स्त्री और पुरुष का भेद जुड़ा है पृथ्वी और जल तत्व से

स्त्री और पुरुष का भेद जुड़ा है पृथ्वी और जल तत्व से

सद्‌गुरुआज के स्पॉट में सद्‌गुरु लिंग-भेद पर पर चर्चा करते हुए बता रहे हैं कि स्त्री और पुरुष का यह भेद कितना प्राकृतिक और कितना सामाजिक है। और ये कि कैसे ये लिंग भेद जल और पृथ्वी तत्वों से जुड़ा है

दो ही जगह मायने रखता है लिंग भेद

मैं हमेशा कहता हूँ कि सिर्फ दो ही जगह इंसान का लिंग यानी उसका स्त्री या पुरुष होना मायने रखता है और वो है बाथरूम और बेडरूम। इसके अलावा और कहीं यह चीज मायने नहीं रखती।

महिला का झुकाव जल तत्व की तरफ ज्यादा होता है, जबकि पुरुष का पृथ्वी तत्व की तरफ। जल तत्व महिला के शरीर व मन को एक खास तरह का लचीलापन देता है।
लेकिन अब इस मुद्दे पर भी बहस होती है कि किस बाथरूम में जाया जाए। इससे यह सवाल उठता है कि हमारे मानव सिस्टम में लिंग भेद कितना गहराई तक पैठा है। हालांकि जैविक अभिव्यक्ति यानी बायोलॉजी के स्तर पर तो यह भेद साफ नजर आता है, लेकिन क्या हमारे भीतर मौजूद पंच तत्वों के स्तर पर भी यह अंतर दिखाई देता है? आमतौर पर तत्व के स्तर पर महिला और पुरुष की प्रवृत्तियों में फर्क होता है, हालांकि यह बात हर व्यक्ति पर लागू नहीं होती। महिला का झुकाव जल तत्व की तरफ ज्यादा होता है, जबकि पुरुष का पृथ्वी तत्व की तरफ। जल तत्व महिला के शरीर व मन को एक खास तरह का लचीलापन देता है। जबकि पृथ्वी तत्व की तरफ झुकाव पुरुष को एक तरह की दृढ़ता, अपनी बात पर जोर देना, सख्ती का भाव देने के साथ-साथ दृढ़ अभिव्यक्ति देता है।

अंतर्बोध और तर्क का अंतर

प्राकृतिक रूप से महिलाओं में आमतौर पर अंतर्बोध होता हैं, जबकि पुरुषों में ज्यादातर तर्किकता अधिक होती है। लेकिन फिर से वही बात आती है कि यह हरेक पर लागू नहीं होती।

आप चाहें स्त्री हों या पुरुष, मानसिक क्षेत्र में आप प्रशिक्षण से खुद को आमतौर पर दूसरे लिंग जितना सक्षम बना सकते हैं।
लेकिन आम चलन यही है कि एक औरत जीवन का अनुभव करना चाहती है और पुरुष जीवन को समझना चाहता है। दोनों के नजरियों में इस बड़े अंतर के पीछे वजह यह है कि एक में जल तत्व की प्रधानता होती है और दूसरे में पृथ्वी तत्व की प्रधानता होती है। बचे हुए तत्व हरेक इंसान में अलग-अलग तरीके से अपना काम करते हैं। आप चाहें स्त्री हों या पुरुष, मानसिक क्षेत्र में आप प्रशिक्षण से खुद को आमतौर पर दूसरे लिंग जितना सक्षम बना सकते हैं। मूल रूप से स्त्री और पुरुष में बुनियादी तत्वों की प्रकृति इस तरह पाई जाती है कि वे बतौर स्त्री या पुरुष अपने बुनियादी कामों को कर सकें।

कुछ समय बाद तत्व फिर व्यवस्थित होने लगते हैं

हालांकि इनके बुनियादी कामों पर आज बहस हो सकती है, क्योंकि हमारे शहरों, घरों, हमारे काम करने की जगहों पर हमने अपनी एक ऐसी कृत्रिम दुनिया तैयार कर ली है, जहां लिंग-भेद खत्म कर दिया गया है।

