शिक्षा के क्षेत्र में किन बदलावों की जरूरत है?


सद्‌गुरुआज के समय के अनुसार शिक्षा, शिक्षक व शिक्षण में किस तरह के बदलाव की जरुरत है – आज के स्पॉट में इसी विषय पर सद्‌गुरु अपने विचारों को विस्तार से रख रहे हैंः

 

पिछले शनिवार को ईशा योग केंद्र में एक ‘शिक्षा में नवीनता’ विषय पर पहला सम्मेलन (कांफ्रेंस) आयोजित किया गया। इस सम्मेलन के पीछे बुनियादी सोच यह थी कि अपनी शिक्षण-पद्धति को या कहें जिस तरह से हम शिक्षा दे रहे हैं, उन तरीकों पर विचार किया जाए। किसी नई चीज को सीखना अपने आप में एक सुखद अहसास होता है, तो फिर स्कूल की पढ़ाई बच्चों के लिए इतनी तकलीफदेह क्यों होती है? जिन दिनों मैं स्कूल में था तो स्कूल जाने से बचने के लिए मैं हर संभव कोशिश करता था।

थोड़ा ध्यान, थोड़ा योग और ऐसी ही दूसरी चीजें उनके जीवनस्तर को बढ़ा सकती हैं। शिक्षक इसका लाभ ले सकते हैं, इन प्रशिक्षण में ये चीजें शमिल होने से शिक्षकों को प्रोत्साहन भी मिलेगा।
हमें स्कूलों का निर्माण इस तरह से करना चाहिए, जहां हर बच्चा जाना चाहे। इसके लिए हमें बच्चों से पहले बड़ों को शिक्षित करने की जरूरत है। बच्चे कुदरती तौर पर खुशमिजाज होते हैं और वे आबादी का ऐसा हिस्सा हैं, जिनके साथ काम करना सबसे आसान होता है। तो फिर सवाल है कि पढ़ाने के लिए माहौल को खुशनुमा बनाना एक मुश्किल काम क्यों हो जाता है? आज हमारे पास ऐसे कई वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण मौजदू हैं, जिनसे साबित होता है कि अगर आप एक खुशनुमा माहौल में होते हैं तो आपका शरीर व दिमाग सर्वश्रेष्ठ तरीके से काम करता है। अगर आप एक भी पल बिना उत्तेजना, चिड़चिड़ाहट, चिंता, बैचेनी या गुस्से के रहते हैं, अगर आप सहज रूप से खुश रहते हैं, तो कहा जाता है कि बुद्धि का इस्तेमाल करने की आपकी क्षमता एक ही दिन में सौ फीसदी बढ़ सकती है।

 

आपका खुशहाल अस्तित्व, आपको बोध की उच्च क्षमता और कामकाज के लिए अधिक सक्षम बनाता है। जब तक आप खुद खुशमिजाज नहीं होंगे, तब तक आप किसी और को खुश रहने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। ‘हां मैं खुशमिजाज होना चाहता हूं, लेकिन… क्या आप जानते हैं कि उसने क्या किया?’ ‘हां मैं खुशमिजाज होना चाहता हूं, लेकिन. . . मौसम अच्छा नहीं है।’ जीवन में बहुत सारे ‘लेकिन’ हैं।

अब समय आ गया है कि हम अपनी शिक्षा पद्धति के बारे में पुनर्विचार करें और उसे नए सिरे से तराशें, क्योंकि हमारे पास आर्थिक साधन आने वाले हैं। हमारे पास आज दुनिया तक पहुंचने का ऐसा मौका है जो अब से पहले कभी नहीं था और हमारे पास ऐसा नेतृत्व है, जो इन तमाम बदलावों को साकार करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है।
अगर हम अपने जीवन से इन सारे ‘लेकिन’ को लात मार कर बाहर निकाल दें तो शिक्षा का खुशनुमा माहौल बनाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया हो जाएगी। अगर हम खुशमिजाज हैं तो हम जो भी करेंगे, जो भी बनाएंगे, जिसकी भी रचना करेंगे, उसमें यह खूबी दिखेगी। फिलहाल हम सबसे बड़ी गलती यह कर रहे हैं कि हम बहुत ज्यादा लक्ष्य-केन्द्रित हो गए हैं, जो चीजों को करने का पश्चिमी तरीका है। हम सबसे बड़ा आम तो चाहते हैं, लेकिन हमारी दिलचस्पी पेड़ में नहीं, मिट्टी में तो बिलकुल नहीं है। योग में हम कहते हैं कि अगर आपकी एक आंख लक्ष्य पर है तो अपना मार्ग तलाशने के लिए आपके पास सिर्फ एक आंख बचती है, जो कि बिल्कुल बेअसर तरीका होगा। अगर आपकी दोनों आंखें मार्ग पर लगी होंगी तो आप अपना रास्ता पा लेंगे।

