शिव और श्मशान – क्या है इनमें संबंध?

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Sadhguruआपसे और आपके खेल से ऊब कर शिव श्मशान में जा बैठे हैं क्योंकि बाकी संसार में जो कुछ भी नाटक हमेशा चलता रहता है, वह मूर्खतापूर्ण है। असली चीजें तो केवल श्मशान में ही होती हैं…

लोगों में बस यही बड़ी कमी है कि उनके भीतर जरूरी तीव्रता नहीं होती। अगर उनके भीतर भरपूर तीव्रता होती तो उस परम तत्व को पाने की दिशा में जीवन भर काम न करना पड़ता। एक ही दिन में काम हो गया होता। ज्यादातर लोगों के जीवन में मृत्यु के पल या मृत्यु की संभावना के पल ही सबसे तीव्र होते हैं। अधिकतर लोग ऐसी तीव्रता जीवन भर महसूस नहीं कर पाते। चाहे प्रेम के पल हों, हंसी के पल हों, आनंद के पल हों या फि र कष्ट के, तीव्रता को वे कभी महसूस ही नहीं कर पाते। बस मौत के पलों में ही उन्हें वैसी तीव्रता का अनुभव हो पाता है।

इसी वजह से शिव श्मशान या कायांत में जाकर बैठे। कायांत का मतलब है जहां काया यानी शरीर का अंत होता है। शरीर का अंत होता है, जीवन का अंत नहीं होता है, इसीलिए यह कायांत है, जीवांत नहीं। इस धरती पर आकर आपने जो कुछ भी इकठ्ठा किया है, आपको सब कुछ छोड़ देना है। अगर जीवन भर आपको यह लगता रहा है कि आपका शरीर ही सब कुछ है, तो जब आप इस शरीर को त्यागते हैं, तो वे पल आपके लिए जीवन के सबसे तीव्र पल हो जाते हैं। अगर आपको लगता है कि शरीर के परे भी कुछ है, तो इसका आपके लिए कोई खास महत्व नहीं रह जाता। जिन लोगों को जीवन में ‘मैं कौन हूं और क्या हूं’ का अहसास हो जाता है, उनके लिए कायांत कोई खास बड़ा मौका नहीं होता। उनके लिए ये भी सामान्य पल ही होते हैं। लेकिन जिन लोगों ने पूरी जिंदगी खुद को एक शरीर मानते हुए गुजार दी है, उनके लिए मृत्यु के पल बहुत तीव्र होते हैं।

अमरत्व हर किसी के लिए एक स्वाभाविक अवस्था है। नश्वरता एक भूल है, यह जीवन की गलत समझ है। जो शरीर है, उसके लिए कायांत यानी शरीर का अंत जरूर आएगा, लेकिन शरीर के बजाय अगर आप जीवन बन जाते हैं, अगर आप एक जीवंत शरीर न होकर बस एक जीवन बन जाते हैं, तो अमरत्व आपके लिए एक सहज अवस्था हो जाएगी। आप मरणशील हैं या अमर, यह महज एक अनुभव की बात रह जाएगी, उसके लिए अस्तित्व संबंधी किसी परिवर्तन की जरूरत नहीं रहेगी।

क्यों रहते हैं शिव शमशान में?

यही वजह है कि ज्ञान प्राप्ति को आत्म-अनुभूति माना जाता है, कोई उपलब्धि नहीं। यानी यह आपके लिए मौजूद है, इसे कहीं से हासिल नहीं करना है, यह है, बस इसे महसूस करना है, अपने अनुभव में लाना है। अगर आप न महसूस करें, न देखें तो यह आपके लिए नहीं है। यह बस एक अनुभव की बात है, किसी अस्तित्व संबंधी परिवर्तन की जरूरत नहीं है। अगर आप अपनी इंद्रियों से नहीं, बल्कि प्रज्ञा से लैस हैं, तो आप केवल काया ही नहीं जीव को भी जानते हैं। ऐसी स्थिति में आप सहज रूप से अमर हो जाते हैं। आपको अमरत्व पाने की दिशा में काम नहीं करना पड़ता। बस आपको इसके होने को महसूस करना है।

तो शिव ने अपना निवास स्थान कायांत या श्मशान में बना लिया। शम का अर्थ है शव और शान का अर्थ शयन यानी बिस्तर से है। जहां मरे हुए शरीरों को रखा जाता है, वहां शिव रहते हैं। दरअसल, उन्हें ऐसा लगा कि जीवित लोगों के साथ काम करना तो समय की बर्बादी है। आप लोगों को तीव्रता के उस स्तर तक नहीं ला सकते, जिसकी जरूरत है। लोगों को थोड़ा बहुत तीव्र बनाने के लिए आपको बहुत सारे करतब करने पड़ते हैं।

