हर पूर्णिमा – देवी और ध्यानलिंग का मिलन


सद्‌गुरु, हर पूर्णिमा पर होने वाले लिंग भैरवी महा आरती के आयोजन का क्या महत्व है, जिसमें एक जुलूस के शक्ल में बड़ी धूमधाम से देवी की एक छोटी प्रतिमा को ध्यानलिंग मंदिर में ले जाया जाता है आपने एक बार जिक्र किया था कि यह  देवी द्वारा शिव के प्रति प्रेम निवेदन है। क्या आप इस पर और रोशनी डाल सकते हैं?   

सद्‌गुरु:

अगर आप जीवन को रूपांतरित करने वाली एक सच्ची और ईमानदार आध्यात्मिक प्रक्रिया में ढलना चाहते हैं तो इसके लिए आपको ऊर्जा-स्तंभ यानी ऊर्जा के एक टावर की जरूरत होती है। अगर आप इस तरह के टावर को तैयार नहीं कर पाते या फिर किसी और रूप में मौजूद इस तरह के ऊर्जा स्रोत तक पहुंच नहीं पाते तो आपके जीवन में कभी भी रूपांतरण नहीं होगा, जो होगा वह बस जुबानी जमाखर्च होगा। अगर कोई व्यक्ति यह ऊर्जा प्रदान कर रहा है और उसकी सीमित ऊर्जा एक खास समय तक चलेगी। जैसे ही उसका शरीर कमजोर पड़ेगा, वह उर्जा खत्म हो जाएगी। हो सकता है कि इससे इंसान न मरे, लेकिन उसके सिस्टम में अगर कोई कमजोरी आ जाती है तो इससे पूरी आध्यात्मिक व रूपांतरण की प्रक्रिया खत्म हो सकती है। इसलिए अगर आप ऐसा ऊर्जा क्षेत्र या स्रोत नहीं तैयार करते जो लंबे समय तक टिके तो आप एक जीवंत आध्यात्मिक प्रक्रिया को चालू नहीं रख सकते।

ध्यानलिंग ऊर्जा का एक ऐसा ही टावर है। यह अपने आप में बेहद सूक्ष्म व परिष्कृत है, क्योंकि इसे बहुत लंबे समय तक रहना है। लंबे समय का मतलब बेहद लंबे समय से है। अगर आप कुछ ऐसा बनाते हैं जो काफी मजबूत और बाहरी तौर पर बेहद ऊर्जावान हो, जैसे देवी, तो वह ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी, अगर उसकी रोजाना ठीक से देखभाल व साज संभाल नहीं करते हैं। ये समझिए कि देवी कोे हर दिन रिचार्ज करना होता है, वर्ना वह जीवंत नहीं रहेंगी। यही वजह है कि उनकी अर्चना व सेवा करने वालों लोगों में बहुत ज्यादा भक्ति और समपर्ण की जरूरत होती है ताकि देवी की जीवतंता बनी रहे। जो लोग ध्यानलिंग की सेवा करते हैं, वे लोग सिर्फ मंदिर परिसर और वहां आने जाने वाले लोगों का ख्याल रखते हैं। वे लोग ध्यानलिंग की देखभाल नहीं करते, क्योंकि ध्यानलिंग को देखभाल की कोई जरूरत ही नहीं है। अगर ध्यानलिंग की कोई देखभाल नहीं भी करता तो भी वह वैसे ही रहेंगे। यह लिंग भैरवी से बिल्कुल अलग तरह का है। उनके यहां मंदिर के परिसर और वहां आने जाने वाले लोगों के साथ-साथ रोज देवी की भी देखभाल करनी होती है। अगर उनकी रोज देखभाल नहीं होगी तो वे लंबे समय तक नहीं रहेंगी। अगर आप उनकी अच्छी तरह देखभाल नहीं करेंगे तो वह क्रोधित हो उठेंगी। मुझे उम्मीद है कि जो लोग उनकी देखभाल व अर्चना करते हैं, उनमें इतनी समझ है कि देवी क्रोधित न हों।

 देवी के भावी सेवकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह हर पूर्णिमा को बाहर आकर ध्यानलिंग के सीधा संपर्क स्थापित करें।
देवी का अस्तित्व ध्यानलिंग से ली गई ऊर्जा पर टिका है। उन्हें ऊर्जा का आहार ध्यानलिंग से मिलता है, जो ऊर्जा का मुख्य टावर है। यहां देवी का जो स्थान है, उसकी वजह यही है। इसके अलावा, हम जो भी बनाते हैं या बनाएंगे, वो सब इसी स्रोत से ऊर्जा लेंगे, फिर चाहें हम उसे दुनिया में कहीं भी रखें। ध्यानलिंग अपने आप एक संपूर्ण जीवन है, जिसमें सातों चक्र और कुछ उससे भी अधिक चीजें मौजूद हैं। वह बिना शरीर का एक पूर्ण जीवन है- यह अच्छी बात है। उसके साथ शरीर का कोई मुद्दा ही नहीं है। जबकि देवी में सिर्फ साढ़े तीन चक्र हैं। इस तरह से वह आधा जीवन हुईं, लेकिन यह आधा जीवन भी उर्जा से बेहद भरा है। आप इसकी अनदेखी नहीं कर सकते। अगर आपको ध्यानलिंग में किसी तरह का कोई अनुभव नहीं होता तो आप जरा लिंग भैरवी के पास जाकर देखिए। सीधे आपके चेहरे पर एक झन्नाटा मिलेगा। यह इतना बेबाक और खुला इसलिए है, क्योंकि वह एक खास तरह से ऊर्जावान और स्पंदित हैं। अगर नियमित तौर पर इसकी देखभाल न की जाए तो इस तरह की स्पंदन और उर्जा लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती।

इसलिए महीने में एक बार देवी ध्यानलिंग के पास आकर उनसे सीधा संपर्क बनाती हैं, क्योंकि उनका पूरा अस्तित्व ही ध्यानलिंग से ली गई ऊर्जा पर टिका है। देवी के भावी सेवकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह हर पूर्णिमा को बाहर आकर ध्यानलिंग के सीधा संपर्क स्थापित करें। अगर मूसलाधार बारिश हो रही है, तब भी उन्हें बाहर लाना होगा। यहां तक कि बाढ़ भी आ जाए तब भी देवी की पूर्णिमा यात्रा जरूर निकलनी चाहिए। यह उनके अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी है, अन्यथा वह ऊर्जा से खाली हो जाएंगी। देवी को शक्तिशाली, स्पंदित और सुंदर होना अच्छा लगता है। अगर उनकी ऊर्जा खत्म या कम हो गई तो वह क्रोध में भर उठेंगी और देवी को उस रूप में रखना अच्छा नहीं होता है। अगर देवी को उनकी पूर्णता के साथ स्पंदित रूप में रखा जाए तो वह सभी का कल्याण करेंगी।


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