टेनेसी में ‘अर्थडे’ का आयोजन


टेनेसी में वसंत की शुरुआत हो चुकी है और इसने ‘अर्थडे’  जिसे आप ‘धरतीदिवस’ भी कह सकते हैं, मनाने के लिए बिल्कुल सही माहौल बना दिया है। टेनेसी का हमारा केंद्र 1300 एकड़ में फैला है, जिसमें तकरीबन 300 फुट चौड़ा एक गरजता हुआ झरना और एक खूबसूरत व चुनौती पूर्ण पथरीला इलाका है। इसलिए हमने सोचा कि ज्यादा से ज्यादा स्थानीय लोग व दूसरी जगह से आने वाले लोग इसका आनंद ले सकें। इसी को देखते हुए हमने इस शानदार पठार पर पैदल चलने और माउंटेन बाइकिंग जैसी गतिविधियों की शुरुआत की।

… जमीन को अपने हिसाब से ढालने की बात कहने से पहले एक बात समझना जरूरी है कि इस धरती पर कदम रखने के पहले दिन से ही हम लोगों ने एक दल के रूप में काम किया है; इसलिए हमें दल के रूप में काम करना होगा, न कि इस धरती को अपने हिसाब से ढालकर।
‘धरतीदिवस’ के आयोजन के पीछे मकसद यह है कि लोगों में जागरूकता लाई जा सके कि इस धरती पर जो मानव जाति ने बोझ बढ़ा रखा है, उसे कम करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? आज हमारी शारीरिक सुख व संतुष्टि के लिए, जिस धरती पर रहते हैं, उसी को बुरी तरह बरबाद करने पर तुले हुए हैं। और कमाल की बात ये है कि ये सब हम मानव की भलाई और खुशी के नाम पर कर रहे हैं।अगर मानव जाति- हम सब इस बात को अच्छी तरह नहीं सीख और समझ लेते कि मानव का स्वास्थ्य, उसका कल्याण और उसकी खुशी- सब कुछ भीतर से आती है, तो फिर हमारी हालत उस आदमी की सी होगी जो उसी डाल को काट रहा था जिस पर बैठा था। सोचिए जरा उस आदमी की हालत- अगर वह अपनी डाल को काटने की कोशीश में सफल हो जाता है तो जीवन भर के लिए, अपने जीवन से ही असफल हो जाएगा।

इस मौके पर एक जाने माने रेडियो पत्रकार बिल जेकमैन से हुई मेरी बात चीत, उस आयोजन का एक अहम हिस्सा रही। इस बातचीत का अंश आपके लिए भी पेश है। मेरी कामना है कि आप सब अपने अस्तित्व के आनंद को समझें, जो निसंदेह इस धरती पर विनम्रता पूर्वक चलने के लिए आपको प्रेरित करेगा।

प्रेम व प्रसाद,

सद्‌गुरु और बिलजेकमैन के बीच हुई बातचीत  के  संक्षिप्त अंश:

बिलजेकमैन: सद्‌गुरु, ‘अर्थडे’ (‘धरतीदिवस’) वो मौकाहै, जब हम धरती और कुरदती माहौल के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। आज सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों में भी जो राजनैतिक विचार धाराएं हैं, वो प्रकृति के संरक्षण और अपने मौजूदा प्राकृतिक संसाधनों के विवेक पूर्ण इस्तेमाल की कोशिशों को पीछे धकेलर ही हैं। क्या आप इसकी वजह स्पष्ट कर सकते हैं?

सद्‌गुरु: संभवतः इसके पीछे सांस्कृतिक व ऐतिहासिक वजह है। कुछ सौ साल पहले जब लोग यूरोप से अमेरिका की धरती पर आए तो उनका यहां की धरती के साथ वैसा रिश्ता नहीं था, जैसा यहां के मूल निवासियों का था। दरअसल, उन्होंने सोचा होगा कि यहां की जमीन के साथ अपना एक रिश्ता या जुड़ाव बनाने की बजाय इस धरती को अपने अधीन अपने हिसाब से कर लिया जाए। वे एक विजेता के हिसाब से यहां आए। मुझे लगता है कि मानसिक रूप से हम अभी भी उस मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं। हालांकि आज यहां विरोध स्वरूप तमाम लाल झंडे नजर आने लगे हैं, जो कई चीजें बयां करते हैं, जिन्हें एक दृष्टि हीन व्यक्ति भी देख सकता है। हम यह समझ बैठे हैं कि चीजों को जीतना और उन्हें अधीन करना ही सब कुछ होता है। दरअसल, यहां यह कहा गया ‘हमने जमीन को अपने हिसाब से घुमा दिया।’ यानी जमीन को अपने हिसाब से ढाल लिया। लेकिन जमीन को अपने हिसाब से घुमाने और अपने हिसाब से ढालने की बात कहने से पहले एक बात समझना जरूरी है कि इस धरती पर कदम रखने के पहले दिन से ही हम लोगों ने एक दल के रूप में काम किया है, इसलिए हमें दल के रूप में काम करना होगा, न कि इस धरती को अपने हिसाब से ढालकर।

बिलजेकमैन: अगर आपकी बातों पर हम दोबारा गौर करें तो मुझे लगता है कि आपका कहने का सही आशय ‘लगातार चलने वाली लेन-देन की प्रक्रिया से है।’  दरअसल, जब हम सांस छोड़ते हैं तो उससे कार्बन डाइआॅक्साइड निकलती है, जिसे पेड़ पौधे ग्रहण करते हैं, जिसके बदले में वे आॅक्सीजन छोड़ते हैं, जिसे हम सांस के तौर पर ग्रहण करते हैं। क्या आपको लगता है कि अमेरिकी समाज पहले की अपेक्षा अब पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहा है।

सद्‌गुरु: इसकी शुरुआत तो हुई है, लेकिन वह काफी धीमी है। इस शुरुआत की गति और मात्रा उनती ज्यादा नहीं है, जितनी होनी चाहिए। आप यह नहीं कह सकते कि ऐसा नहीं हो रहा है, चीजें हो रही हैं। लेकिन इनकी गति इतनी ज्यादा नहीं है कि इसका असर इसी पीढ़ी पर दिखाई दे सके। देखिए, चीजों का पुनः इस्तेमाल करना, एक खास तरह की कार का इस्तेमाल करना, पर्यावरण से जुड़े कुछ कदम उठाना जैसी चीजें लोगों में जागरूकता फैलाने के लिहाज से तो ठीक हैं, लेकिन यह बतौर एक समाधान काफी नहीं हैं। यह कोई हल नहीं हैं। ये कोशिशें बस लोगों को सचेत कर रही हैं। जब लोग जरूरत न होने पर बिजली बंद कर देते हैं या पेड़ रोप देते हैं तो इनसे कोई हल नहीं निकलता, बस इनके जरिए हम आपदा को थोड़ा आगे सरका देते हैं।


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