तीव्रता के पैदा न होने की वजह यही है कि आपने जीवन-यापन की प्रवृत्ति को सबसे महत्वूपर्ण चीज बनाया हुआ है। इस जीवित शरीर में दो मौलिक आवेग या कहें बुनियादी ताकतें हैं। एक है जीवित रहने के लिए जीवन-संघर्ष की सहज प्रवृत्ति और दूसरी है असीमित रूप से विस्तार करने की इच्छा। अगर आप जीवन-संघर्ष की प्रवृति को शक्तिशाली बनाते हैं, तो यह हमेशा आपको मंद रखेगा। क्योंकि जीवित रहने के लिए संघर्ष करने का मतलब है सुरक्षित चलना। अगर आप असीमित होने की इच्छा को बलशाली बनाते हैं, अगर आप असीमित विस्तार खोज रहे हैं और उसी पर आपने अपनी तमाम ऊर्जा को लगाया हुआ है तो जीवन पूरी तरह से तीव्र होगा।

शमशान में ज्ञान है

जीवित रहने के लिए संघर्ष करने की जो सहज प्रवृति है, वह हर प्राणी में प्रबल है। क्रमिक विकास की जिस प्रक्रिया के तहत हम इंसान बने हैं, उसमें एक उच्च स्तर की जागरूकता और प्रज्ञा हमारे जीवन में प्रवेश कर गई है। यही समय है जब जीवन-संघर्ष की प्रवृति को थोड़ा नीचे करके असीमित विस्तार की इच्छा को तेज किया जा सकता है। इन दोनों ताकतों में से एक हमेशा आपके भीतर तीव्रता को बढ़ाना चाहती है और दूसरी हमेशा उसे कम करना चाहती है। देखिए, जो संसाधन कम हैं, उनकी बचत आपको करनी पड़ सकती है, लेकिन जीवन तो प्रचुर है।

आपसे और आपके खेल से ऊब कर शिव श्मशान में जा बैठे हैं क्योंकि बाकी संसार में जो कुछ भी नाटक हमेशा चलता रहता है, वह मूर्खतापूर्ण है। असली चीजें तो केवल श्मशान में ही होती हैं। देखा जाए तो केवल जन्म के पलों में और मौत के पलों में ही कुछ सार्थक घटित होता है। प्रसूति गृह और श्मशान घाट ही दो समझदारी भरी जगहें हैं, हालांकि प्रसूति गृह में थोड़ी ज्यादा चहल पहल होती है।
शिव एक ऐसी जगह बैठते हैं, जहां जीवन के मायने पूरी तरह स्पष्ट हैं। पर अगर आपमें भय है, अगर आप खुद को सुरक्षित और कायम रखना चाहते हैं, तो ये आपके लिए स्पष्ट नहीं होगा। ये आपके लिए सिर्फ तभी स्पष्ट होगा, जब आपमें खुद का विस्तार करने और परम को छूने की आकांक्षा है। शिव की रुचि उन लोगों में नहीं है, जो खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैं। खुद को जीवित रखने के लिए आपको बस 4 हाथ-पैरों और दिमाग की कुछ काम करने वाली कोशिकाओं की जरुरत होती है।

शिव को विनाशक कहा जाता है। ऐसा नहीं है कि वह आपका नाश करना चाहते हैं। दरअसल, वह श्मशान में इंतजार कर रहे होते हैं, क्योंकि जब तक शरीर नष्ट नहीं होगा तब तक लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि मौत क्या है।
चाहे वो केंचुआ हो या झींगुर, या कोई और प्राणी – सभी जीवित हैं और अच्छे से जी रहे हैं। जीवित रहने के लिए आपको बस इतने ही दिमाग की जरुरत होती है। अगर आप बस खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैं, अगर सुरक्षा का भाव आपमें सबसे प्रबल है, तो वे आपसे ऊब चुके हैं – वो आपके मरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

शिव को विनाशक कहा जाता है। ऐसा नहीं है कि वह आपका नाश करना चाहते हैं। दरअसल, वह श्मशान में इंतजार कर रहे होते हैं, क्योंकि जब तक शरीर नष्ट नहीं होगा तब तक लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि मौत क्या है। आपने देखा होगा कि जब किसी प्रिय की मौत हो जाती है तो लोग उसके शरीर के पास बैठकर रोते हैं, उसे गले से लगाते हैं, चूमते हैं और कोशिश करते हैं कि कैसे भी वह जी उठे। लेकिन अगर एक बार शरीर को आग लगा दी जाए तो फि र कोई भी उस आग की लपट को गले नहीं लगाता। आत्म सुरक्षा की उनकी प्रवृति उन्हें बता देती है कि अब यह करना सही नहीं है।

सही या गलत?

