उतना मजबूत बनाएं जितना जीवन को बनाया जा सकता है


यह सही है कि तकनीक ने हमारे जीवन को बहुत आरामदायक बना दिया है, और हर आने वाले दिन और आरामदायक बनाते जा रहा है। तकनीकी विकास के क्या बुरे नतीजे हो सकते हैं? सद्‌गुरु आज के स्पॉट में हमें आगाह कर रहे हैं कि अगर हमने अभी भी ध्यान नहीं दिया तो कैसे हम खुद को विनाश के कगार पर ले कर चले जाएंगे – 

इस बात के आज पुख्ता वैज्ञानिक सबूत सामने आ चुके हैं कि किसी परिवार में एक ही पीढ़ी में जेनेटिक संरचना या वंश से आने वाले लक्षण बदल सकते हैं, उसमें गिरावट आ सकती है। ऐसा इसलिए नहीं होता कि हमारे जीन में कमजोरी आ जाती है, बल्कि इसकी वजह है कि हमारे भीतर कमजोरी आ जाती है। अब अगर हम कमजोर हो गए हैं तो हमारी अगली पीढ़ी भी कमजोर होगी, अगर उसने इस कमजोरी को दूर करने की कोशिश नहीं की। बेशक कोशिश से यह कमजोरी दूर हो सकती है, लेकिन सवाल है कि क्या वाकई यह किया जाएगा।

हो सकता है कि एक वक्त ऐसा आए कि आप अपने बैठक-कक्ष से बेडरूम तक और अपने बेडरूम से ऑफिस तक जाने के लिए इलेक्ट्रिक कार का इस्तेमाल करें। तब सबकुछ बस एक बटन को छूने भर से हो जाएगा। हो सकता है कि कुछ समय बाद टच बटन टेक्नोलॉजी भी पुरानी पड़ जाए। फिर ऐसी तकनीक होगी कि आपके बोलने भर से काम होने लगेगा। तब आपको अपने शरीर और दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा। जाहिर है, अगर ऐसा होता है तो एक ही पीढ़ी में हमारे भीतर काफी गिरावट आ जाएगी। और इसकी शुरुआत काफी खतरनाक ढंग से पहले ही हो चुकी है। ऐसी बहुत सी चीजें जो हम बचपन में बड़ी आसानी से कर लिया करते थे, उन्हें करना आज के बच्चें के लिए किसी सर्कस के करतब सा हो गया है। बस कुछ एथलीट या खिलाड़ी टाइप के लोग ही उन कामों को आज कर पाएंगे।

पिछले दिनों मैं चेन्नई के कुछ ऐसे लोगों के एक समूह से बात कर रहा था, जिन्हें अपनी फिटनेस पर बड़ा गर्व था। वे सब रोजाना ट्रेड मील पर चलते थे, साइकिलिंग करते थे, वहां की ज्यादातर महिलाएं साइज जीरो में नजर आ रही थीं। उन सबका मानना था कि वे पूरी तरह से फिट हैं। मैंने उन लोगों से एक आसान सा सवाल पूछा कि मान लीजिए कि आप सड़क पर जा रहे हैं और सामने एक शेर आ जाता है तो आपमें से कितने लोग पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचा सकते हैं? आज केवल वही ये काम कर सकते हैं, जो मजदूरी का काम कर रहे हैं मसलन सड़क या घर बना रहे हैं या फिर गढ्ढा खोद रहे हैं। इस पर वहां मौजूद सभी लोग सहमत नजर आए। वे लोग देखने पर भले ही फिट नजर आ रहे हों, लेकिन भीतर से मूल रूप से मजबूत नहीं थे। उनके भीतर जीवन के धागे या रेशे बहुत कमजोर हो चुके थे और यह कमजोरी बहुत तेजी से आ रही है। जैसे – जैसे तकनीक आपको अपना शरीर और दिमाग का कम इस्तेमाल करने पर मजबूर कर रही है, वैसे – वैसे यह मामला गंभीर होता जा रहा है। हम किसी बम, आग या दंगों से खुद को खत्म नहीं करेंगे, बल्कि इसी तरह खुद को नष्ट कर लेंगे। अगर हम ऐसे ही कमजोर होते गए तो हममें जीने की ताकत नहीं बचेगी और हम खुद ब खुद मिट जाएंगे।

