विश्व में शांति व सामंजस्य लाने की तकनीक

आज दुनिया में फैली अशांति को महसूस करता हर इंसान वैश्विक शांति की बात करता है। लेकिन क्या यह संभव है और है तो कैसे ? आज के स्पाॅट में सद्‌गुरु बड़े सुंदर और सीधे शब्दों में इसकी विवेचना करते हुए बता रहे हैं कि यह कितना मुमकिन और कितना नामुमकिन है…

हाल ही में, मैं जब वल्र्ड बैंक के एक आयोजन में भाषण दे रहा था तो वहां मुझसे किसी ने पूछा कि दुनिया में शांति, समानता और सामंजस्य लाने के लिए हम क्या कर सकते हैं। मैंने उन्हें एक उदाहरण देते हुए एक बुनियादी सुझाव दिया। मैंने उदाहरण दिया कि जब मेरी बेटी बड़ी हो रही थी तो मैंने एक नियम बनाया कि कोई भी उसे कुछ नहीं सिखाएगा। इस दुनिया में सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जैसे ही आप पैदा होते हैं, वैसे ही हर कोई आपको कुछ न कुछ ऐसा सिखाना शुरू कर देता है, जो खुद उनकी जिंदगी में कभी काम नहीं आया होता। उसे ऐसी किसी भी सुझाव या तिकड़म की कोई जरुरत नहीं थी। हां, मैंने यह जरूर सुनिश्चित किया कि उसका अपने आसपास के जीवन और प्रकृति का भरपूर सान्निध्य व संपर्क मिले। वह एक खुशमिजाज वातावरण में बड़ी हुई। लेकिन एक बार, जब वह कोई तेरह साल की रही होगी, उस दौरान वह एक भावनात्मक उथल-पुथल से गुजरी। उस स्थिति में मैंने उससे एक ही बात कही, ‘किसी भी इंसान को प्रशंसा की दृष्टि से देखो और न ही किसी इंसान को हेय दृष्टि से देखो। वैसे ही किसी भी चीज की तरफ न तो प्रशंसा भरी निगाह से देखो और न ही हेय दृष्टि से देखो। हर चीज को वैसे ही देखो, जैसी वह है।’ जीवन को सुंदर बनाने के लिए बस इतना ही काफी है।

किसी भी इंसान को प्रशंसा की दृष्टि से देखो और न ही किसी इंसान को हेय दृष्टि से देखो।
जब आप किसी चीज की तरफ प्रशंसा की दृष्टि से देखते हैं तो आप एक तरह से सत्य पर अपना अधिकार दिखा रहे होते हैं। इस तरह से सत्य कभी आपके जीवन में अधिकार नहीं दिखा पाता। अगर आपके जीवन में सत्य की सत्ता या अधिकार नहीं है तो आप कभी जान ही नहीं पाएंगे कि आपका जीवन क्या है। जब आप किसी चीज के प्रति प्रशंसा भाव से देखते हैं तो आपको अनिवार्य रूप से किसी और चीज को तुच्छता के भाव से भी देखना पड़ता है। जैसे ही आप चीजों को लेकर प्रशंसा या तुच्छता का भाव खत्म कर देते हैं, आपके लिए स्वर्ग या नर्क जैसी कोई चीज नहीं रह जाती। जब तक आपको लगता है कि आप कहीं जा रहे हैं या आपको कहीं पहुंचना है, तभी तक आप यहां ये सब बेतुकी बातें करते हैं। एक बार जब आपको यह अहसास हो जाता है कि आपको इसी धरती पर रहना है तो फिर आप समझदारी के साथ रहना शुरू कर देते हैं।
एक इंसान के भीतर जो भी घटित हो रहा है, यह दुनिया उसी की एक अभिव्यक्ति है।

जहां तक सामंजस्य की बात है तो कितने लोग, आपमें से कितने लोग गंभीरतापूर्वक यह बात कह सकते हैं कि जब वे कहीं अकेले होते हैं तो वे अपने भीतर वाकई सामंजस्य में होते हैं। एक इंसान के भीतर जो भी घटित हो रहा है, यह दुनिया उसी की एक अभिव्यक्ति है। चूंकि यह दुनिया में बड़े रूप में सामने आता है तो यह देखने में भद्दा लगता है। लेकिन यह निजी स्तर पर छोटे रूप में भी भद्दा ही होता है। लोग अकसर मुझसे अपने पति, पत्नी, सास या किसी दूसरे को लेकर शिकायतें करते हैं। यह सुनकर मैं उनसे कहता हूं, ‘आप आइए और हमारे साथ आकर योग केंद्र में रहिए। यहां रहकर आप इन सारे लोगों से दूर हो जाएंगे। हां, इस दौरान हम अचानक आकर चेक करेंगे कि आप खुश हैं या नहीं। हमारी एक ही शर्त है कि जब भी हम देखने आएं, आप हमेशा खुश मिलें। मैं लोगों को अपनी तरफ से दुख परोसने में विश्वास नहीं रखता, यानी आपको मेरी तरफ से कोई दुख नहीं मिलेगा।’ आपको देखना चाहिए कि जब इंसान अकेला होता है तो वह कितने तरीके से खुद को बंधनों में बांधता या कैद करता है। जब आप अकेले हैं और फिर भी आप दुखी हैं तो इसका मतलब है कि आप एक गलत संगत में हैं।