चाहे कोई विद्यार्थी हो या कोई कारोबारी, चाहे देश चलाना हो या दुनिया के अन्य सभी काम, जब हम बहुत ज्यादा लक्ष्य-केन्द्रित हो जाते हैं तो बस अंतीम नतीजा महत्वपूर्ण हो जाता है, जीवन नहीं। हम यह देखने से चूक जाते हैं कि जीवन का अंतिम नतीजा तो बस मृत्यु है। हम चाहे जो भी काम करें, चाहे उसका जो भी नतीजा निकले, हमारा मुख्य फोकस इस बात पर होना चाहिए कि हम उस काम को सबसे सुंदर तरीके से कैसे करें। हम अपने काम करने के तरीके व साधनों को बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञों की मदद भी ले सकते हैं। लेकिन इन तरीकों को सफलतापूर्वक इस्तेमाल करने के लिए हमें ऐसे लोगों की जरूरत है जो खुशमिजाज हों और जो यह जानते हों कि अपने जीवन को खूबसूरत कैसे बनाया जाए। अगर आप यह नहीं जानते कि अपने जीवन को सुंदर कैसे बनाया जाए तो आप दूसरों के जीवन को सुंदर कैसे बना सकते हैं?

 

अगर आप इस देश की पांरपरिक शिक्षा-प्रणाली की ओर मुड़कर देखें तो माता-पिता या अभिभावक अपने बच्चों को एक ऐसे शिक्षक या आचार्य या गुरु को सौंप दिया करते थे, जिसे वह न सिर्फ एक ज्ञानी इंसान के तौर देखते थे, बल्कि एक सिद्ध या कहें विकसित प्राणी के रूप में भी देखते थे। वे जानते थे कि अगर उनके बच्चे ऐसे इंसान के हाथों में हैं तो वे स्वाभाविक रूप से खिल उठेंगे।

हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को इस मौलिकता के साथ तैयार करना होगा जो हमारे हिसाब और जरूरतों के मुताबिक हो, क्योंकि हजारों सालों से यह धरती जिज्ञासुओं व साधकों की रही है।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षा दे कौन रहा है। शिक्षक का विकास होना बेहद महत्वपूर्ण है। इसका यह मतलब हर्गिज नहीं कि उन्हें शिक्षण को लेकर किसी तरह की तरकीब या युक्तियां सीखने की जरूरत है। कोई भी शिक्षक एक खिला हुआ इंसान होना चाहिए, साथ ही वह अपेक्षाकृत अधिक खुशमिजाज, प्रेम करने वाला, करुणामय और चेतन भी होना चाहिए। यह एक ऐसी चीज है, जिस पर हर इंसान को खुद ही काम करना पड़ता है। शिक्षा में आध्यात्मिकता और योग को लाने के पीछे वजह यही है कि किसी चीज के बारे में जानने की इच्छा रखना और आध्यात्मिक होना, दोनों ही साथ-साथ चलते हैं। आप एक आध्यात्मिक जिज्ञासु होते हैं, न कि एक आध्यात्मिक मतानुयायी। इसी तरह से वैज्ञानिक भी जिज्ञासु हैं। इसलिए एक शिक्षक का जिज्ञासु होना महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक प्रक्रिया का जो सार है, वह शिक्षा के क्षेत्र की आवश्यकता है, क्योंकि एक शिक्षार्थी को सक्रिय रूप से जिज्ञासु होना ही पड़ेगा। चाहे वह भौतिक शास्त्र हो, रसायन शास्त्र हो, जीव विज्ञान हो या आध्यात्मिकता – मूल रूप से सबमें यही महत्वपूर्ण होता है – जीवन के किसी खास पहलू से जुड़े सत्य की तलाश।

