी मशीन को तभी सचमुच बढ़िया और कार्यकुशल मानते हैं, जब इसमें कम-से-कम घर्षण हो। जिसमें घर्षण जितना ज्यादा होगा, उसकी कार्यकुशलता उतनी ही कम होगी। जिसमें बिल्कुल घर्षण नहीं होगा, वह आदर्श और सर्वश्रेष्ठ मशीन होगी। अगर आप घर्षण कम कर दें, तो मशीन की टूट-फूट बिलकुल कम हो जाएगी। इसी तरह अगर इस शरीर की टूट-फूट को बिल्कुल कम करना है, तो सबसे पहले हमें यह तय करना होगा कि हमारे अपने ही अलग-अलग पहलुओं में आपस में कोई घर्षण न हो।

आपका एक शारीरिक पहलू है, जो इकट्ठा किया हुआ भंडार है। आपका एक मनोवैज्ञानिक पहलू है; यह भी ज्यादातर इकट्ठा किया हुआ ही है। शारीरिक पहलू तो इसी जीवन  की इकट्ठा की गई जमा-पूंजी है, जबकि मनोवैज्ञानिक पहलू आपके कई जन्मों का संग्रह है। एक है कार्मिक पहलू, जो इन दोनों से काफी बड़ा संचय है और काफी जटिल भी है। एक और पहलू है ऊर्जा, जो हमारे अंदर पैदा होती है। यह हमारे भीतर की जीवन प्रक्रिया से हमें मिलती है। और फिर कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जिनकी प्रकृति विशुद्ध रूप से ब्रह्मांडीय है और जो भौतिक नहीं हैं।

लोग तनाव की बात करते हैं। तनाव बड़ी ही बुनियादी चीज है। यह ऐसा ही है जैसे आप इंजन में चिकनाई के लिए लुब्रिकेंट डाले बिना गाड़ी चलाने की कोशिश करें और फिर शिकायत करें कि मेरी गाड़ी तो आगे जा ही नहीं रही। 

अगर हम यह चाहते हैं कि इन सारे पहलुओं के मेल से बने इस प्राणी के, या कहें इस मशीन के भीतर कोई घर्षण न हो, तो कई स्तरों पर हमें चिकनाहट लानी होगी। एक है सबसे बुनियादी घर्षण, जिसे लोग हर जगह महसूस करते हैं- लोग तनाव की बात करते हैं। तनाव बड़ी ही शुरुआती चीज है। यह ऐसा ही है जैसे आप इंजन में चिकनाई के लिए लुब्रिकेंट डाले बिना गाड़ी चलाने की कोशिश करें और फिर शिकायत करें कि मेरी गाड़ी तो आगे जा ही नहीं रही। अगर आप अपनी गाड़ी एक मेकेनिक के पास ले जा कर कहें, देखो इस गाड़ी में कुछ खराबी है; और वह देखे कि आप बिना लुब्रिकेशन के गाड़ी चलाने की कोशिश कर रहे हैं, तो वह आपका सिर ठोक कर यही कहेगा कि आप तो इतने बड़े बेवकूफ हैं कि आप गाड़ी चलाने के लायक ही नहीं हैं।

यह बात ऐसी ही है। जब आप कहते हैं ‘मुझे बड़ा तनाव हो रहा है’, तो इसका मतलब है कि आपके मन में घर्षण हो रहा है, आपके भीतर मनोवैज्ञानिक घर्षण है। यह घर्षण की सबसे बुनियादी स्थिति है, लेकिन हमारे अंदर घर्षण के कई और भी जटिल स्तर या गहरे आयाम हैं। अगर आपका भौतिक शरीर आपके कार्मिक शरीर से तालमेल नहीं बिठा पाता तो आपके अंदर एक दूसरे प्रकार का घर्षण होगा। ऐसा क्यों होगा? ऐसा इसलिए हो सकता है कि अगर आपका कार्मिक शरीर एक खास तरह का हो, पर अगर आपको सही गर्भ न मिल पाया हो, तो आपका कार्मिक शरीर आपके भौतिक शरीर के साथ निरंतर घर्षण करता रहेगा। यह बड़ा जटिल घर्षण है जिसे संभाल पाना कोई मामूली बात नहीं है। इसके लिए बड़ी मेहनत करनी होगी।

वरना शायद आपके भौतिक शरीर से ऊर्जा शरीर तालमेल न बिठा पाए। ऐसे कुछ लोग हैं, जो इस परेशानी से गुजर रहे हैं। यह मामला शायद कुछ हद तक संस्कृति से जुड़ा हुआ है। आस-पास का वातावरण कैसा है, प्रदूषण कितना है, जमीन और उसके साथ जुड़ी यादें, शायद ये सब भी इस पर कुछ असर डालते हैं। इसके कई पहलू हैं।

कुछ दूसरे प्रकार के घर्षण हो सकते हैं, जैसे आपकी मनोवैज्ञानिक और शारीरिक बनावट में ठीक तरह से मेल नहीं हो। इस तरह आपका हर हिस्सा, आपका हर पहलू या तो बड़ी आसानी से चल सकता है या फिर तेज घर्षण के साथ। हठ योग का मकसद आपके सिस्टम को गूंधना है – सिर्फ भौतिक शरीर को नहीं, पूरी प्रणाली को इस तरह गूंधना कि सारे घर्षण ऐसे मिट जाएं कि कुछ वक्त बाद जब आप यहां बैठें, तो आपके भीतर कहीं कोई घर्षण महसूस न हो। आपको बस बाहरी चीजों को संभालना है, और कुछ नहीं। जब ऐसा हो जाएगा, तो आप बाहरी संसार के साथ बड़ी आसानी से और पूरी काबिलियत के साथ निबट सकेंगे।

