वही खूबियां आप में तब्दील हो जाएंगी

devotion

भक्ति कुदरत की तरह है। कुदरत देने में कंजूसी नहीं करती, वह हर चीज में अपने आपको पूरी तरह से समर्पित कर देती है, कुदरत की हर चीज अपनी पूरी क्षमता से देना जानती है। जबकि मनुष्य बचत करने का प्रयास करता है। चूंकि इंसान खुशी, अपना प्यार और वह सारी बातें, जो उसके लिए बेहद प्रिय व मायने रखती हैं, उन्हें बचाने की कोशिश करता है, इसलिए उसे कई तरहा का आडम्बर करना पड़ता है। अगर मनुष्य सिर्फ चुपचाप बैठकर पूर्ण आनंद में जा सके तो फिर उसे अपना सारा ध्यान रात के खाने और पीने के इंतजार में नहीं लगाना पड़े। लेकिन मनुष्य ने जीवन के प्रति अपना स्वभाव ही ऐसा बना लिया है कि वह हर वक्त अपने को बचाने की कोशिश करता है। हर वक्त इंतजार करते रहता है। कब रात होगी और कब खाना मिलेगा? मेरी लिए शराब की व्यवस्था कब होगी? मेरी व्हिस्की कब आएगी? अगर मनुष्य हर पल अपने आप को आनंद में सरोबार पाता, प्यार में डूबा पाता, भावातिरेक में खो गया होता तो उसका मन रात के खाने, शराब, यौन सुख या किसी अन्य भौतिक सुख के इंतजार में व्यर्थ चिंतन करते हुए व्यतीत नहीं होता। इन भौतिक सुख के सोच में मनुष्य अपने जीवन का ज्यादातर समय बरबाद नहीं करता।

भक्ति होता ही ऐसी है, जिसमें आपको आत्मसंचयन यानी खुद को बचाने की अपनी हर हद और चारदीवारी गिरा देनी होती है और अपने आपको अपनी सर्वाधिक सीमा तक बहने देना होता है। अगर आप किसी के भी प्रति समर्पित होकर एक बार अपने अस्तित्व के ठोस ढांचे को गिरा देते हैं तो सहसा आप पाएंगे कि जिसके प्रति भी आप समर्पित हैं, उसकी खूबियां आपके भीतर प्रतिबिंबित हो उठेंगी और वहीं खूबियां आप में तब्दील हो जाएंगी। मैंने इसे अपने जीवन में कई रूपों में बेहद नाटकीय ढंग से घटते देखा है। चाहे वह लेखक हों, वैज्ञानिक, खिलाड़ी, घरेलू महिला या कोई अन्य व्यक्ति क्यों न हो, अगर वह अपने काम को पूरे समर्पण के साथ करता है तो उसमें अलग तरह की खूबियां नजर आने लगती हैं।

मैंने इसका एक बेहतरीन उदाहरण देखा है। अपने यहां एक महिला संत हुई हैं। चूंकि वह बोलती नहीं थीं, अतः कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आई थीं। लेकिन उनके चेहरे-मोहरे को देखकर लगता था कि वह नेपाल से आई थीं। वह दक्षिणी भारत के छोर पर बसे शहर कन्याकुमारी में रहती थीं। वह अकसर सड़कों पर घूमती रहतीं और कुत्तों को खाना खिलातीं। इस तरह से उनके आस-पास कुत्तों का एक पूरा परिवार खड़ा हो गया। यहां तक कि जब वह वह खुद खाना नहीं खाती, तब भी कुत्तों को खाना खिलाती थीं। दरअसल, वह कुत्तों से बेहद प्रेम करती थीं। वह जहां भी जातीं, दस बारह कुत्ते हमेशा उनके पीछे लगे रहते। कभी-कभी तो वह इस हद तक पहुंच जातीं कि किसी भी रेस्टोरेंट में जाकर बिना पूछे खाना उठा लेतीं या झपट लेतीं और फिर उसे सड़क पर कुत्तों के सामने डाल देतीं, ताकि वे उसे खा सकें। दक्षिण भारत के रेस्टोरेंटों में अकसर सामने में कुछ खाद्य पदार्थ मसलन वड़ा, मिठाई व लड्डू वगैरह कांच के शोकेस में प्रदर्शित करने का चलन है। जब किसी की नजर नहीं हुई या कोई वहां नहीं हुआ तो वह इन चीजों को उठाकर कुत्तों को दे देतीं और इससे कुत्ते अपनी भूख मिटाते थे।

धीरे-धीरे लोगों को उनकी यह हरकत अखरने लगी। लोगों को जब उनका व्यवहार गैर जिम्मेदार और संत की तरह नहीं लगा तो उन्होंने उस संत को सामाजिक रूप से प्रताड़ित करना और दुत्कारना शुरू कर दिया। उन्हें  लगता कि वह संत की मानक परिभाषा पर फिट नहीं बैठ रहीं। इसकी चलते उन्हें कई बार काफी अशोभनीय और नागवार सामाजिक हालातों का सामना करना पड़ा। लेकिन तभी लोगों ने उन्हें कभी-कभी महासागर की लहरों पर तरते या बहते पाया। लोगों ने देखा कि वह आराम से पानी पर बैठी हुई हैं और पूरे महासागर में इधर उधर स्वयं बह रही हैं। जब वह वापस किनारे पर आना चाहती तो खुद तैर कर किनारे तक पंहुच जातीं, वर्ना वह पानी पर यूं ही तरते हुए महासागर में घूमती रहतीं। लोगों ने जब यह सब देखा तो उन्होंने उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। कुछ लोग उनके आसपास इकठ्ठे होना शुरू हो गए, लेकिन वह बिना कुछ बोले मौन ही रहतीं। जब वह चलतीं तो कुछ लोग उनके पीछे लग जाते। अगर वह बैठतीं तो उनके साथ के लोग भी बैठ जाते।

