एक शानदार, बड़ा पत्थर

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हिमालय में कैलाश की चोटियों से निकल कर विभिन्न कार्यक्रमों के सिलसिले में ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ सिंगापुर व मलेशिया जैसे कुछ एशियाई देशों में जाना हुआ। इस बीच में काफी कुछ हुआ, जो बेहद भागदौड़ भरा रहा। ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जिनके बारे में मैं स्पष्ट रूप से बयान नहीं कर सकता, पर जो बड़ी दिलचस्प बात रही वह स्पष्टा को लेकर ही है। जिस तरह से तिब्बत, नेपाल, सिंगापुर, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया में अंग्रेजी भाषा बोली जाती है, वह अपने आप में एक सांस्कृतिक गुलदस्ता नजर आता है। हाल ही में हम लोग मजाक कर रहे थे कि एक ही भाषा कितने तरीके से बोली जा सकती है। जब हम कैलाश मानसरोवर की यात्रा के सिलसिले में साल 2006 में पहली बार तिब्बत गए तो वहां से कैलाश तक पहुंचने के लिए हम लोग चारपहिए गाड़ी में यात्रा कर रहे थे और हमारे साथ गईं महिलाएं कार में थीं। रास्ते में जब उन्हें हल्के होने की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने पूछा कि टॉयलेट कहां है? इस पर गाइड ने जवाब दिया, ‘ट्री बीहाइन्‍ड’(पेड़ के पीछे)। इस पर वे महिलाएं ‘पेड़ के पीछे’ चली गईं। कुछ देर बाद जब हम तिब्बत के पठार पर पहुंचे तो वहां हरियाली नाम की चीज तक नहीं थी। वहां सब कुछ बंजर था। इस पर महिलाओं ने पूछा- अब क्या करें ? गाइड ने जवाब दिया- ‘रॉक बीहाइन्‍ड’ (चट्टान के पीछे) । इसके बाद हम फिर आगे बढ़ चले। कुछ समय बाद हम ऐसी जगह पहुंचे जहां सब कुछ समतल था। यहां तक कि वहां एक चट्टान तक नहीं थी। महिलाओं ने फिर पिछला सवाल दोहराया। इस पर गाइड ने जवाब दिया- ‘कार बीहाइन्‍ड’ (कार के पीछे)।

खासकर मलेशिया और सिंगापुर में अलग-अलग चीजों के लिए कुछ अलग तरह के शब्दों का इस्तेमाल होता है। मसनल वहां ‘सेक्शन’ (वर्ग या तबके) के लिए ‘सेशन’ (सत्र) शब्द का और सेशन (वर्ग या तबके) के लिए सेक्शन (सत्र) शब्द का इस्तेमाल होता है। एक बार एक लड़की अस्पताल गई और वहां नर्स के पास जाकर उससे बोली कि मुझे कंटिमनेशन (दूषण) कराना है। नर्स ने अपनी हंसी को रोकते हुए कहा- आप का मतलब एक्जामिनेशन (जांच) से है। इस पर लड़की ने जवाब दिया- नहीं, मुझे कंटिमनेशन (दूषण) कराना है और मुझे फ्रेटर्निटी (बिरादरी) वॉर्ड (विभाग) में जाना है। नर्स ने कहा- आप को एक्जामिनेशन कराना है और आप मेटर्निटी वॉर्ड (जच्चा विभाग) में जाना चाहती हैं। लड़की ने जोर दे कर कहा- मैंने आप को बता दिया है कि मुझे फ्रेटर्निटी वॉर्ड में कंटिमनेशन (दूषण) कराना है, मैंने पिछले तीन महीनों से कोई डिमॉन्सट्रेशन (प्रदर्शन) नहीं कराया है और अब मुझे लग रहा है कि मैं स्टेगनेंट ( आलसी/ निष्क्रिय) हो गई हूं । ( हालांकि यहां वह लड़की कहना चाहती थी कि मैंने पिछले तीन महीने से खुद को नहीं दिखाया है, अब मुझे लगता है कि मैं प्रेग्नेंट यानी गर्भवती हो गई हूं।)। तो आपको निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। जब आप एक रास्ते पर हैं, तो इसका अर्थ है कि आपको हमेशा आगे बढ़ते रहना है।

ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और सिंगापुर के स्वयंसेवियों ने जबरदस्त काम किया। विभिन्न कार्यक्रमों में लोगों की जबरदस्त भागेदारी नजर आईं, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे। वहां लोगों में इस बात को लेकर बड़ी गहरी दिलचस्पी दिखाई दी, वे जहां अभी हैं उससे आगे जानने को इच्छुक हैं। पिछले पखवाड़े में इन जगहों पर स्वयंसेवियों के बीच दिल को छू जाने वाले कई नाजुक मौके सामने आए। अद्भुत लोग हैं वे। मंगलवार को ही हिंदुस्तान वापस लौटा और वो पूरा दिन आश्रम के लिए एक चट्टान पंसद करने में निकल गया। दरअसल, हम लोग ध्यानलिंग मंदिर के नए प्रवेशद्वार पर एक शिला लगाना चाहते हैं। पहले मैं सोच रहा था कि 200 टन का कोई शिला खंड ले लूं, लेकिन अंत में हमने 500 टन की एक शिला को पसंद किया। यह एक शानदार बड़ी सी शिला है, जो तकरीबन 40 फीट लंबी और 23 फीट ऊंची है। आने वाले महीने में इसे आश्रम तक लाना भी अपने आप में एक बड़े करतब से कम नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती इसे ट्रक पर लादना और उसे 400 किलोमीटर तक ढोना, आश्रम में लाकर उसे उतारना और फिर उसे इस तरह मनचाही स्थिति में स्थापित करना है। हालांकि स्पंदा हॉल के लिए हम 130 टन का पत्थ लेकर आए थे, लेकिन यह उससे कई गुना बड़ी चुनौती बनने जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि किसी ने भी इस तरह से किसी शिला को दूर तक सिर्फ इसलिए ढोया होगा कि उसे दूसरी जगह जाकर जस का तस रख दिया जाए। हमारा इरादा न तो इस शिला को तराशना है और ना स्मारक बनाने का है, हम तो इसे बस एक पत्थर के तौर पर लगाना चाहते हैं। हालांकि यह बेढब सी एक शिला है, जिसे किसी तरह से काटा या छांटा नहीं गया है, हम इसे इसके परतों वगैरह के साथ जस का तस लेना चाह रहे हैं। यह वाकई अपने आप में जीवंत और स्पंदित है।

इस शिला को लेने के लिए हम अपने नाना के घर के आसपास की जगह पर गए, जो चारों तरफ से पथरीला पहाड़ियों से घिरी हुई है। मेरे नाना काफी समृद्ध व्यक्ति थे। हालांकि मेरे मन में कभी उनकी संपत्ति का कोई ख्याल नहीं आया, लेकिन अब मैं इस पत्थर को उसी इलाके से ला रहा हूं। आम आदमी के अनुभव में यह शीला एक बहुत बड़ा धन होगा, विरासत में मिली किसी भी पुश्तैनी संपत्ति की तुलना में ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण होगा। आखिर में हमने तमाम जगहों पर ढूंढने के बाद यहां की दो शिलाओ को चुना, जिनमें से एक 500 टन की थी और दूसरी 250 टन की। हमारी योजना थी कि अगर हम 500 टन वाली शिला को उठा पाने में नाकाम रहे, तो हम दूसरी शिला को ले जाएंगे। आपमें से जो भी लोग इस शिला के ढुलाई में मदद करना चाहते हैं, उनका स्वागत है…. वाकई यह अपने आप में एक बहुत बड़ा करतब होगा। संयोग से यह शिला मुख्य राजमार्ग से मात्र 50 फीट की दूरी पर है। लेकिन इसे इसके प्राकृतिक ठिकाने, जहां यह पिछले हजारों या लाखों सालों से विराजमान है, से उठाकर इसे ट्रक पर चढ़ाना और फिर इसे आश्रम ले जाकर कर मनचाहे ढंग से रखना अपने आप में एक बड़ा काम है। वाकई यह बहुत बडा काम है।

वैसे, शिलाएं काफी समझदार होती हैं, जो कभी गलती नहीं करतीं। क्या आप यह जानते हैं? वे आपसे ज्यादा समझदार और अक्लमंद हैं। अगर आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिले, जिसने जीवन में कोई गलती न की हो तो क्या आप उसे महान नहीं मानेंगे? तो फिर आप यह श्रेय एक शिला को क्यों नहीं देते ? उसने कभी कोई गलती नहीं की और वह हमेशा से ही अपनी जगह पर विराजमान है। उसने मुझे, आपको और हमारे जैसे लाखों और लोगों को देखा है और वह बहुत कुछ याद रखती है। इसलिए हम उसे अपने आश्रम में लेकर आ रहे हैं और उसके साथ कुछ खास करेंगे। आने वाले समय में वह हमारे ईशा योग केंद्र की एक बेहद महत्वपूर्ण सदस्या बन जाएगी – शायद हमारे केंद्र की सबसे अधिक समय तक जीने वाली सदस्या। यहां वह हम सबके चले जाने के बाद भी बहुत-बहुत लंबे समय तक बनी रहेगी।

प्रेम व प्रसाद,

 


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