एक खास उम्र तक स्त्री और पुरुष के सिस्टम की तात्विक संरचना इस तरह से तैयार होती है, जहां दोनों एक दूसरे के लिए पूरक के तौर पर काम करते हैं।
लेकिन अगर आप जंगलों में रहते तो यह प्रबंध स्वाभाविक रूप से एक जरूरत होता। और सबसे बड़ी बात है कि हमें इस बारे में बुनियादी तौर पर सोचने की जरूरत है, आज हमारा अस्तित्व अगर है तो सिर्फ एक औरत की वजह से, जिसने हमें जन्म दिया और जिसे हम मां कहते हैं। इसका मतलब हुआ कि अगली पीढ़ी के निर्माण की जिम्मेदारी स्त्री शरीर की है। इसी वजह से स्त्री शरीर खास तरीके से बनाया गया है। संतानोत्पत्ति के इस मकसद में जल एक बेहद अहम तत्व है।
एक खास उम्र तक स्त्री और पुरुष के सिस्टम की तात्विक संरचना इस तरह से तैयार होती है, जहां दोनों एक दूसरे के लिए पूरक के तौर पर काम करते हैं। लेकिन जीवन में आगे चल कर स्त्री और पुरुष के सिस्टम में मौजूद ये तत्व स्वतंत्र रूप से खुद को फिर से व्यवस्थित कर लेते हैं। बहरहाल, दुर्भाग्यवश लोग यह विश्वास करने के लिए तैयार किए जाते हैं कि उन्हें किसी खास तरह के सामाजिक प्रबंध को स्वीकारना है, खासकर बात जब शादी या परिवार की आती है। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो यह आलोचक और निंदक समाज उन पर ‘भगोड़े’ होने का ठप्पा लगा देता है।

आकाश तत्व को बढ़ाना होगा

इसी वजह, आदत और भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक असुरक्षा के चलते लोग एक सीमा के बाद भी विपरीत लिंग वाले से अपने रिश्तों को जारी रखते हैं।

अगर आप अपनी मौजूदा सीमाओं से परे निकलना चाहते हैं तो आप अपने बोध को अपनी पांच इंद्रियों व भौतिकता के आयाम से आगे बढ़ाना चाहते हैं और अस्तित्व के दिव्य प्रकृति की खोज करना चाहते हैं, तो इसके लिए अपने सिस्टम में आकाश तत्व का अनुपात बढ़ाना जरूरी है।
स्त्री और पुरुष तंत्र के तत्वों की प्रवृत्ति में जो अंतर होता है – एक का झुकाव जल तत्व की ओर होता है और दूसरे का पृथ्वी तत्व की ओर – यह बस अस्थायी है। आप कितनी जल्दी इस लिंगगत प्रकृति से परे निकलते हैं, यह इस पर भी निर्भर करता है कि आप अपने भीतर कितना आकाश तत्व विकसित करते हैं। अगर आप अपनी मौजूदा सीमाओं से परे निकलना चाहते हैं तो आप अपने बोध को अपनी पांच इंद्रियों व भौतिकता के आयाम से आगे बढ़ाना चाहते हैं और अस्तित्व की दिव्य प्रकृति की खोज करना चाहते हैं, तो इसके लिए अपने सिस्टम में आकाश तत्व का अनुपात बढ़ाना जरूरी है। अब सवाल आता है कि अपने आकाश तत्व को बढ़ाया कैसे जाए? पहली बात, इस भौतिक सृष्टि की रचना पांच तत्वों जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु व आकाश के सिर्फ मिश्रण से नहीं हुई है। भौतिक अस्त्त्वि से पहले यहां सिर्फ एक रिक्तता थी, एक शून्यता थी। इस शून्य से सर्वप्रथम पहले आकाश तत्व की उत्पत्ति हुई। बाकी सारे तत्व इसी आकाश की देन हैं।

क्या है आकाश तत्व को बढाने का मतलब?

