स्त्री और पुरुष प्रकृति: कौन बेहतर है?

स्त्री और पुरुष प्रकृति - कौन बेहतर है

सद्‌गुरुसद्‌गुरु से एक प्रश्न पूछा गया कि क्या रचनात्मकता स्त्री प्रकृति से जुड़ी है? सद्‌गुरु बताते हैं कि अगर आपकी पहचान एक नारी के तौर पर है तो आपको लगता है कि स्त्रैण प्रकृति ही रचनात्मक होती है। अगर आपकी पहचान पुरुष के तौर पर है तो आपको पुरुषैण बेहतर लगता है। तो आखिर बेहतर कौन है? जानते हैं…

मान्या : मैं पिछले छह महीने से दिव्य स्त्रैण प्रकृति पर रिसर्च कर रही हूं, मैं बस जानना चाहती हूं कि क्या रचनात्मक ऊर्जा स्त्रैण ऊर्जा है?

सद्‌गुरु: जैसा कि आप जानती हैं कि बेहद बुनियादी चीजों को करने, जैसे बिजली जलाने के लिए भी आपको पॉजिटिव व निगेटिव दोनों की जरुरत होती है। भौतिक अस्तित्व की प्रकृति दो ध्रुवों के बीच में होती है। इसका यह मतलब नहीं है कि एक ध्रुव दूसरे के खिलाफ है या कोई एक दूसरे से ऊपर है। यह चीज हरेक पर लागू होती है। इस पर बहस करना कि ‘पुरुषैण-प्रकृति रचनात्मक है या स्त्रैण-प्रकृति’ – यह दरअसल आपकी अपनी पहचान से जुड़ा मुद्दा है। अगर आपकी पहचान एक नारी के तौर पर है तो आपको लगता है कि स्त्रैण प्रकृति ही रचनात्मक होती है। अगर आपकी पहचान पुरुष के तौर पर है तो आपको लगता है कि पुरुषैण ही सबसे बेहतर है। लंबे समय से लोग ऐसा ही सोचते आ रहे हैं। इसी सोच के चलते आप आपस में मतभेद पैदा कर लेते हैं। ये दोनों दो अलग-अलग चीजें न होकर एक ही चीज के दो हिस्से हैं। भौतिक अस्तित्व सिर्फ स्त्री या सिर्फ पुरुष से नहीं हो सकता। इसके लिए दोनों की ही जरूरत होती है। एक बार जब आप भौतिक आयाम से परे चले जाते हैं तो फिर स्त्री या पुरुष होना मायने नहीं रखता। लेकिन अगर आप भौतिक दायरे में हैं, तो पुरुषैण और स्त्रैण का होना जरूरी है। इसके अलावा कोई और रास्ता है ही नहीं। लेकिन हां, आप पुरुषैण को एक आदमी से और स्त्रैण को एक औरत से जोड़ कर न देखें। यह इस तरह से काम नहीं करता।

मर्दों में स्त्री प्रकृति होना, और स्त्रियों में पुरुष प्रकृति होना संभव है

दुनिया में ऐसे कई मर्द हैं, जो महिलाओं की अपेक्षा कहीं अधिक स्त्रैण होने में सक्षम हैं। इसी तरह से कई ऐसी औरतें हैं, जो मर्दों से ज्यादा पुरुषैण प्रकृति वाली हैं। तो कोई जरूरी नहीं है कि लिंग-भेद पर आधारित चीजें ही उनमें होने वाले भावों को तय करे। आपकी लिंगगत पहचान सिर्फ आपके भौतिक अस्तित्व तक है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि आप कितने पुरुषैण या कितने स्त्रैण प्रकृति वाले हैं। यहां तक कि आपके अपने जीवन के सफर में कभी इसमें बदलाव भी हो सकता है। उदाहरण के लिए जीवन के किसी खास चरण में हो सकता है कि आपमें काफी स्त्रैण हो, लेकिन धीरे-धीरे जैसे‐ जैसे जीवन आगे बढ़ा, आपने पुरुषैण प्रकृति को अपना लिया। या इसके उल्टा आप पहले बेहद पुरुषैण से भरे थे, लेकिन जीवन के साथ आप कुछ इस तरह जुड़े, आपके भीतर कुछ ऐसी समझ खिल गई कि आपने अपने भीतर स्त्रैण प्रकृति विकसित कर ली। बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा होता है।

जीवन में झगडे सीमाओं के उल्लंघन से आते हैं

तो इन दोनों के बिना किसी भी चीज की रचना नहीं हो सकती। ये दोनों चीजें कभी भी एक दूसरे की विरोधी नहीं हैं। हां यह बात अलग है कि औरत और मर्द आपस में लड़ सकते हैं। अगर दुनिया में पुरुष नहीं होते तो वे आपस में लड़ लेतीं, इसी तरह से अगर औरतें नहीं होतीं तो पुरुष आपस में लड़ते। अगर कोई ऐसा है, जो आपसे थोड़ा अलग दिखता है, तो हम उससे लड़ते हैं। यानी लड़ाई स्त्रैण व पुरुषैण को लेकर नहीं है, उन्हें तो किसी न किसी से लडऩा ही है। चूंकि इन दोनों के बीच नजदीकी रिश्ता होता है, इसलिए यहां ज्यादा लड़ाई होती है। चूंकि दोनों के बीच एक दूसरे के दायरे में घुसने के मौके ज्यादा होते हैं, इसलिए लड़ाई भी ज्यादा होती है। अगर किसी के साथ आपकी सीमाएं स्पष्ट हों तो आपकी लड़ाई भी नहीं होगी। लड़ने का अवसर ही नहीं होगा। जब बहुत सारी चीजें साझा होती हैं, तभी ज्यादा झगड़े होते हैं। तो झगड़े जीवन में साझा की गई चीजों व एक दूसरे के दायरे में आने को लेकर हो रहे हैं, न कि स्त्रैण व पुरुषैण को लेकर। आपको एक ही बिस्तर, एक ही बाथरूम, और कई सारी चीजें साझा करनी हैं तो झगड़ा तो होगा ही। यह अपने-अपने इलाके की लड़ाई है, यह महिला या पुरुष का झगड़ा नहीं है।


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