 

शिक्षा का मतलब है सत्य की तलाश – बेशक परम सत्य की तलाश न सही, जो वस्तु फिलहाल सामने मौजूद हो, उसी के सत्य की तलाश सही। विद्यार्थी स्वाभाविक तौर पर जिज्ञासु होते हैं। आध्यात्मिक प्रक्रिया को विद्यार्थियों में अनुशासन लाने का काम करना चाहिए, ताकि वे किसी चीज पर विश्वास न करें लेकिन इसी के साथ वे किसी के प्रति अभद्रता व असम्मान की भावना भी न रखें।

बच्चे अपने शिक्षक को बड़े ध्यान से देखते हैं। हो सकता है कि शिक्षक जो कहे, विद्यार्थी उससे चूक जाएं, लेकिन आप जिस तरह से हैं, उससे जुड़ा कोई भी पहलू उनसे छूट नहीं सकता।
आपको किसी की कही बात पर विश्वास करने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन साथ ही आपमें दूसरों की बात सुनने, उनके सामने सवाल उठाने या अपनी आपत्ति दर्ज करने के लिए जरूरी सम्मान और सभी को साथ लेकर चलने का भाव होना चाहिए। ये बातें हर इंसान को सीखनी चाहिए। समाज में हमारे आसपास जो कुछ भी हो रहा है, उसे लेकर एक सम्मानजनक तरीके से सवाल करना बेहद जरूरी है और यही चीज आध्यात्मिक जिज्ञासा का भी बुनियादी तत्व है। अगर आप सिर्फ अपने जीवनयापन के लिए पढ़ाई नहीं कर रहे, तो किसी भी सच्चे विद्यार्थी के लिए आध्यात्मिक प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। इसी तरह से अध्यापकों को भी एक खास तरह से तैयार किये जाने की जरूरत है। योग आपको अपनी सीमाओं से परे ले जाने के लिए है। योग का मतलब मिलन या एकाकार है। विद्यार्थियों व शिक्षकों के बीच खास तरह का एकाकार हुए बिना शिक्षा संभव ही नहीं है।

 

यहां तक कि भौतिक स्तर पर भी शिक्षकों को लचीला होना चाहिए। आपका बाहरी व्यक्तित्व निश्चित तौर पर बच्चों की नजरों में एक अलग असर पैदा करता है। योग का एक लाभ यह है कि इसके लिए किसी उपकरण की जरूरत नहीं होती। एक बार जब आप इसके बुनियादी तत्व को सीख लेते हैं तो फिर आप खुद इसे अपने आप कर सकते हैं।

अभी तक हम लोग सिर्फ बच्चों को शिक्षित करने के बारे में सोचते रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज है कि शिक्षकों को लगातार विकसित होना चाहिए और निखरते रहना चाहिए।
इस तथ्य के चलते कि भारत का एक बड़ा हिस्सा आज भी दरिद्र है, यह और भी जरूरी हो जाता है कि स्वास्थ्य, सबके कल्याण व मानसिक दक्षता के लिए योग की मदद ली जाए। मैं कई गलत कारणों से योग से जुड़ा, लेकिन इसने चमत्कारिक ढंग से मेरी भलाई की। यही तो इस अस्तित्व या जीवन की खूबी है कि आपके इरादे चाहें जो भी हों, लेकिन अगर आप सही चीज करेंगे तो आपके साथ सही चीजें ही घटित होंगी। योग विज्ञान का मतलब ही है अपने शरीर और मन को अच्छी तरह से समझना और यह जानना कि कैसे उनका सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल किया जाए। बच्चों में उत्साह और जोश कुछ ऐसा होता है कि आपको उन्हें संभालने के लिए दस लोगों की ऊर्जा की जरूरत होती है। खासकर एक शिक्षक के तौर पर जब आपको सौ बच्चे संभालने हों तो आपको सुपर ऊर्जा की जरूरत होती है। इसके लिए आपको योग की जरूरत है।

 

अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में एक वादा सभी को करना चाहिए कि वह जो भी करेंगे, उसमें वह असत्य से सत्य की ओर बढ़ेंगे – जो चीज़ काम नहीं करती, उसे छोड़कर उस चीज़ को अपनाएंगे, जो काम करती है। खासकर शिक्षा के क्षेत्र में, क्योंकि आने वाले समय में इस दुनिया में जीवन कैसे होगा, इसका निर्धारण शिक्षा प्रणाली से ही होगा।

यह चीज आम लोगों और बिजनेसमैन की ओर से आनी चाहिए। किसी भी चीज में निवेश तभी होगा, जब उस क्षेत्र से लोगों को प्रतिफल मिलेगा।
अगले 25 सालों में दुनिया किस तरह की होगी, इसका निर्धारण इस बात से होगा कि फिलहाल हम अपने घरों और स्कूलों में किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं। सृष्टि के बाकी प्राणियों के लिए प्रकृति ने दो सीमा रेखाएं तय की हैं, जिसके भीतर वे जीते और मरते हैं। इंसानों के लिए सिर्फ निचली रेखा होती है, ऊपर की कोई रेखा नहीं होती। चूंकि इंसानों के लिए कोई ऊपरी रेखा नहीं होती, इसलिए मानव जीवन का लगातार विकास संभव है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम क्या कर रहे हैं और कैसे कर रहे हैं, उस काम को बेहतर तरीके से करने की गुंजाइश हमेशा रहती है। उस संदर्भ में हम कह सकते हैं कि हम इंसान हैं नहीं, बल्कि इंसान बन रहे हैं।

 

अगर हम लोग सही वक्त पर सही चीजें नहीं करेंगे तो हो सकता है कि आने वाले समय में हम इंसान नहीं, बल्कि इंसान के रूप में जानवर तैयार करें। हालांकि हमने आज ही उनमें से कई जानवरों को दुनिया में पैदा कर दिया है। यही वजह है कि आज शिक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

शोषण को हटाने का तरीका कोई कानून नहीं हो सकता है, बल्कि अगर प्रतिस्पर्धा होगी और लोगों के पास फैसला करने का विकल्प होगा तो शोषण रुकेगा।
खासकर 125 करोड़ की आबादी वाले भारत जैसे देश में, जहां दुनिया की कुल आबादी का छठवां हिस्सा रहता हो। हालांकि हमारे प्राचीन कवियों ने इस देश की सुंदरता को लेकर तमाम रूमानी कविताएं लिखी हैं, जिसका आनंद मैंने भी खूब उठाया है और मैं भी इसकी सुंदरता का कायल रहा हूं, लेकिन हमें इस सच्चाई को भी स्वीकारना होगा कि आज 125 करोड़ लोगों के लिए हमारे पास न तो पर्याप्त जमीन बची है, न ही पहाड़, न नदियां और न ही पर्याप्त आसमान। हमारे पास अगर कुछ है तो सिर्फ एक बड़ी आबादी। अगर हम इस आबादी को एक स्थिर, टिकाऊ, लक्ष्य की ओर केंद्रित, प्रेरित और कौशलयुक्त बना लेते हैं तो आने वाले 25 सालों में हम सबसे बड़ा चमत्कार होंगे। जहां पूरी दुनिया की नजरें हमारी ओर होंगी। इसके विपरीत अगर हमने अपनी आबादी को अकुशल, लक्ष्य से भटकी हुई, अस्थिर और बिना प्रेरणा के छोड़ दिया तो यही आबादी हमारे लिए सबसे ज्यादा विनाशकारी साबित होगी।

 

इसकी जिम्मेदारी हम सब पर आती है कि हम सभी अपनी शिक्षा पद्धति में कुछ नया करें। इस देश का हर वयस्क अपने स्तर पर जो कुछ भी कर सकता है, वह शिक्षा के क्षेत्र में अपनी भागीदारी अवश्य दे। यह हर व्यक्ति की चिंता होनी चाहिए। जिस तरह से आज अपने यहां पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) को लेकर काफी चर्चा हो रही है और इस दिशा में हर कोई कुछ न कुछ करने की कोशिश कर रहा है, उसी तरह से हर किसी को शिक्षा के क्षेत्र में भी अपना योगदान देने की कोशिश करनी चाहिए।