यह सही या गलत का प्रश्न नहीं है। यह मुद्दा है सीमितता और असीम का। क्या सीमित होना गलत है? नहीं। लेकिन सीमित होना कष्टदायक है। क्या कष्ट में रहना गलत है? नहीं। अगर आपको इसमें मजा आता है तो कोई समस्या ही नहीं है। मैं किसी भी चीज के खिलाफ नहीं हूं। बस मुझे यह बात पसंद नहीं आती कि आप जिस दिशा में जाना चाहते हैं उसकी उल्टी तरफ चल रहे हैं।

नासमझी या बेसुधी ही एकमात्र चीज है जिसके मैं खिलाफ हूं। क्योंकि मानव जीवन का महत्व इसीलिए है कि उसे किसी भी और प्राणी के मुकाबले ज्यादा समझ दी गई है। लेकिन बहुत सारे लोग इसे गलत साबित करने की कोशिश में लगे हैं। इस सृष्टि का मतलब ही है बुद्धि यानी प्रज्ञा और स्रष्टा का मतलब है परम प्रज्ञा। दुर्भाग्यवश बहुत सारे लोग जो तमाम तरह के गलत काम करते हैं, ईश्वर का नाम लेते हैं और बहुत से तो ऐसे हैं जो केवल बुरी तरह फ ंस जाने की हालत में ही ईश्वर को याद करते हैं। अगर आपको गुनगुने पानी से नहाना होता है तो आप मस्त होकर कोई फि ल्मी गाना गुनगुनाते हैं और आपको ठंडे पानी से भरे किसी तीर्थकुंड में नहाने को बोल दिया जाए तो आपके मुंह से ‘शिव-शिव’ निकलने लगता है। जैसे ही आप परेशानी में फ ंसते हैं, आपको शिव याद आने लगते हैं। जब जीवन आपके हिसाब से चल रहा होता है तो आप शिव को भूलकर तमाम तरह के दूसरे लोगों के चक्कर में फ ंसे रहते हैं। अगर कोई आपके सिर पर बंदूक तान दे तो आपके मुंह से ‘शिव-शिव’ निकलने लगता है। आप गलत शख्स को बुला रहे होते हैं। वह तो श्मशान में आपका इंतजार कर रहे हैं। कोई बंदूक ताने और आप उससे बचने के लिए शिव को बुलाएं तो यकीन मानिए वह आपकी मदद को नहीं आने वाले।

जीवन में आगे चलें

जीवन को पीछे की ओर मोडऩे की बात काम नहीं करेगी। अगर आप आगे की ओर चलेंगे तो यह हमेशा काम करेगा। चाहे आप गाएं या नाचें, चाहे रोएं या हंसें, चाहे आप ध्यान लगाएं, जब तक यह आपको तीव्रता के एक उच्च स्तर की ओर ले जाता है, यह काम करता रहेगा। अगर आप इसे उल्टी दिशा में चलाएंगे तो यह काम नहीं करेगा। शमशान में बैठे शिव का यह संदेश है: अगर आप मर भी गए तब भी ठीक है, लेकिन अगर आपने जीवन को छोटा बनाने का प्रयास किया तो उसका कोई लाभ नहीं। आप जीवन को छोटा करते हैं या जीवन का विस्तार करते हैं, यह इस पर निर्भर नहीं करता कि आप क्या करते हैं और क्या नहीं करते, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि अभी यह जीवन प्रक्रिया कितनी उत्साहपूर्ण और तीव्र है।

शमशान में बैठे शिव का यह संदेश है: अगर आप मर भी गए तब भी ठीक है, लेकिन अगर आपने जीवन को छोटा बनाने का प्रयास किया तो उसका कोई लाभ नहीं।

सवाल इस बात का भी नहीं है कि आप जो करते हैं, वह उपयोगी है या नहीं। अगर आप बेकार की चीजों में तीव्रता ला सकते हैं, तो भी वह काम करेगा। लेकिन आपको कुछ करने के लिए उसमें अर्थ या मायने चाहिए होता है। अगर यह अर्थपूर्ण नहीं है, अगर यह उपयोगी नहीं है, तब आप खुद को इसमें नहीं झोंक पाते। इस संदर्भ में अर्थपूर्ण होना और उपयोगी होना महत्वपूर्ण है। नहीं तो अर्थपूर्ण होना और उपयोगी होना दरअसल मनोवैज्ञानिक मामले हैं। वे बस प्रेरणा हैं, अपने आप में कोई परिणाम नहीं।


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