क्या आप अपने परिवार से दुखी हैं?


परिवार किसलिए होता है, यह आपको जरूर समझना चाहिए और आपको यह ध्यान में रखते हुए ही अपना व्यवहार भी तय करना चाहिए। समस्या यह है कि हम भावनाओं के रेले में बह कर परिवार को एक ऐसे अलग धरातल पर पहुंचा देते हैं, जो उसकी सही जगह नहीं है।

अपनी जिंदगी की गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए हमने कई तरह की संस्थाएं बना रखी हैं। जैसे कारोबार, राष्ट्र, समुदाय आदि से जुड़ी संस्थाएं। पर इन सबमें परिवार एक बुनियादी संस्था है। परिवार किसलिए होता है, यह आपको जरूर समझना चाहिए और आपको यह ध्यान में रखते हुए ही अपना व्यवहार भी तय करना चाहिए। समस्या यह है कि हम भावनाओं के रेले में बह कर परिवार को एक ऐसे अलग धरातल पर पहुंचा देते हैं, जो उसकी सही जगह नहीं है। मेरी मां ने अपने विचार हम सब पर थोपने की, हमारी सोच को प्रभावित करने की किसी भी तरह से कोशिश नहीं की। हमारी सोच को प्रभावित नहीं करने के उसके कदम ने हम सबको सबसे ज्यादा प्रभावित किया। लोग आपको क्या दे सकते हैं और आपके पास उन्हें देने के लिए क्या है, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लेकिन हम लोगों को लेकर अपने मन में जो भ्रम बना रखे हैं, उसे जरूर नष्ट कर देना चाहिए। वरना हम लोगों के एक-दूसरे के करीब आने और मिल-बांट कर जिंदगी गुजारने की खूबसूरती नहीं देख पाएंगे।

परिवार का मतलब ऐसी संस्था से है जिसके सदस्य एक दूसरे के सबसे अधिक निकट हों। यानी हर वक्त आपको दूसरे के जूतों में अपने पांव डाल कर देखना होता है, यानी दूसरों की समस्या खुद की समस्या समझ कर देखना होता है। इससे परिवार के सभी सदस्यों के बीच एक खास तरह की समझदारी और परिपक्वता आ जाती है। हो सकता है आपकी एक फेसबुक फैमिली भी हो जिसमें आप बिना किसी परेशानी के दस हजार लोगों का भी परिवार चला सकते हैं, क्योंकि आपको किसी के साथ कुछ भी बांटने की जरूरत नहीं होती, सिवाय तस्वीरों के। इसमें आपके सामने कोई चुनौती नहीं आती। मान लीजिए फेसबुक पर कोई शख्स आपको पसंद नहीं, तो आपके क्लिक करने भर की देर है, वह गायब हो जाएगा! परिवार के साथ ऐसा नहीं हो सकता। किसी समय आपके परिवार के किसी सदस्य ने अगर कुछ गलत कर दिया तो आप उससे नफरत करने लगते हैं, लेकिन आप क्लिक करके उसको गायब नहीं कर सकते।

परिवार ट्रेनिंग का वह केंद्र है जहां आप पसंद-नापसंद से ऊपर उठ जाते हैं।
चाहे बंधनों के चलते या फिर अपनी इच्छा से, जब लोग साथ-साथ रहते हैं, तो उनमें परिपक्वता आ जाती है, क्योंकि जब आप अपनी पसंद-नापसंद से उबर जाते हैं तो परिपक्वता आ ही जाती है। अपने मां-बाप, बच्चे, पति,पत्नी आदि की ऐसी बहुत-सी बातें होती हैं जो आप पसंद नहीं करते। शुरू-शुरू में इनसे आपको बेतहाशा चिढ़ होती है, लेकिन कुछ समय बाद आप इस खीझ से उबर जाते हैं। अगर आप ये सोच कर उस खीझ से उबरते हैं कि “भाड़ में जाए सब!”- फिर तो कोई फयदा नहीं। लेकिन अगर आप अपनी पूरी चेतना में इस खीझ से उबरे हैं, तो आप आध्यात्मिक हो गये हैं। बिना किसी इरादे के ही आप आध्यात्मिक हो गए हैं। आध्यात्मिक होने का यह सबसे खूबसूरत तरीका है।

परिवार ट्रेनिंग का वह केंद्र है जहां आप पसंद-नापसंद से ऊपर उठ जाते हैं। लेकिन कुछ लोग इसलिए आश्रम जाना चाहते हैं क्योंकि उनकी अपने परिवार के साथ बन नहीं पाती । मैं उनसे कहता हूं, “अगर आपको तीन लोगों के साथ रहना बहुत बड़ी चुनौती लग रही है, तो फिर आप हजार लोगों के साथ रहने लायक हैं ही नहीं!” अगर अपने परिवार के साथ आपकी खूब जम रही है और तब आप आश्रम में आ कर रहना चाहते हैं, तो बहुत अच्छी बात है, आपने परीक्षा पास कर ली है। लेकिन अगर आप थोड़े-से लोगों के साथ नहीं रह पा रहे, तो फिर भला हजार लोगों के साथ कैसे रह पाएंगे?

