ल्हासा से पत्र

sacred walks

20 जुलाई 2012

ल्हासा 12,000 (औसत समुद्र लेवल)

छह साल बाद एक बार फिर मैं उस ल्हासा शहर में हूं, जहां कभी बाहरी लोगों का प्रवेश नहीं था। पहले यहां बाहरी लोगों का प्रवेश नहीं था, पर अब यहां खूब धूमधड़ाका है और यह साफ नजर आता है कि इसे बहुत जल्दी में बनाया गया है। बेहद सलीके से सजे शहर के मुख्य मार्ग के किनारों जल्दी उगने वाले यूकिलिप्ट के पेड़ों की कतारें हैं। शहर में खरीदने को इतना कुछ है, लेकिन उसे देखते हुए खरीदारों की तादाद काफी कम है। हालांकि शहर में ट्रैफिक का प्रवाह लगातार जारी है, जिसमें केवल चीनी गाड़ियां ही नहीं, बल्कि तमाम अमेरिकी और यूरोपीय गाड़ियां भी शामिल है। एक दृढ़ प्रशासन और बाहर से आने वाले प्रवासियों के उत्साह ने यहां के धीमी गति से चलने वाले स्थानीय लोगों के जीवन को गतिशील बना दिया। यहां का स्थानीय ड्राइविंग लाइसेंस लेने के लिए मुझे ट्रैफिक विभाग का चक्कर लगाना पड़ा। शहर के सारे दफ्तर आमतौर पर सैनिक प्रतिष्ठानों की तरह लगते हैं जो वर्दी में सजे महिलाओं और पुरुषों द्वारा चलाए जाते हैं। जो राष्ट्र किसी दबावपूर्ण ढंग से या जबरदस्ती बनाए जाते हैं, उनका आकलन शायद इतिहास ही करता है।

कल सुबह हम सड़क मार्ग से समुद्री तल से 15,481 फीट ऊंचाई पर स्थित नमसो झील के लिए रवाना होंगे। यह सिर्फ दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित खारे पानी की झीलों में से एक ही नहीं है, बल्कि तिब्बत के पठार पर स्थित सबसे बड़ी झील भी है, जो तकरीबन 1,920 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली है। अचानक इतनी अधिक ऊंचाई पर रहना हमारे लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है। मेरे साथ आए दल के ज्यादातर लोग इन चुनौतियों से निपटने के लिए डाइमॉक्स दवा या फिर उसका जड़ी बूटीय संस्करण ले रहे हैं, जबकि हम जैसे कुछ लोगों ने कुछ भी न लेने की जिद्द ठानी हुई हैं। हालांकि इस दल के लोगों को सेहत संबंधी कोई दिक्कत नहीं है। इनमें से सभी लोग बेहद उत्साहपूर्ण हैं और ल्हासा शहर के भ्रमण पर हैं । यहां बाहर निकलना और घूमना बेहद महत्वपूर्ण है।

मेरे साथ आया यह छोटा सा दल एक रोमांचक यात्रा पर है। दुनिया का ऐसा कोई भी रोमांच नहीं है, जिसमें खतरा न हो। अगर हम रोमांच से खतरे को निकाल दें फिर उसका कोई मतलब नहीं रह जाता, लेकिन अगर हम खतरे ठीक तरह से संभाल नहीं पाएं तो यह खतरा त्रासदी बन सकता है। दल में कई लोग बहादुर दिल वाले हैं, जबकि कुछ लोग काफी सीधे-सादे हैं, जिनका सिर्फ एक ही मंत्र है- ‘हमारा ख्याल रखने को सद्गुरु हैं ना!’ उनके इस भरोसे ने मेरे लिए इस यात्रा को कई गुना रोमांचक बना दिया है।

ऐसे ही खतरनाक पलों में ज्यादातर लोगों को मौत की निकटता का अहसास हुआ है। इसी अहसास या अनुभव से ही इंसान में विनम्रता आती है, जो उसे ग्रहणशील बनाती है। निरंतर अनिश्चितता की स्थिति में रहने से ही समझ विकसित होती है।   

21 जुलाई 2012

ल्हासा में हमारा डेढ़ दिन होटल ब्रह्मपुत्र ग्रांड में बीता। यह होटल अपने आप में प्राचीन तिब्बती कलाकृतियों से भरा किसी संग्रहालय सा लगता है। मुझे बताया गया कि पूरे तिब्बत का प्रतिनिधित्व करने वालीं इन बेइंतहा खूबसूरत और मूल्यवान कलाकृतियों को खरीदने में इस होटल के चीनी मालिक ने पूरे 30 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए। आज का ल्हासा छह साल पहले की हमारी यात्रा की अपेक्षा इतना बढ़ चुका है कि जिसकी तब हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। आज चारों तरफ फैल चुका तकरीबन तीन लाख की आबादी वाला यह शहर उस जोशीले किशोर सा नजर आता है, जो अपनी प्राचीन धार्मिक और बलिदानी छवि को छिपाने के लिए तड़क-भड़क से भरपूर परिधानों का सहारा लेता है।

नमसो झील तक का हमारा पूरा रास्ता डामर वाली सड़कों से युक्त था, जिनपर पर्यटकों से भरा ट्रैफिक था। 250 किलोमीटर के रास्ते पर कारों, मिनी वैनों और बसों का निरंतर प्रवाह बना हुआ था। तिब्बत में ड्राइविंग करना अपने आप में एक अद्भुद अनुभव है – इन अंतहीन सी पर्वतमालाओं के खुशी और उदासी भरे मिजाज का वर्णन करना अपने आप में मुश्किल है। हरी, नीली और बरफ सी सफेद पर्वतमलाएं, आसमान में बन रहे शाश्वत बादलों व असंख्य इंद्रधनुषों का निरंतर बदतला मिजाज दिल खुश कर देने वाला है और परम की एक झलक प्रदान करता है।

 

तिब्बत

हरीभरी,
नीली
बर्फ सी उजली
बलुई भूरी
तांबई और नीलवर्णी
अंतहीन पर्वतमालाएं
खड़ी बैरागी सी मुद्रा अपनाए
बादलों के इनके आभामंडल में
बदलते इनके मिजाज
कभी खुश तो कभी उदास

ये हर पल बदलते मिजाज
सजते हैं अनगिनत इंद्रधनुषों से

एक गहन अतीत
एक उत्सुक भविष्य

शांत हो गया एक शेर
मारी है कई सदियों की छलांग
जरूरत है अब अधिक भरोसे की

बदलाव की इस वेदना में
हे प्रिय तिब्बत तुम्‍हारा भला हो।

प्रेम व प्रसाद,

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