मंत्र का अर्थ जानना, कितना ज़रूरी?


ध्वनि सृष्टि का तत्व है। अर्थ मनुष्य के दिमाग में बनते हैं। कुछ ध्वनियां बहुत शुद्ध होती हैं और कुछ अशुद्ध, जो उनके कंपन पर निर्भर करता है। हर चीज एक किस्म की ध्वनि है। 
हर कम्पन, चाहे वो महत्वपूर्ण हो या न हो, उसका अपना एक अस्तित्व है, लेकिन अर्थों का कोई अस्तित्व नहीं होता। अर्थ सिर्फ आपके मन के अंदर ही मायने रखते हैं। मानव समाज में रहते हुए ही अर्थ महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इंसान सृष्टि के साथ अपना जुड़ाव खो चुका है। अर्थों का केवल लोगों के अपने बनाए हुए बेहुदा मनोवैज्ञानिक संसार में ही थोड़ा-बहुत महत्व होता है। आप दुनिया में टकराव देखते हैं क्योंकि हर कोई अपनी दुनिया में रह रहा है। यह एक मनोवैज्ञानिक ढांचा है। यह एक भ्रम है, जो आप अपने लिए पैदा करते हैं।

इस भ्रम के भीतर आप तरह-तरह के अर्थ गढ़ सकते हैं। जब कोई होश में आता है, तो उसके लिए कहा जाता है, ‘उसका भ्रम दूर हो गया’। भ्रम दूर होना या मोहभंग सामाजिक संदर्भ में एक सकारात्मक शब्द नहीं है। लेकिन अगर आप आध्यात्मिक संदर्भ में देखें, तो जितनी जल्दी आपका भ्रम दूर होगा, आपके लिए उतना ही बेहतर होगा। अगर आज आपके सारे भ्रम दूर हो जाएं, तो क्या यह बढ़िया नहीं होगा? या आप मरते दम तक अपने भ्रम बनाए रखना चाहते हैं? निश्चित रूप से मृत्यु सभी भ्रमों को दूर कर देगी ।

(यौगिक प्रणाली में)जब हम किसी मंत्र का उच्चारण करते हैं, तो हम उसके अर्थ पर ध्यान नहीं देते। लेकिन अधिकतर इंसान ऐसी किसी चीज के साथ जुड़ने में असमर्थ हो गए हैं जिसका उनके लिए कोई अर्थ नहीं है। दुनिया में जो सबसे शानदार चीजें घटित हो रही हैं, उन्हें आपके अनुसार ज्यादातर लोग किस वजह से अनदेखा कर देते हैं? सूर्योदय, सूर्यास्त, पूर्णिमा। दुनिया में कितने लोग इनके बारे में सजग भी होते हैं? कितने लोग बसंत के मौसम में फूलों को खिलते देखने के लिए बैठे रहेंगे? इसकी बजाय वे इस बात पर बहस करते हैं कि किसकी बात अधिक अर्थपूर्ण है। उन्हें ब्रह्माण्ड में घटित हो रही बेमतलब की अद्भुत चीजों से कोई मतलब नहीं, क्योंकि वे अर्थपूर्ण चीजों की तलाश में हैं।

कंपन अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग असर डालते हैं, लेकिन अगर आप किसी कंपन को चेतनता से अपने भीतर विकसित करते हुए उसे एक आयाम से दूसरे में बदल दें, तो आपको अपने भीतर प्रकाश दिखाई देगा और आस-पास मौजूद लोग भी इसे महसूस करेंगे।
ध्वनि सृष्टि का तत्व है। अर्थ मनुष्य के दिमाग में बनते हैं। ध्वनियां बहुत तरह की होती हैं। कुछ ध्वनियां बहुत शुद्ध होती हैं और कुछ अशुद्ध, जो उनके कंपन पर निर्भर करता है। हर चीज एक किस्म की ध्वनि है – पेड़, हवा, शरीर, चट्टान। ध्यानलिंग जैसा ही कोई और भी पत्थर हो सकता है लेकिन उसका कंपन बिल्कुल अलग होगा। एक ही ध्वनि को अपनाकर उसे एक खास स्तर तक शुद्ध किया जा सकता है। आज विज्ञान इस क्षेत्र में उतर रहा है लेकिन योग प्रणाली में हमने हमेशा इस जानकारी का उपयोग किया है। अब आधुनिक विज्ञान कहता है कि ध्वनि और प्रकाश, दोनों कंपन हैं। अगर आप ध्वनि को एक खास डेसिबल तक बढ़ा दें, तो आप ध्वनि में ऐसा बदलाव ला देंगे, जहां गणित की दृष्टि से वह प्रकाश बन जाती है। सिद्धांत रूप में ध्वनि प्रकाश बन सकती है। एक बार जब कोई चीज सिद्धांत के स्तर पर संभव हो जाती है, तो उसका प्रयोग बस काबिलियत का सवाल है। लेकिन ध्वनि का प्रकाश में परिवर्तन हमने (योग की प्रणाली से) अपने भीतर हमेशा से किया है।

अगर आप किसी ध्वनि को लेकर उसे अपने भीतर स्थापित करें, तो आप अपनी चेतनता के एक शुद्ध कंपन के साथ उस ध्वनि को विकसित कर सकते हैं। शरीर एक किस्म का कंपन है, विचार दूसरी तरह का कंपन, भावना एक और तरह का कंपन है, चेतनता बिल्कुल अलग तरह का कंपन है। जिसे हम चेतनता कहते हैं, वह सबसे शुद्ध कंपन है। उसके परे ‘शिव’ है। शिव शब्द का अर्थ है – “वह जो नहीं है”। क्योंकि उसका कंपन ऐसा है कि आपको पता भी नहीं चलेगा कि उसका अस्तित्व है। वह पूर्ण शांति है, लेकिन उसमें भी कंपन है। अगर आप अपने भीतर एक ध्वनि को लें और अपनी चेतनता में उसे विकसित करें, तो इस ध्वनि को धीरे-धीरे प्रकाश में बदला जा सकता है।

कंपन अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग असर डालते हैं, लेकिन अगर आप किसी कंपन को चेतनता से अपने भीतर विकसित करते हुए उसे एक आयाम से दूसरे में बदल दें, तो आपको अपने भीतर प्रकाश दिखाई देगा और आस-पास मौजूद लोग भी इसे महसूस करेंगे।

प्रेम व प्रसाद,

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