इसका एक मुख्य कारण रहा कि शिक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा संचालित होता है। जबकि सरकार का काम सिर्फ आवश्यक नीतियां बनाने का होना चाहिए, उनको अमली जामा पहनाने का नहीं। इससे काम नहीं बनेगा।
क्योंकि आने वाली पीढ़ी इसी पर निर्भर है। हम जिस तरह के लोग तैयार करेंगे, उसी से हमारा पर्यावरणीय भविष्य भी तय होगा। जब शिक्षा इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ कुछ कम वेतनभोगी शिक्षकों या जर्जर सरकारी विभागों पर ही नहीं छोड़ी जा सकती है। यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है। शिक्षा में भी जीवन का तत्व अवश्य होना चाहिए। वर्ना हम जितने शिक्षित होंगे, उतने ही हम जीवन के प्रति कम सक्षम होंगे। अब तक, हमारी चिंता यही रही है कि किस तरह से शिक्षा की पहुँच को व्यापक किया जाए। इसकी पहुँच को व्यापक बनाने की कोशिश में यह कई जगह से बीच-बीच में टूट-फूट गई है, इसमें कई जगह छेद और गढ्ढे आ गए हैं। अब समय आ गया है कि न सिर्फ इन गढ्ढों को भरा जाए, बल्कि शिक्षा की व्यापकता को एक खूबसूरत गलीचे के रूप में बदल दिया जाए, जहां न सिर्फ हमारे बच्चे उसका आनंद ले पाएं, बल्कि उस पर गर्व भी कर सकें।

एक ओर जहां हमें शिक्षा की पहुँच को व्यापक बनाने पर ध्यान देना होगा, उसी के साथ हमें योजनाबद्ध तरीके से शिक्षा के स्तर को भी ऊपर उठाने पर जोर देना होगा। लंबे समय तक धर्म निरपेक्षता और समानता के सहज भाव के चलते हमने यह सोचा कि हरेक को एक जैसे ही स्कूल में जाना चाहिए और एक जैसी ही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

अब तक, हमारी चिंता यही रही है कि किस तरह से शिक्षा की पहुँच को व्यापक किया जाए। इसकी पहुँच को व्यापक बनाने की कोशिश में यह कई जगह से बीच-बीच में टूट-फूट गई है, इसमें कई जगह छेद और गढ्ढे आ गए हैं।
हर विद्यार्थी की प्रतिभा, पृष्ठभूमि और जिन हालातों में उसने समय बिताया है, ये चीजें भी शिक्षा में प्रभाव डालती है, दुर्भाग्यवश शिक्षा के क्षेत्र में इन चीजों पर ध्यान नहीं दिया गया। इसका एक मुख्य कारण रहा कि शिक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा संचालित होता है। जबकि सरकार का काम सिर्फ आवश्यक नीतियां बनाने का होना चाहिए, उनको अमली जामा पहनाने का नहीं। इससे काम नहीं बनेगा। जब कोई भी संस्था इस क्षेत्र में काम करने के लिए इच्छुक नहीं थी तो मूलभूत शिक्षा उपलब्ध कराने का काम सरकार द्वारा किया गया। यह बेहद महत्वपूर्ण है, कि आज कई उद्यमी और बिजनेसमैन शिक्षा के क्षेत्र में आने के इच्छुक हैं। आज शहरी आबादी में ज्यादातर दंपत्ति तीन से पांच बच्चों की बजाय एक या दो बच्चे पर आ गए हैं। इसका मतलब है कि अब उनके हाथ में पहले के बजाय खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा है।

जो लोग इसका खर्च नहीं उठा सकते, उनके लिए दूसरी तरह की शिक्षा व्यवस्था भी उपलब्ध होनी चाहिए, उन्हें शिक्षा से वंचित नहीं रखना चाहिए। लेकिन जिनके पास पैसा है, उन्हें अपने पैसे को ब्रांडेड कपड़े, विदेश यात्राओं या लग्जरी कारों में निवेश करने की बजाय उसे अपने बच्चों की शिक्षा में लगाना चाहिए।