अगर आप अपने मन में सामंजस्य नहीं ला सकते तो आप दुनिया में क्या सामंजस्य लाएंगे? अगर आप खुद को ठीक से संभाल नहीं सकते तो इस दुनिया को क्या कुशलतापूर्वक संभालेंगे? जब तक हर इंसान खुद अपने ऊपर काम नहीं करता, खुद में बदलाव नहीं लाता, तब तक वास्तव में समस्याओं का कोई समाधान नहीं है। दुनिया में किसी भी चीज का वैश्विक या सार्वभौमिक समाधान नहीं है। यह इंसान की निजी मुक्ति या उद्धार ही है, जो विश्व को मुक्ति की तरफ ले जाती है। जब मैं और आप मिलकर अच्छा करते हैं तो यह दुनिया भी अच्छा ही करेगी। दुनिया तो महज एक शब्द है। मैं और आप एक वास्तविकता हैं। अगर मैं और आप खुद को ठीक नहीं कर सकते तो फिर दुनिया को ठीक करने की बात तो सिर्फ एक नारा भर रह जाती है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता।

एक ऐसे ही सम्मेलन में मैं ‘शांति समिति’ के सदस्यों को देख रहा था, जिसमें लगभग 43 नोबेल पुरस्कार विजेता थे। उनके चेहरे देखते ही मैं समझ गया कि इन लोगों ने अपने जीवन में कभी भी शांति का एक पल नहीं जाना या महसूस किया है।

एक बार मैं एक विश्व शांति सम्मेलन में यह सोच कर भाग लेने गया कि वहां लोग मिलकर इस दिशा में कुछ करेंगे। एक ऐसे ही सम्मेलन में मैं ‘शांति समिति’ के सदस्यों को देख रहा था, जिसमें लगभग 43 नोबेल पुरस्कार विजेता थे। उनके चेहरे देखते ही मैं समझ गया कि इन लोगों ने अपने जीवन में कभी भी शांति का एक पल नहीं जाना या महसूस किया है। मैंने उन लोगों से पूछा, ‘कृपया आप लोग बताइए कि सोने के वक्त को छोड़कर क्या आप में से कभी भी किसी ने अपने भीतर सचमुच शांति का अनुभव किया है?’ मानना पड़ेगा कि उन लोगों ने पूरी इमानदारी से जवाब दिया कि उन्होंने कभी भी अपने भीतर शांति को महसूस नहीं किया। अगर स्थिति यह है तो फिर विश्व शांति की बात करने का क्या तुक बनता है।

आपके पास जो सर्वश्रेष्ठ चीज थी, उसे आपने सबसे खराब चीज में बदल दिया, क्योंकि हमारी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, परिवारिक ढांचे और संस्कृति में इस बात पर कोई ध्यान ही नहीं दिया जाता कि खुद को कैसे संभाला जाए।

असली समस्या मन में हैं। मन कुदरत की ओर से हमें मिला सर्वश्रेष्ठ उपहार है, लेकिन हमने इसे अभिशाप बना लिया है। आपको एक सुपर कंप्यूटर दिया गया है, लेकिन आपने इसके इस्तेमाल के निर्देश नहीं पढ़े हैं। आपने कभी खुद को संभालने या ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी। आज जहां इंसान खड़ा है, उस मानिसक क्षमता और समझदारी तक पंहुचने में लाखों साल लगे हैं। लेकिन आज आप अपनी ही समझदारी और प्रतिभा से पीड़ित हो रहे हैं। अगर हम आपसे आपका आधा दिमाग ले लें तो आप में ज्यादातर लोग न सिर्फ शांतिमय हो उठेंगे, बल्कि हर चीज के साथ सामंजस्य में होंगे। आपके पास जो सर्वश्रेष्ठ चीज थी, उसे आपने सबसे खराब चीज में बदल दिया, क्योंकि हमारी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, परिवारिक ढांचे और संस्कृति में इस बात पर कोई ध्यान ही नहीं दिया जाता कि खुद को कैसे संभाला जाए। अगर मैं और आप शांतिमय हैं तो यह दुनिया अपने आप शांतिमय हो उठेगी। अगर मैं और आप प्रेममय होंगे तो यह दुनिया अपने आप प्रेममय हो उठेगी। अगर मैं और आप आनंदमय हैं तो यह दुनिया अपने आप आनंदमय हो उठेगी।
आइए इसे कर दिखाएं।

प्रेम व प्रसाद,

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