उत्साह-हीनता आत्म-हत्या जैसा है

अमेरिका के टेनेसी शहर से सद्गुरु अपना आज का स्पॉट लिखते हुए बता रहे हैं कि जीवन में उत्साह कितना महत्वपूर्ण है। साथ ही अमेरिका के हालात की चर्चा भी कर रहे हैं :

सद्‌गुरुसद्‌गुरु :यहां ईशा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इनर साइंसेज (आई. आई. आई.) में रात का तापमान -10 डिग्री सेल्सियस से नीचे पहुंच चुका है। सर्दियों का रूखापन हमारे स्वयंसेवियों के उत्साह और ऊर्जा से ठीक उल्टा है। वे सभी – 1100 से ज्यादा लोग – 3 दिवसीय सत्संग के लिए यहां इकट्ठे हुए हैं। ईशा का सौभाग्य है कि हम हमेशा जीवंत और अत्यंत प्रेरित लोगों के बीच होते हैं। जिस वातावरण में उत्साह और जीवंतता की कमी हो, वहां मैं नहीं रह सकता, लेकिन हमारे स्वयंसेवी हमेशा एक ज्वलंत माहौल रच देते हैं। जीवन की ज्वाला में कमी होना धीरे-धीरे आत्महत्या करने के सामान है। मैं जीवन के हर मोर्चे पर हमेशा तेज़ी और कुशलता रखने का समर्थक रहा हूं। 

जीवन की ज्वाला में कमी होना धीरे-धीरे आत्महत्या करने के सामान है।

पिछले दो हफ़्तों के सफ़र और काम के प्रवाह ने मुझे एक हफ्ता आन्ध्र प्रदेश में, 2 दिन ईशा योग केंद्र, और दो दिन मुंबई में व्यस्त रखा – अब यहां आई. आई. आई. में आने पर मेरा जीवन शांत गति से बह रहा है। मैं बस बैठ कर पर्वतों और दूर फैली पहाड़ियों को भी देख सकता हूँ – ये सब सुख, काफी पहले ही लगातार चल रहे काम ने मुझसे छीन लिए थे। अगर थोड़ा सा समय मिल जाता है, तो मैं कुछ कविताएं रचने की इच्छा भी कर लेता हूं। बस एक ही दिन और है, उसके बाद मैं फिर यात्रा करूंगा।

पिछले कुछ दिन, लैप ऑफ़ द मास्टर कार्यक्रम में लोगों ने बहुत अच्छे से भाग लिया। और सबसे बड़ी बात ये है, कि बहुत से लोग तीव्रता और जबरदस्त क्षमता वाले सच्चे खोजी बन रहे हैं। अब समय आ गया है कि मैं इनके साथ कुछ वक़्त बिताऊँ। वैसे तो अमेरिका में आध्यात्मिक खोज की परंपरा नहीं है, पर ये लोग अद्भुत तरीके से, और जबरदस्त संभावनाओं के साथ रूपांतरित हो रहे हैं।

साल 2016 में ईशा का ध्यान काफी हद तक अमेरिका पर केन्द्रित होगा।

साल 2016 में ईशा का ध्यान काफी हद तक अमेरिका पर केन्द्रित होगा। पहली पुस्तक जो विशेष रूप से अमेरिका के लिए रची गयी है, वो सितम्बर में प्रकाशित हो रही है। बहुत से अन्य समारोह होने वाले हैं, और सबसे बढ़कर ये कि आदियोगी स्थल का प्रभाव पूरी उत्तरी अमेरिका के लोगों पर पड़ना शुरू हो गया है।

अब आपको मेरी कविताओं को झेलना पड़ेगा – मैं आई. आई. आई. में हूँ।

अल्प-निद्रा का मौसम

यद्यपि पुष्प-रहित शीतकाल

बना देता है सूर्य को उदास, नहीं मिलता

उसे जो रंगीला-अभिनंदन. तथापि

वह चमकता है तीव्रता से – क्योंकि

पता है उसे – वही है स्रोत

पत्तियों का व फूलों का।

रंगीनी व फीकापन तो हैं बस

बदलते मौसम की पहचान।

जैसे होती है जीवन की मिठास – तर्क-परे।

अनाच्छादित धरती व ठंड तैय्यारी करते हैं

चमकीली व गर्म बसंत-ऋतु की,

क्योंकि पत्तियाँ व फूल अपनी मौसमी निद्रा से

निकल ही आयेंगे,

जो शीत को सह लेता है – चमकते हुए

निश्चित ही वह पाएगा फूल और फल।

अनाच्छादितता बदल जाएगी खिली-खिली धरती में –

कहीं सो न जाना – इस अल्प-निद्रा के मौसम में।

प्रेम व प्रसाद,

 

 


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