आजकल अस्सी साल से अधिक उम्र के ऐसे काफी लोग हैं जो जीवन – रक्षक उपकरणों यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे चल रहे हैं। अगर हमारा कमजोर होना ऐसे ही जारी रहा तो अगले पचास सालों में हो सकता है कि जीवन रक्षक उपकरणों पर जिंदा रहने की नौबत अस्सी की बजाय दस-पंद्रह साल पहले ही आ जाए। इंसान की बनावट व शरीर के कमजोर होने की यह स्थिति गंभीर रूप ले रही है। जाहिर है कि अगली पीढ़ी इसी जैनेटिक संरचना को हासिल करेगी। यह भी एक वजह है कि हमने अमेरिका में 1300 एकड़ की जमीन पर यह योग केंद्र स्थापित किया है। हालांकि उस वक्त ज्यादातर लोगों ने यही कहा था कि सद्‌गुरु यह एक सनक ही है। हमे योग केंद्र के लिए इतनी जमीन लेने की बजाय अटलांटा के पास पच्चीस एकड़ जमीन ले लेनी चाहिए। लेकिन इस आश्रम का मकसद सिर्फ योग व ध्यान केंद्र स्थापित करना नहीं था, बल्कि इसका मकसद जीवन को पुनः जीवित करना व फिर से उर्जावान बनाना था।

मैं चाहता हूं कि आपमें से ज्यादा से ज्यादा लोग जमीन से जुड़कर रहें, जमीन पर काम करें और अपने भीतर से इतने मजबूत बनें, जितना जीवन जीने के लिए मजबूत होना चाहिए। तब आप अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया भी जारी रख सकते हैं और जीवन को वैसा बना सकते हैं, जैसा जीवन होना चाहिए। न कि जीवन को वैसा बनाएं, जैसा यह न्यूयॉर्क या दुनिया के किसी भी आधुनिक कोने में है। जीवन को मजबूत बनाने की कोशिश कीजिए।

अगर हमने आज ऐसा नहीं किया तो आने वाले समय में मानवता के बारे में हमारे पास कहने के लिए कुछ खास नहीं बचेगा। मैं यह नहीं कर रहा हूं कि एक आश्रम ऐसा करने के लिए काफी है, इसे करने के लिए ऐसे तमाम आश्रमों या जगहों की जरूरत है। इसके लिए हमें जमीन की तरफ वापस लौटना होगा। हमें पांच बुनियादी तत्वों के साथ रहना होगा और खुद को मजबूत बनाने के लिए जमीन, बरसात और आकाश के संपर्क में रहना होगा। जीवन की शक्ति सिर्फ आपके शरीर के भीतर ही नहीं है, बल्कि यह हर तरफ है। इन पांच मूलभत तत्वों से रोजमर्रा के जीवन में संवाद और संपर्क स्थापित किए बिना जीवन मजबूत नहीं बन सकता। हमें मजबूत बन कर रहने जरूरत है। यह मकसद योग से पूरा किया जा सकता है। योग से हम अपने भीतर जीवन जीने के लिए जरूरी मजबूती को पा सकते हैं।

जैसे – जैसे तकनीक आपको अपना शरीर और दिमाग का कम इस्तेमाल करने पर मजबूर करती है, वैसे – वैसे यह मामला गंभीर होता जाता है। हम किसी बम, आग या दंगों से खुद को खत्म नहीं करेंगे, बल्कि इसी तरह खुद को नष्ट कर लेंगे। अगर हम ऐसे ही कमजोर होते गए तो हममें जीने की ताकत नहीं बचेगी और हम खुद ब खुद मिट जाएंगे।

प्रेम व प्रसाद,

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