आकाश तत्व को बढ़ाने का मतलब आपके दिमाग में खालीपन पैदा करना नहीं है। आकाश को बढ़ाने का मतलब आध्यात्मिक व भौतिक दोनों ही तरीकों से अपनी मूल प्रकृति की तरफ बढ़ना है।

अपने भीतर आकाश तत्व का अनुपात बढ़ाना और आध्यात्मिकता की तरफ मुड़ने का मतलब हुआ कि आप खुद को असीम के तौर पर परिभाषित कर रहे हैं। और असीम की कोई परिभाषा नहीं होती।
अगर आपकी प्रवृत्ति आकाश की तरफ बढ़ती है तो आध्यात्मिकता के प्रति आपकी चाहत आपकी सभी जरूरतों से ऊपर निकल जाएगी। जब आपके सिस्टम में आकाश तत्व प्रभावशाली होता है तो भौतिक आयाम कम महत्वपूर्ण होने लगते हैं। इसका मतलब भौतिकता को अनदेखी करना नहीं, बल्कि उससे परे जाना है। परे जाने का मतलब मौजूदा सीमाओं से आगे निकलना या ऊपर उठाना। आमतौर पर लोग खुद को अपनी जाति, धर्म, राष्ट्रीयता या लिंगगत पहचानों या फिर अपने व्यक्तित्व की खूबियों से परिभाषित करते हैं। बुनियादी तौर पर आप खुद को अपनी उन सीमाओं या फिर अपनी उन चारदीवारियों से परिभाषित करते हैं, जो आपने अपने लिए तय कर रखी हैं। अपने भीतर आकाश तत्व का अनुपात बढ़ाना और आध्यात्मिकता की तरफ मुड़ने का मतलब हुआ कि आप खुद को असीम के तौर पर परिभाषित कर रहे हैं। और असीम की कोई परिभाषा नहीं होती।

भौतिक प्रकृति से परे – स्त्री और पुरुष का भेद नहीं होता

एक बार आपका बोध भौतिक प्रकृति से ऊपर उठ जाता है तो फिर स्त्री या पुरुष जैसी कोई चीज नहीं रह जाती। फिर सिर्फ एक मानव आकार रह जाता है जिसे कई तरीके से सक्षम और कुशल बनाया जा सकता है।

अगर आप कुछ देर तक अपने आॅफिस, घर, परिवार, मि़त्रों, सोशल मीडिया, फोन व कंप्यूटर से खुद को दूर रख सकें तो आपको भी अपनी मौजूदा सीमाओं से परे जाने की जरूरत महसूस होने लगेगी।
यहां कुशलता का जिक्र सिर्फ काम के संदर्भ में ही नहीं हो रहा, बलिक बोध के संदर्भ में भी हो रहा है। आप अपना कौशल सिर्फ एक इंसान के तौर पर ही नहीं बढ़ाते, बल्कि एक जीवन के तौर पर भी बढ़ाते हैं। इस तरह आप पहले से ज्यादा जीवंत हो उठते हैं। हर इंसान जीवन को उसके बड़े आयाम में जानने के लिए सक्षम है। सीमाओं से परे जाने की चाहत हरेक में निहित होती है। अगर आप कुछ देर तक अपने आॅफिस, घर, परिवार, मि़त्रों, सोशल मीडिया, फोन व कंप्यूटर से खुद को दूर रख सकें तो आपको भी अपनी मौजूदा सीमाओं से परे जाने की जरूरत महसूस होने लगेगी। इसके लिए किसी शिक्षण या उकसावे की जरूरत नहीं होती। अगर इंसान कुछ जरूरी वक्त खुद को दे देता है तो वह अपने अस्तित्व की सीमाओं को जान लेगा। एक बार आप अपनी ही सीमाओं के प्रति खुद सचेत हो गए तो फिर इससे परे जाने की चाहत स्वाभाविक प्रक्रिया होगी।


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