 इसके विपरीत अगर हमने अपनी आबादी को अकुशल, लक्ष्य से भटकी हुई, अस्थिर और बिना प्रेरणा के छोड़ दिया तो यही आबादी हमारे लिए सबसे ज्यादा विनाशकारी साबित होगी।
आज अरबों डॉलर पैसा भारत से बाहर जा रहा है, क्योंकि लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बाहर भेज रहे हैं। आज तक हम अपने यहां शिक्षा का वह स्तर और जानकारी नहीं उपलब्ध करा पाए हैं, जो दुनिया की दूसरी जगहों पर उपलब्ध है। अगर हमें उच्च स्तरीय शिक्षा चाहिए तो हमें इसमें पैसा निवेश करना होगा। हम सरकार से इसकी अपेक्षा नहीं कर सकते। यह चीज आम लोगों और बिजनेसमैन की ओर से आनी चाहिए। किसी भी चीज में निवेश तभी होगा, जब उस क्षेत्र से लोगों को प्रतिफल मिलेगा। अगर आप कारोबार को शोषण का साधन नहीं बनाते तो यह कोई बुरी चीज नहीं है। शोषण को हटाने का तरीका कोई कानून नहीं हो सकता है, बल्कि अगर प्रतिस्पर्धा होगी और लोगों के पास फैसला करने का विकल्प होगा तो शोषण रुकेगा। प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करती है कि जिसके पास भी चीज अच्छी होगी, लोग उसी के पास जाएंगे। माता-पिता और स्कूल के बीच यह सहमति बननी चाहिए कि किस तरह की शिक्षा दी जाए।

फिलहाल बहुत सारे माता-पिता यह सोचते हैं कि एक बार उन्होंने अगर अपने बच्चों को स्कूल भेज दिया तो उनका कर्तव्य पूरा हो गया। यह सोच बदलनी चाहिए। अगर अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति आपकी ही कोई प्रतिबद्धता नहीं होगी तो फिर शिक्षकों को समर्पित क्यों होना चाहिए?

सृष्टि के बाकी प्राणियों के लिए प्रकृति ने दो सीमा रेखाएं तय की हैं, जिसके भीतर वे जीते और मरते हैं। इंसानों के लिए सिर्फ निचली रेखा होती है, ऊपर की कोई रेखा नहीं होती।
देश में यह नियम बन जाना चाहिए कि हर मां-बाप को अपने बच्चे के स्कूल में साल में कम से कम तीन बार जरूर जाना चाहिए और कम से कम एक दिन स्कूल में जरूर बिताना चाहिए। उनको इस बात की जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि स्कूल में किस तरह की शिक्षा दी जा रही है, कैसे यह शिक्षा दी जा रही है और उनके बच्चे क्या कर रहे हैं? हमें बच्चों की शिक्षा में उनके माता-पिता की भागीदारी की एक संस्कृति तैयार करनी चाहिए। बिना भागीदारी के कभी भी कोई सुंदर और अच्छी चीज घटित नहीं हो सकती। शिक्षा पद्धति एक ऐसी मशीनरी की तरह नहीं होनी चाहिए, जिसमें से होकर हमारे बच्चे बाहर आ जाएं। अभी तक हम लोग सिर्फ बच्चों को शिक्षित करने के बारे में सोचते रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज है कि शिक्षकों को लगातार विकसित होना चाहिए और निखरते रहना चाहिए। उनमें यह विकास सिर्फ पढ़ाने की काबिलियत के तौर पर ही नहीं आना चाहिए, बल्कि एक इंसान के तौर पर भी उनका विकास होना चाहिए। इसके लिए हमें अपने देश में साधन, प्रक्रियाएं और अवसरों का निर्माण करने की जरूरत है। बात सिर्फ एक विषय को पढ़ाने भर की नहीं है, बल्कि पढ़ाने की प्रक्रिया में पूरी तरह से तल्लीन, उद्यमशील, नयेपन से भरपूर, प्रेरणा देने वाला शिक्षक ही पढ़ाई को खूबसूरत बना सकता है। इसीसे यह तय होता है कि छात्र पढ़ाई में आनंद ले रहे हैं या नहीं।

चुंकि आज आधुनिक तकनीक के जरिए जानकारी मिलने लगी है, इसलिए जानकारी देने के मामले में एक शिक्षक अप्रासंगिक हो जाता है। ऐसे में शिक्षक से जिस चीज की अपेक्षा होती है, वह है प्रेरणा व प्रोत्साहन की। यह प्रोत्साहन महज वाक्पटुता या प्रवचनों से नहीं मिलता, बल्कि उसके लिए जीवंत उदाहरण सामने रखना होगा।

