न्याय जैसी कोई चीज नहीं है

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इस धरती पर न्याय जैसी कोई चीज नहीं है। जो आपके लिए न्याय होगा, वह किसी और के लिए अन्याय होगा। आमतौर पर न्याय शब्द का इस्तेमाल किसी से बदला लेने के लिए किया जाता है। भले ही यह न्यायिक बदला हो या अन्यायपूर्ण बदला। अगर कोई व्यक्ति किसी की हत्या करता है या उसे मारता है तो वह सोचता है कि उसने उस व्यक्ति के साथ वही किया, जिस लायक वह था। इसीलिए वे ऐसा करते हैं। अतः हम न्याय की बात नहीं कर रहे। पहले तो हम कानून को आसान बनाएं और उन्हेंह लागू करें। फिलहाल तो किसी को न्याय के बारे में सोचेने का अधिकार नहीं है। पहले हम कानून को मानने वाला एक समाज बनाएं, उसके बाद न्याय की बात करें। जब कभी कानून क्रूर हो तो हम उस कानून को तोड़कर न्याय देने की बात करें। लेकिन आज के जिस हालात में अपना देश है, उसमें तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकते। यहां तो पहले कानून पर अमल होना चाहिए। अगर सीधे शब्दों में कहें तो पहले कानून लागू हो, भले ही अन्यायपूर्ण ढंग से क्यों न हो, लेकिन उनका लागू होना जरूरी है। दरअसल, किसी भी समाज में एक समुचित व्यवस्था के बिना न्याय जैसी बात आ ही नहीं सकती। आज जब किसी तरह की कोई व्यवस्था ही नहीं है तो फिर न्याय का सवाल ही कहां पैदा होता है? आज तो बदले को न्याय का नाम दिया जाता है।

सवाल है कि आखिर समाज में बदलाव कैसे लाया जाए? इस दिशा में जो सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा, वह है जटिल कानूनों को आसान बनाना। अगर आप इस देश मे रहना चाहते हैं तो हर व्यक्ति को अपने देश के मूलभूत कानूनों की जानकारी होनी चाहिए और पता होना चाहिए कि इन कानूनों का क्या मतलब है? इस देश में रहने वाले ज्यादातर लोगों को यहां के मूलभूत कानूनों की जानकारी तक नहीं है। जब भी आप उनसे इस बारे में पूछें तो वह अपने हाथ खडे़ कर देते हैं। उन्हेंं लगता है कि कोई और उनको इस बारे में बताए। नहीं, हमें देश में एक ऐसा कानून भी बनाने की जरूरत है कि जिसमें साफ कहा जाए कि अगर आप इस देश में रहना चाहते हैं तो आपको यहां के कुछेक मूलभूत कानूनों की जानकारी होना अनिवार्य है। अगर आप सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं तो आपको सड़क से जुड़े कानूनों की जानकारी होना जरूरी है। है कि नहीं? इसी तरह अगर आप इस देश में रहना चाहते हैं तो आप को मालूम होना चाहिए कि यह क्या है और वह क्या है। ऐसा नहीं कि इस बारे में आपने अपने पड़ेसियों से सुना भर है। इस बारे में सबको उचित रूप से शिक्षित होना जरूरी है। सबको पता होना चाहिए कि ये कानून हैं, अगर हमने इन्हें तोड़ा तो इसकी यह सजा होगी। यह चीजें हरेक को पता होना चाहिए। है कि नहीं?

और तब इसे लागू या अमल करवाया जाए। हालांकि कानून को लागू करना कोई आसान काम नहीं है। कानून बनाना अपने आप में एक बेहद जटिल प्रक्रिया है… जबकि उसको लागू करना तो और भी जटिल चीज है, क्योंकि यहीं न्याय या अन्याय की बात आती है। तो कुछ समय तक के लिए हमें न्याय को छोड़कर सिर्फ कानून तक ही सीमित रहना चाहिए। जो लोग कानून को लागू करवाते हैं, उन्हें कई बार इस काम के लिए अन्यायपूर्ण तरीका भी इस्तेमाल करना पड़ता है, लेकिन आपको इस पर टिके रहना होगा। अगर आप इसका दृढ़तापूर्वक पालन नहीं करेंगे तो पूरा समाज अस्ति व्यआस्तप और कानूनविहीन हो जाएगा। तब बदला ही एक रास्ता बचेगा। पर हम इसे न्याय का नाम देंगे। तब हम इसे न्याय का नाम देकर एक दूसरे से बदला लेते रहेंगे। आज समाज में बहुत सी घटनाएं हो रही हैं, लोग एक दूसरे को जान से मार रहे हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे न्याय की मिसाल पेश कर रहे हैं। यह सब इसलिए हो रहा है कि कानून व्यवहारिक और उचित नहीं है।

जीवन में आगे बढ़ने या विकास करने के लिए इमानदार समाज बनाने की बजाय एक व्यवस्थित समाज बनाने की जरूरत है। और मैं चाहता हूं कि आप इस बात को समझें कि यह अपने आप में एक बहुत बड़ा त्याग है, जिसे करने के लिए हमें तैयार रहना होगा। यह आने आप में एक बहुत बड़ा त्यााग होगा कि ‘मैं न्याय की उपेक्षा नहीं करूंगा, बल्कि मैं कानून पर अमल करूंगा। चाहे जो भी कानून हो, मैं उसका हर हाल में पालन करूंगा।’ आज भले ही न्याय न मिले, लेकिन कानून का पालन तो होना ही चाहिए। अगर कानून बहुत ज्यादा अन्यायपूर्ण है तो हम उसमें बदलाव कर सकते हैं, लेकिन कानून से बढ़कर या उसके आगे कोई न्याय नहीं है। किसी के पास यह अधिकार नहीं है कि वह खुद न्याय दे सके। यह बात सबके बीच साफ हो जानी चाहिए। यही वो एक चीज है, जो आज तक हम नहीं कर पाए हैं।

प्रेम व प्रसाद,

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