जिज्ञासा या फतह से

curiosity

क्यूरिओसिटी यान मंगल ग्रह पर उतर चुका है और पिछले एक हफ्ते से ट्वीट कर रहा है। मंगल पर इस इंसानी पहुंच को क्या यह माना जाए कि मर्दों का आखिरी किला ढह गया है? खैर, आप चिंता न करे। हम शुक्र पर भी काबू कर लेंगे।

तकनीकी ज्ञान पाकर मनुष्य की अज्ञानता और भी सशक्त हो गई है, यही अज्ञानता इस जीवन सृष्टि को वक्त से पहले खत्म करने का सबसे सशक्त हथियार बन सकती है। जैसे कि हम जानते हैं कि अकसर नई तकनीकी खोज सबसे पहले सैन्य उपयोग में लाई जाती हैं। प्रथम और द्वितीय विश्वयुध्द तत्कालीन तकनीकी प्रगति का वीभत्स प्रदर्शन थे। तब से तकनीकी प्रगति ने नित नए आयाम स्थापित किए हैं। बेशक इस प्रगति का हमारे जीवन पर भी काफी प्रशंसनीय प्रभाव भी पड़ा है। लेकिन साथ में इसके रूप में हमारे ऊपर शैतानी तलवार भी लटक रही है।

अंग्रेजी कैलेंडर की इस 21वीं सदी में मृत्यु की एक आहट सुनाई देती है। वर्ष 2000 से लेकर आज तक करीब दस लाख लोगों ने अलग-अलग झगड़ों में अपनी जान खोई है। इस की शुरुआत एक आतंकी हमले से हुई थी और उसके बाद इस श्रृंखला में कई युद्ध हुए। अब इन युद्धों को ‘स्प्रिंग‘ या बसंत कहा जा रहा है।

दरअसल, ‘बसंत‘ या ‘वसंतम्’ हमेशा जीवन की श्रेष्ठत्म स्थिति संकेतित करता हैं। बसंत तो सारी सृष्टि के लिए प्रेम, उल्लास, उत्सव और खुशी आदि लेकर आता है। लेकिन अब बसंत का अर्थ हो गया है छल, खून, मृत्यु और दुख, इसे गलत तरीके से क्रांति, बलिदान और शहादत का नाम दिया जा रहा है।

अगर तकनीकी प्रगति जागरूक और संवेदनशील हाथों में न रहे तो यह दुनिया को जहर देकर मार सकती है। अगर हम अपने जीवन को सबसे अधिक महत्व देते हैं, तो ही हम अपने कल्याण और सुख के लिए तकनीकी प्रगति पर विश्वास कर सकते हैं।

भारत इस पृथ्वी का एक अनूठा देश है। यकीं मानिए यह बात मैं भारत की आजादी के दिवस के मौके पर महज राष्ट्रभावना के चलते नहीं, बल्कि कई राष्ट्रों की संस्कृतिक नींव का नजदीक से अवलोकन करने के बाद कह रहा हूं।

हमें यह समझना चाहिए कि मानवीय चेतना, जो स्वाभाविक रुप से सब को सम्मिलित करने की प्रक्रिया है को बढ़ाने के लिए प्रयास किए बिना यह जो तकीनीकी प्रगति का वरदान हमें मिला है, वह अभिशाप में बदल जाएगा।

जब एक हफ्ते पहले मैंने ‘क्यूरिओसिटी’ से आने वाले ट्वीट सुने तो मैंने ये दो कविताएं लिखीं, जिनका मुलाहिजा आप भी लीजिए।

 

क्यूरिओसिटी (जिज्ञासा)

रिक्त आकाश कितना सबल, पर है शर्मीला [1] भ्रामक धुंध में कैद किए असीम संभावनाओं को
क्या यह ईश्वरीय चाल है या प्रकृति की शरम

खुली हैं सभी दिशाएं
न कहीं जाना है न कोई रास्ता है
मुक्ति में लिपटे हैं बंधन
शून्य में तैर रही है हर चीज
हर चीज में शून्य व्याप्‍त है
संपूर्ण अव्यवस्था में भी है एक पूरी व्यवस्था
क्या लगता है तुम्हें, यह सब जान सकते हो
महज अपनी जिज्ञासा से तुम।

 

निर्थक फतह

मंगल या शुक्र की हमारी चाहत [2] महज जिज्ञासा या प्रेम को लेकर नहीं है
बल्कि यह बेमतलब लोभ और फतह के लिए है
यह बात मंगल या शुक्र की नहीं है
यह बेइंतहा बढ़ती भूख की है
इस सीमाहीन अज्ञानता को
नहीं कर सकते तृप्‍त अधिक पाकर
हमारा जो असली स्वभाव है
और अधिक नहीं, वह संपूर्ण मांगता है
अगर तुम शामिल करों और खुद में समाहित करो
जो भी है सबकुछ तुम्हारा ही तो है
ये सब नहीं जान पाओगे महज जिज्ञासा और फतह करके।

प्रेम व प्रसाद,
 
[1] (9 अगस्त 2012, कुआलालम्पुर, सुबह 10.30 बजे, विमान पट्टी)
[2] (9 अगस्त 2012, मेलबर्न पहुंचने से एक घंटा पहले)
 

 


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