योग विज्ञान का मतलब ही है अपने शरीर और मन को अच्छी तरह से समझना और यह जानना कि कैसे उनका सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल किया जाए।
आप खुद एक प्रेरणा बनें। जैसे आप हैं, वही चीज़ प्रेरणा बन जाए। यह चीज शिक्षा प्रणाली और शिक्षकों की ट्रेनिंग में शामिल की जानी चाहिए कि शिक्षक शारीरिक व मानसिक तौर पर एक खास तरह की खूबियों से युक्त हों। बच्चे अपने शिक्षक को बड़े ध्यान से देखते हैं। हो सकता है कि शिक्षक जो कहे, विद्यार्थी उससे चूक जाएं, लेकिन आप जिस तरह से हैं, उससे जुड़ा कोई भी पहलू उनसे छूट नहीं सकता। शिक्षकों के शारीरिक व मानसिक कल्याण व संतुलन को देखना व उस पर काम करना बेहद जरूरी है। सिर्फ इतना ही नहीं, हमें इस प्रकृति के लोगों को पूरे समाज में स्थापित करना होगा। अगर हम लोगों ने प्रेरित इंसानों को तैयार नहीं किया तो हम अपने पीछे एक ऐसी पीढ़ी छोड़ेंगे, जो हमसे कमतर होगी। यह हर पीढ़ी की बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह अपनी अगली पीढ़ी को अपने से कम से कम एक कदम आगे ले जाए। अपने से कमतर पीढ़ी को तैयार करना मानवता के प्रति एक बड़ा अपराध है।

लोग अपने जीवन के कई साल शिक्षण संस्थानों में बिताते हैं। ये ऐसी जगह हैं, जहां हर चीज ढलती और आकार पाती है, इसलिए उनका अच्छा होना जरुरी है। आज जिस तरह की हमारी शिक्षा प्रणाली है, वह मोटे तौर पर औपनिवेशिक युग की याद दिलाती है। हमने उस शिक्षा प्रणाली में छोटे-मोटे बदलाव तो किए हैं, लेकिन हमने वास्तव में शिक्षा को पुनर्गठित नहीं किया है।

अगर आप सिर्फ अपने जीवनयापन के लिए पढ़ाई नहीं कर रहे, तो किसी भी सच्चे विद्यार्थी के लिए आध्यात्मिक प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है।
यह प्रणाली बुनियादी रूप से इस तरह से तैयार की गई थी, कि बच्चे बिना कोई सवाल किए आज्ञा-पालन करना सीखें। ये उस समय की उनकी जरूरत थी और यही उन्होंने किया भी। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को इस मौलिकता के साथ तैयार करना होगा जो हमारे हिसाब और जरूरतों के मुताबिक हो, क्योंकि हजारों सालों से यह धरती जिज्ञासुओं व साधकों की रही है। तमाम विदेशी आक्रमणों और दासता के बावजूद हमारी इसी खूबी ने हमारी संस्कृति को युगों-युगों तक संभाल कर रखा है। जिज्ञासा का मतलब ही एक सक्रिय प्रतिभा का होना है, जो कभी भी सीखना बंद नहीं करती। जिज्ञासा का मतलब मुक्ति या स्वाधीनता के मार्ग पर चलना है। शिक्षा को इसी गुण को विकसित करने में मदद करनी चाहिए।

अब समय आ गया है कि हम अपनी शिक्षा पद्धति के बारे में पुनर्विचार करें और उसे नए सिरे से तराशें, क्योंकि हमारे पास आर्थिक साधन आने वाले हैं। हमारे पास आज दुनिया तक पहुंचने का ऐसा मौका है जो अब से पहले कभी नहीं था और हमारे पास ऐसा नेतृत्व है, जो इन तमाम बदलावों को साकार करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है।

