नमक की गुड़िया

sadhguru

जब मैं युवा था तो उस दौरान मैंने हजारों कविताएं लिखीं, क्योंकि तब मैं दूरदराज के इलाके में एक फॉर्म में रहा करता था। वहां जाने के पीछे वजह यह थी कि तब मैं हैंग ग्लाइडिंग किया करता था, जिसके लिए मुझे एक पहाड़ी ढलान की जरूरत थी। वहां पहाड़ी के साथ-साथ एक झील भी थी। झील के लिए मैंने अपनी जरूरत के हिसाब से एक राफ्ट (बेड़ा) बना लिया था। हालांकि वह झील और पहाड़ी मुझे बेहद आकर्षित करते थे, लेकिन यह जगह काफी दूर थी। वहां कभी कोई मुझे मिलने नहीं आया। चूंकि मैं वहां अकेला रहा करता था, इसलिए कविताओं के जरिए मैं जीवन को देखने और ढूंढने की कोशिश करने लगा। इसकी एक वजह यह भी थी कि गद्य में खुद को व्यक्त करने के लिए मेरे पास पर्याप्त शिक्षा नहीं थी। उस समय मैंने काफी लिखा। हालांकि मैं अभी भी लिख रहा हूं और फिलहाल मेरी अब तक लिखी कविताओं का संग्रह निकालने की तैयारी हो रही है।

नमक की गुड़िया

सत्य की खोज में
कभी पीछे मुड़ा तो कभी आगे बढ़ा
पर्वत दर पर्वत मैं भटकता रहा
संतों के साथ देव नदियों में डुबकी भरा।

जिस भी दिशा में अंधे ने किया इशारा
उम्मीद और जोश में चलता रहा
हर दिशा में गया जहां भी सुगंध पाई मैंने
पर पहुंचा कहीं नहीं, बस गोल गोल घूमता रहा

व्यर्थ गए जीवन उसकी खोज में, जो है ही नहीं,
पर खोज का बुखार था ऐसा कि कभी उतरे नहीं
मछली या व्हेल ने भी जिसका मर्म न जाना
उस समंदर की थाह कैसे ले एक अनजाना

सिर्फ नमक ही समुंदर बनता, नहीं तुम और मैं
नमक की गुड़िया बन छलांग लगाई और समुंदर बन गया मैं।

 

‘मुझे क्यों घुल कर विलीन हो जाना चाहिए?’ यह कोई विचार नहीं है, जीवन या अस्तित्व का यही तरीका है। या तो आप अभी इसे जान लें या फिर आप उस दिन जानेंगे, जब हम आपको दफनाएंगे – आप विलीन हो जाएंगे। बेहतर होगा कि आप इसे अभी जान लें। अगर आपने इसे अभी जान लिया तो आप जिंदगी का आनंद ले सकेंगे। अगर आपने अभी यह नहीं किया तो हम आपके जान लेने के बाद अपनी जिंदगी का आनंद लेंगे। अगर आप अपने आप से पूरी तरह से भरे हुए हैं तो आपके आसपास के लोग आपको दफनाने के बाद अपनी जिंदगी का आनंद लेंगे और तब आपको समझ आएगी कि आप इस समग्र सृष्टि के अंश हैं। अगर आप इसे अभी समझ लें तो न सिर्फ आप इसका आंनंद उठा पाएंगे, बल्कि आपके आसपास हर व्यक्ति इसका आनंद ले सकेगा। वाकई वह स्थिति अद्भुद होगी।

‘आखिर मैं किसके साथ खुद का विलय करूं?’ चलिए इस दिशा में एक-एक करके आगे बढ़ते हैं। अस्तित्व के साथ सीधे विलीन होना अभी बड़ी बात लगती है। ‘विलीन हो कर मैं कहां जाउंगा, तब मेरा क्या होगा?’ अस्तित्व के साथ विलीन होकर आप कहीं नहीं जाएंगे, बस आपका तुच्छ अस्तित्व खत्म हो जाएगा। अगर नमक का एक पुतला समुद्र में गिरता है तो वह कहीं नहीं जाता, बस उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है। सृष्टि से एकाकार करना चूंकि आपको बहुत बड़ा कदम लगता है इसीलिए एक प्रक्रिया बनाई गई है। पहले आप अपने गुरु के साथ एक हो जाएं, क्योंकि आप खुद ही अपने आपको सागर में नहीं धकेल सकते। जब एक बार आप खुद को उसमें विलय कर देते हैं तो फिर वह खुद आपको सागर में धकेल देता है।

प्रेम व प्रसाद,

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