संवेदनशील बनें बिना आध्यात्मिक विकास संभव नहीं है

संवेदनशील बनें बिना आध्यात्मिक विकास संभव नहीं है

सद्‌गुरुसद्‌गुरु हमें आध्यात्मिक विकास की एक बुनियादी जरुरत के बारे में बता रहे हैं। वे बताते हैं कि हम आम तौर पर अपने साथ होने वाली चीज़ों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं, पर अपने विकास के लिए हमें दूसरों के साथ होने वाली चीज़ों के प्रति भी संवेदनशील होना होगा।

जीवन में परफेक्शन जैसा कुछ नहीं होता

याद रखना चाहिए कि अगर कोई बाहरी चीज हमें तकलीफ नहीं देती है, तो हम खुद एक दूसरे को तकलीफ देना शुरू कर देते हैं।

 जीवन में आप कोशिश कर रहे हैं या नहीं, आप ईमानदार हैं या नहीं, बस यही मायने रखता है। जीवन के सन्दर्भ में परफेक्ट होने, न होने का सवाल कभी नहीं होता।
हम अपने परिवार, समाज, शहर या फिर देश के अंदर एक दूसरे को कई तरीकों से परेशान करना शुरू कर देंगे। हम एक दूसरे के बारे में गलत तरीके से राय कायम करने लगेंगे। बेशक अगर आप पर कोई ऐसी राय कायम करे, तो आपको अच्छा नहीं लगेगा, लेकिन फिर भी अपने आस-पास के हर इंसान के बारे में राय कायम करते रहेंगे। अगर आपको अपने आस-पास के हर इंसान में बहुत सारी कमियां दिखती हैं, तो दरअसल आप ही पूरी तरह गलत हैं। क्योंकि आपने जीवन की प्रकृति को नहीं समझा है। आप परफेक्शन की तलाश कर रहे हैं। लेकिन परफेक्शन का मतलब मृत्यु है। इंसान सिर्फ अपनी मृत्यु में ही परफेक्ट हो सकता है। जीवन में आप कोशिश कर रहे हैं या नहीं, आप ईमानदार हैं या नहीं, बस यही मायने रखता है। जीवन के सन्दर्भ में परफेक्ट होने, न होने का सवाल कभी नहीं होता।

दूसरों की गलतियां ढूंढते हुए मत फिरें

एक बार ऐसा हुआ कि एक महिला मांस की दुकान पर गई। वहां उसने दर्जनों मुर्गे लटकते हुए देखे। वह गई, एक मुर्गे का पैर उठाया, सूंघा। फि र दूसरा पैर उठाकर सूंघा। इसके बाद उसने पंख उठाकर सूंघा।

अगर आप एक बंद तालाब हैं, हर दिन किसी न किसी चीज में उलझे रहते हैं और चालाकी से अपने उलझने की वजहें खोजते रहते हैं, तो आपका जीवन व्यर्थ है। 
 इस तरह वह एक के बाद एक मुर्गे के साथ ऐसा करती रही। तभी कसाई उसके पास आया और उसके कंधे पर थपकी देकर बोला, ‘मैडम, क्या आप खुद ऐसे टेस्ट में पास हो सकती हैं?’

इसलिए आप सूंघते हुए मत घूमिए कि किसमें क्या बुराई है। सबमें थोड़ी-बहुत बदबू है। हर पेड़-पौधे की जड़ कहीं न कहीं कीचड़ में है। सवाल बस इसका है कि क्या उसमें खुशबूदार फूल आते हैं? अगर उसकी जड़ें साफ होंगी, तो उसमें कुछ भी अच्छा नहीं खिलेगा। जीवन की प्रकृति यही है। धरती पर हर चीज रूपांतरण की प्रक्रिया में है। क्या आप रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं? सबसे बड़ा सवाल यही है। अगर आपके इस सवाल का जवाब हां हैं, तो और कोई चीज मायने नहीं रखती। अगर आप एक बंद तालाब हैं, हर दिन किसी न किसी चीज में उलझे रहते हैं और चालाकी से अपने उलझने की वजहें खोजते रहते हैं, तो आपका जीवन व्यर्थ है। कोई दूसरा जीव आपके मुकाबले अच्छी तरह से जिएगा। एक कपटी इंसान से कहीं अधिक खुशहाल एक झींगुर हो सकता है।

हर रोज़ कुछ छोड़ना होगा

अगर आप किसी दूसरे जीव से बेहतर तरीके से नहीं जी सकते, तो आपको दुनिया में रहने का कोई हक नहीं है।