आध्यात्मिक प्रक्रिया का जो सार है, वह शिक्षा के क्षेत्र की आवश्यकता है, क्योंकि एक शिक्षार्थी को सक्रिय रूप से जिज्ञासु होना ही पड़ेगा।
इसके अलावा, हमारे पास संस्कारों का लाभ भी है। भारत के पास एक ऐसी प्रज्ञा है, जो अपने आप में अभूतपूर्व है। यह प्रतिभाशालियों की धरती रही है। आज हमारे पास जो शिक्षा प्रणाली है, उसकी कामना पश्चिमी संगठनों को तैयार करना है। भारत को संगठनों की जरूरत है, लेकिन हम बिना निजी प्रतिभाओं पर ध्यान दिए अपने सिस्टम को विकसित नहीं कर सकते। यह एक ऐसी चीज है, जिस पर हम सबको ध्यान देना चाहिए। बिना वैयक्तिक प्रतिभाओं के खिले, महान लोग हो ही नहीं सकते। जहां महान इंसान होंगे, केवल वही देश महान बन सकता है।

उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में सभी शिक्षकों के लिए एक सालाना प्रशिक्षण कार्यक्रम होता है। इसका मतलब हुआ कि प्रशासन की तरफ से शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का एक प्रसास किया जाता है। लेकिन सवाल है कि यह प्रशिक्षण देता कौन है? एक इतने विशालकाय सरकारी तंत्र को सुधारना और उसकी गुणवत्ता को बढ़ाना कोई रात भर में होने वाला काम नहीं है।

चाहे कोई विद्यार्थी हो या कोई कारोबारी, चाहे देश चलाना हो या दुनिया के अन्य सभी काम, जब हम बहुत ज्यादा लक्ष्य-केन्द्रित हो जाते हैं तो बस अंतीम नतीजा महत्वपूर्ण हो जाता है, जीवन नहीं।
हो सकता है कि शिक्षा विभाग इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की पूरी जिम्मेदारी किसी और को न सौंपना चाहे, लेकिन सफलतापूर्वक काम कर रही दूसरे शैक्षणिक संस्थाएं जैसे गैर सरकारी संगठन या यूनिवर्सिटी इस प्रशिक्षण की कुछ हद तक जिम्मेदारी अपने ऊपर ले सकती हैं। प्रशिक्षण में इस पहलू को शामिल किया जा सकता है कि शिक्षकों को शारीरिक व मानसिक तौर पर कैसे फिट रखा जाए। थोड़ा ध्यान, थोड़ा योग और ऐसी ही दूसरी चीजें उनके जीवनस्तर को बढ़ा सकती हैं। शिक्षक इसका लाभ ले सकते हैं, इन प्रशिक्षण में ये चीजें शमिल होने से शिक्षकों को प्रोत्साहन भी मिलेगा। हम एक ऐसी प्रणाली को शुरू किए जाने के बारे में भी विचार कर सकते हैं, जहां शिक्षक इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भागीदारी कर अंक भी ले सकते हैं, जिसे उनके वेतन बढ़ोतरी से भी जोड़ा जा सकता है। हालांकि ये सारे नीतिगत फैसले हैं, हम सिर्फ सुझाव ही दे सकते हैं। लेकिन प्रशिक्षण कार्यक्रम में दूसरे शैक्षणिक संस्थाओं को शामिल करने से निश्चित तौर पर एक निर्धारित समय में शिक्षण की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण रूप से सुधार आ सकता है।

आज सभी शिक्षकों का प्रशिक्षण पूरी तरह से संभव है। तकनीक के चलते आज हम वो सब करने में सक्षम हैं, जो अब से पहले किसी पीढ़ी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। अब समय आ गया है कि सत्य को मुख्यधारा बनाई जाए। जो चीज मुझे अनुभव की परम अवस्था में प्राप्त होती है, वह है मेरे अस्तित्व की सच्चाई। अगर आप और दूसरे लोग अपने अस्तित्व की सच्चाई को जान लेंगे, और अगर आप अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में होंगे तो फिर आप जो भी करेंगे, वह एक शक्तिशाली प्रक्रिया बन जाएगी। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शैक्षणिक लोगों, शिक्षकों व दूसरे लोगों के लिए हम रूपांतरण के साधन भेंट कर रहे हैं। आप अपने साथ कुछ कर सकते हैं, जो आपको अपने भीतर एक बेहतर जगह पहुंचा सकता है। मेरी कामना और मेरा आशीर्वाद है कि यह साकार हो।

प्रेम व प्रसाद,

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