सूर्य-क्रिया आपकी प्रणाली में चिकनाहट लाने की दिशा में एक असाधारण प्रक्रिया है। आपकी प्रणाली में यह चिकनाहट या आपके भीतर यह सहजता तब तक नहीं आएगी, जब तक सबसे बड़े सिस्टम- सौरमंडल के साथ आप तालमेल नहीं बिठा लेते। आप जो हैं उसका विराट शरीर यह सौरमंडल ही तो है।

सूर्य-क्रिया आपकी प्रणाली में चिकनाहट लाने की दिशा में एक असाधारण प्रक्रिया है। आपकी प्रणाली में यह चिकनाहट या आपके भीतर यह सहजता तब तक नहीं आएगी, जब तक सबसे बड़े सिस्टम- सौरमंडल के साथ आप तालमेल नहीं बिठा लेते।

सूर्य-क्रिया की यह प्रक्रिया, आपके चक्रों को बड़ा करती है; इस तरह से कि आपकी ऊर्जा-प्रणाली के चक्र इतने बड़े हो जाएं कि वे ठीक सौर चक्रों जैसे हो जाएं। एक सौर चक्र को पूरा होने में बारह साल तीन महीने और कुछ दिन का वक्त लगता है। आपकी प्रणाली, आपकी ऊर्जा प्रणाली को भी ठीक इतना ही वक्त लगना चाहिए। जब आप उतना ही समय लेंगे, जब आपके चक्र पूरी तरह सूर्य के साथ तालमेल बिठा लेंगे, तब आप महसूस करेंगे कि आपकी प्रणाली बिना किसी घर्षण के चल रही है। जो भी थोड़ी-बहुत असामान्यताएं या विक्षेप पैदाइशी होती हैं या जिंदगी जीते-जीते हममें आ जाती हैं, वे सब भी ठीक हो जाती हैं। इस अवस्था को लाने की कई प्रणालियां हैं। सूर्य-क्रिया उसी दिशा में एक शक्तिशाली प्रक्रिया है।

यह चक्र के एक खास खंड में पहुंचने के लिए है तकि दीक्षा से पहले यह आपके भीतर साकार रूप ले सके। सूर्य-क्रिया की दीक्षा प्रक्रिया बहुत सरल होगी। यह सरल इसलिए है, क्योंकि अगर आपने अपने सिस्टम में एक खास स्तर की ज्यॉमेट्री हासिल कर ली है, तो फिर आपको बस अपनी बनाई गई नई ज्यॉमेट्री की ही जरूरत होगी। नई ज्यॉमेट्री कहने से मेरा मतलब है कि शरीर में मौजूद एक सौ चौदह चक्रों में से अगर इक्कीस सक्रिय हैं, तो भी आप भरपूर जिंदगी जी सकते हैं। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से आप एक पूरी जिंदगी जी सकेंगे। यह दीक्षा मुख्य रूप से आपके सिस्टम को ऊर्जा देने के लिए है, जो सक्रिय होता है और खुलता है। जैसा मैंने कहा, अगर आपके भीतर इन चक्रों में से इक्कीस भी पूरी तरह खुले हुए हैं, तो भी आप भरपूर जीवन जी सकेंगे, लेकिन ज्यादातर लोगों के अंदर इतने चक्र भी खुले और सक्रिय नहीं होते। जिस इंसान में ये इक्कीस चक्र लचीले, खुले हुए, तरोताजा, सक्रिय और जीवंत हैं, वह एक बहुत सक्रिय, स्फूर्तिवान और संपूर्ण जीवन जी सकेगा।

हो सकता है सामान्य हठ योग या खास तौर से सूर्य-क्रिया के द्वारा आपके ज्यादा चक्र खुल गए हों, लेकिन संभव है कि उनमें वैसी ऊर्जा का संचार नहीं हुआ होगा। इसका कारण यह हो सकता है कि वो एक क्रम में ना खुले हों। वे अलग-अलग जगहों पर खुल गए हों और शायद इसलिए सिस्टम उन बिंदुओं के रास्ते ऊर्जा संचारित न कर पाया हो।

तो यह दीक्षा बस यह सुनिश्चित करने के लिए है कि किसी खास अभ्यास से आपने जो संभावनाएं पैदा की हैं, वे लंबे अरसे तक अंदर दबी न रहें। क्योंकि अगर ये लंबे अरसे तक दबी रहीं, तो शायद आप उस प्रक्रिया को जारी रखने के लिए जरूरी प्रेरणा खो देंगे। अगर आप बिना किसी नतीजे के या बिना किसी नतीजे की उम्मीद लगाए साधना जारी रख पाते हैं और एक खास स्तर तक खुल पाते हैं, तो हम आपकी साधना से खुले उन केंद्रों को ऊर्जावान कर सकते हैं। दीक्षा का यही मकसद है। आम समझ से यह एक बहुत ही सरल क्रिया होगी, लेकिन हम खूब हल्ला-गुल्ला कर के, बढ़िया लजीज खाना खा के इसको शानदार बना सकते हैं!

 

प्रेम व प्रसाद,

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