समय बीतेने पर जब वह वृद्ध हो गईं तो कोई उन्हें लेकर सेलम आ गया। यह जगह कोयंबटूर से नजदीक है। उसके बाद से फिर वह सेलम में ही रहीं और उन्होंने वहीं अपनी देह छोड़ी। लोग उन्हें माया मां के नाम से जानते थे। उस जगह पर उनके शिष्यों ने उनकी एक समाधि बना दी। कुछ समय पहले ऐसा हुआ कि मैं सेलम के पास एक हिल स्टेशन पर ठहरा हुआ था, तभी किसी व्यक्ति ने मुझे उनकी तस्वीर दिखाई। जैसे ही मैंने तस्वीर देखी, मैं बोल पड़ा- ‘मुझे वहां जाना है।’ मैं, मेरी पत्नी विजी और मेरी बेटी राधे, जो उस समय पांच साल की थी, तीनों कार से वहां पहुंचे। वह जगह गजब की मस्ती से गुंजायमान थीं। मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा, ‘वाह, जो कभी नहीं बोला, उसके लिए यह जगह बेहतरीन है।’ वह जगह वाकई अपने आप में अद्भुद थी।

जिस दिन हम वहां पहुंचे, उस दिन पूर्णिमा थी। उनके कुछ भक्तों ने हमें प्रसाद लेने के लिए शाम तक रुकने के लिए कहा। मैंने कहा- अवश्य रुकेंगे। राधे उस समाधि के पास ध्यान लगाकर बैठ गई। उसकी आंखें बंद थीं, शरीर निश्चल और सिर हिल रहा था। दरअसल, उस स्थान में चुंबक जैसा आकर्षण था। पांच साल की बच्ची भी उसे महसूस पा रही थी, जिसने उसे अपने प्रभाव में बांध रखा था। यहां सबसे अच्छी बात जो हुई वह यह थी कि माया मां का एक भक्त मेरे सामने आया, जिसका चेहरा  बिल्कुल माया मां के चेहरे में रूपांतरित हो चुका था। माया मां के चेहरे की बनावट पूरी तरह से नेपाली थी, न कि दक्षिण भारतीय। जैसे ही मैंने उस व्यक्ति की ओर देखा तो मेरे आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली – यह उच्च कोटी का भक्त है। माया मां किसी और जाति की थीं, जबकि उनका भक्त दक्षिण भारतीय, फिर भी उसका चेहरा माया मां के चेहरे में तब्दील हो गया। उसे देखना अपने आप में काफी अद्भुद अनुभव था।

भक्ति होती ही कुछ ऐसी है। अगर आप अपने बनावटी ढांचे को तोड़कर किसी दूसरी चीज में पूरी तरह से डूब जाते हैं और अगर वह चीज काफी प्रभावशाली होती है तो उसकी छाप आप पर पड़ना तय है। भक्ति का भाव भी यही है कि आप वही बन जाएं। आप जो भी चाहते हैं, वह चीज अगर आप में प्रतिबिंबित होने लगती है तो वह इसलिए, क्योंकि आप उसके लिए खुद को पूरी तरह से खोल चुके होते हैं।

अगर आप में थोड़ी सी भक्‍ति हैं, चलिए हम इसे प्रेम संबंध का नाम दे देते हैं…. मेरे और आपके बीच थोड़ा प्रेम संबंध है। ऐसे में आप कभी भी इससे उबर सकते हैं। अगर आप मेरे प्यार में पड़ रहे हैं तो आप कभी भी इससे उबर सकते हैं या बाहर निकल सकते हैं। में उम्मीद करता हूं कि कि आप कभी बाहर नहीं निकलें। अगर मैं आपकी उम्मीदों को पूरा नहीं करता, अगर मैं आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप बात नहीं करता या व्यवहार नहीं करता तो आप देखेंगे कि कुछ दिनों में हमारा यह प्रेम संबंध खत्म हो जाएगा। इसलिए अल्पता हमेशा खतरनाक होती है। इसे आप बचाने की कोशिश मत कीजिए, क्योंकि इसे आप बचाकर कहीं नहीं ले जा पाएंगे। आप इस जीवन को और कहीं नही ले जा सकते। इसे (जीवन को) कहीं और ले जाने की बजाय अब आपको इसे यहीं पूरी तरह से खिलने देना होगा। इसलिए जीवन की सुगंध को बचाकर रखने की कोशिश मत कीजिए। जिन्होंने इसे बचाकर संभालकर रखा, उनका जीवन इसकी दुर्गंध से गंधाने लगा। जिन्होंने इसे बाहर खुला छोड़ दिया, उनके जीवन को आप महकता हुआ पाएंगे।

प्रेम व प्रसाद,

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