इन सबसे कहीं ज्यादा,परिवार आपकी भौतिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और सामाजिक जरूरतों के लिए बेहद जरूरी है। आपने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए एक संस्था बनाई जिसको आपने नाम दिया “परिवार”। इस बात को कभी ना भूलें। अचानक मदर टेरेसा वाली भूमिका अदा करते हुए यह न कहने लगें कि “तुम्हारे लिए मैंने इतना कुछ किया है।” हो सकता है फिलहाल आप अपने परिवार में खुद को बलि के बकरे की तरह महसूस कर रहे हों। लेकिन जरूरी नहीं कि परिवार के दायरे के भीतर आप जो कुछ भी कर रहे हों वह सब कारगर हो जाए, सिर्फ इसलिए कि आप उन सबको अपना  समझते हैं – यह सिर्फ आपकी अपनी सोच है। वे सब महज इंसान हैं। यदि आप स्वयं को उनके आगे पूरी तरह समर्पित कर दें और उनके जीवन को निखार दें, तो निश्चित रूप से वो भी कुछ न कुछ फलदायक काम कर जाएंगे।

मातृत्व की सुंदरता बच्चों को जन्म देने में नहीं है। मातृत्व की सुंदरता सबको शामिल करने में है।
गुस्सा, नफरत और लड़ाई के मामले में दो दुश्मन देशों के बीच जितनी भयंकर वारदातें घटित होती हैं, उससे कहीं अधिक भयानक कांड परिवार के भीतर हुआ करते हैं। मैं इसे सही या गलत नहीं कह रहा हूं। लेकिन आपने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए यह संस्था बनाई और अब आप चाहते हैं कि इस परिवार से उपजी तमाम जिंदगियां आपकी मर्जी के मुताबिक ढल जाएं। इसका यह मतलब नहीं कि वे सारे लोग आपकी मर्जी के मुताबिक ढल जाएंगे – वे नहीं ढलने वाले। बस उनका आभार मानिए और आप जितना अच्छा आप कर सकते हैं, करिए। हो सकता है आप ये सोचते हों कि वो आपके अनुसार नहीं चलने की वजह से तकलीफ में हैं और आप नहीं चाहते कि वे तकलीफ सहें। बिलकुल सच, हम नहीं चाहते कि वे तकलीफ सहें। सिर्फ इसलिए नहीं कि वे आपके परिवार के सदस्य हैं, दरअसल हम नहीं चाहते कि कोई भी इंसान तकलीफ सहे। वक्त आ गया है कि आप अपनी इच्छा का विस्तार कर के सबको उसके दायरे में ले लें। आप ये सोचें – ‘मैं नहीं चाहता कि कोई भी इंसान तकलीफ सहे।’

20, 40 और 60 के दशकों में अमेरिका में फैमिली का अर्थ ‘अपराध’ होता था – माफिया। आज भी उसका यही अर्थ है। मैं चाहता हूं आप यह ठीक-ठीक समझ लें कि इस धरती पर आप जिसको बुरा समझते हैं वह किसी दानवी स्रोत से नहीं उपजा। यह इंसान ही है जो ऐसा सोचता है कि ‘बस यही तीन लोग मेरे अपने हैं। बाकी लोग मेरे नहीं हैं।’ जिस चीज को वे इन तीन लोगों की खुशहाली मानते हैं वही बाकी लोगों के दुख का कारण है। हो सकता है ‘अपने’ की यह सोच आपके परिवार, समुदाय, जाति, धर्म या राष्ट्र के बारे में हो। लेकिन जीवन का यह सीमित परिप्रेक्ष्य ही इस धरती पर सारी बुराइयों की जड़ है और इसके मूल में है परिवार। कृपया परिवार की अपनी सोच का दायरा बढ़ाएं।

आपके बच्चे ने आपसे बस एक ही कोशिका ली होगी। लेकिन आपने इस धरती से कितना कुछ लिया है? कितनी कोशिकाएं ली हैं? अपना पूरा-का-पूरा शरीर आपने लिया है, भले ही आप अपने जीवविज्ञान से परे जाकर सोच न पाएं! यह धरती और इससे निकली हर चीज एक परिवार है, उस व्यक्ति से कहीं अधिक जिसने आपसे सिर्फ एक कोशिका ली है। शायद आपको यह बात अच्छी न लगे, खास तौर से “मदर्स डे” के ठीक बाद, लेकिन मातृत्व की सुंदरता बच्चों को जन्म देने में नहीं है। मातृत्व की सुंदरता सबको शामिल करने में है। मां इस कारण अनमोल नहीं होती कि उसने आपको धारण किया, अपनी कोख में पाला और फिर आपको इस दुनिया का प्रकाश दिखाया। मां इसलिए अनमोल होती है क्योंकि उसने आपको अनेक रूपों में अपने अंश के रूप में देखा है। यह जीवविज्ञान नहीं है; यह समावेशीपन है। मान लीजिए आपको जन्म देने के बाद आपकी मां ने कभी आपकी सुध न ली होती, तो वह आपकी सबसे बड़ी शत्रु होती। यहां जीववैज्ञानिक प्रक्रिया अहम नहीं है, एक और जीवन को अपना अंश मानने की इच्छा अहम है। यही वो खुबसूरती है जिसका उत्सव हम “मदर्स डे” के मौके पर मनाने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रेम व प्रसाद,

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