संवेदनशील न होना सबसे भयंकर अपराध है, क्योंकि अगर आप जीवन के प्रति संवेदनशील होते, तो जो करना आपके बस में है, उसे आप हर हाल में अच्छी तरह करते। 
 क्योंकि हमारा जीवन बहुत खर्चीला है। हमें खाने, सोने, काम करने के लिए कितनी सारी व्यवस्थाएं करनी पड़ती है। जूतों से लेकर कपड़ों और घर तक, हमें कितना कुछ जुटाना पड़ता है। इतने खर्च के बाद आपको बाकी जीवों से कुछ बेहतर तो करना ही चाहिए। इंसान ने बहुत सी बढिय़ा चीजें की हैं, मगर हर बढिय़ा चीज के साथ हमने कम से कम एक भयानक चीज जरूर की है। आध्यात्मिक प्रक्रिया का मतलब है कि आप रोजाना अपनी भयानक चीजों को कम कर रहे हैं। एक भयानक विचार, एक भयानक भाव, एक भयानक शब्द, एक भयानक काम, हर दिन एक को कम करते जाइए और एक-दो महीनों में आप बेहतर इंसान होंगे। इंसानों की सबसे भयानक चीज यह है कि वे अपने आप में कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहते हैं। उन्हें किसी दूसरे जीवन की पीड़ा और कष्ट से कोई लेना-देना नहीं होता। संवेदनशील न होना सबसे भयंकर अपराध है, क्योंकि अगर आप जीवन के प्रति संवेदनशील होते, तो जो करना आपके बस में है, उसे आप हर हाल में अच्छी तरह करते। जो आप नहीं कर सकते, वो नहीं होगा – बस इतनी बात है।

संवेदनशील बनना होगा

एक सूडानी व्यक्ति अपना ऊंट बेचने के लिए मोरक्को गया, जहां मारकेश में एक मशहूर ऊंट बाजार था। उसने देखा कि बाजार में जितने ऊंट थे, वे सभी उसके ऊंट से ज्यादा ऊंचे और तगड़े थे।

आप अपने साथ होने वाली चीजों के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं, मगर दूसरों के साथ क्या होता है, इससे आपको कोई मतलब नहीं होता है। इस स्थिति में इंसान की सबसे बेहतर प्रकृति व्यक्त नहीं हो सकती। आपको संवेदनशील होना होगा।
फि र उसने लंबे-तगड़े ऊंटों के साथ बैठे एक आदमी से पूछा, ‘आपके ऊंट इतने हट्टे-कट्टे और मेरा ऊंट उनसे आधा क्यों है?’ वह आदमी बोला, ‘मामूली सी बात है। मैंने देखा कि आपके ऊंट की बधिया नहीं हुई है। आप अपने ऊंट की बधिया कर दो, वह और बड़ा हो जाएगा।’ उसने पूछा, ‘ये कैसे किया जाता है?’ वह आदमी बोला, ‘बहुत आसान है। दो ईंट लेकर ऊंट के अंडकोषों को चूर-चूर कर दो, फि र वह बहुत तगड़ा हो जाएगा।’ उसने पूछा, ‘दर्द नहीं होगा?’ आदमी बोला, ‘बिल्कुल नहीं। मैं तुम्हें करके दिखाता हूं।’ फि र वह एक ऊंट को लेकर आया, दो ईंट लेकर उसके अंडकोषों को जोर से कुचल दिया। ऊंट पीड़ा में कराहते हुए भागने लगा। फि र सूडानी ने पूछा, ‘तुमने तो कहा था कि दर्द नहीं होगा?’ ‘दर्द सिर्फ  तभी होगा, अगर आपकी ऊंगली ईंटों के बीच में आ जाए।’

आप अपने साथ होने वाली चीजों के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं, मगर दूसरों के साथ क्या होता है, इससे आपको कोई मतलब नहीं होता है। इस स्थिति में इंसान की सबसे बेहतर प्रकृति व्यक्त नहीं हो सकती। आपको संवेदनशील होना होगा। मैं जानता हूं कि दुनिया में संसाधनों के लिए, हर चीज के लिए प्रतियोगिता है और थोड़ा-बहुत टकराव होता ही रहेगा। मैं इन चीजों से बेखबर नहीं हूं, मगर आपको कम से कम अपने अंदर होने वाले टकराव को खत्म करना चाहिए। आपके विकास के लिए यह बहुत अहम है कि आप अपने आस-पास मौजूद हर जीवन के प्रति संवेदनशील बनें।


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