ब्रॉडवे से ब्रिटेन

Sadhguru in London

सेंट्रल पार्क को ऊपर से निहारते, कुछ जरूरी मीटिंगें निपटाते और अपने आसपास की जिंदगी के निरीक्षण और पोषण में काफी समय बिताते हुए मैनहटन में एक हफ्ता गुजर गया। न्यूयॉर्क का मौसम काफी खुशगवार था, जहां मैंने रंगमंच (ब्रॉडवे) का भी आनंद लिया।

यह देखना अपने आप में वाकई अद्भुद है कि ब्रॉडवे के इर्दगिर्द विभिन्न प्रतिभाएं कैसे विकसित हुई हैं। यहां नृत्य, संगीत और अभिनय में हैरान कर देने वाले कौशल नजर आते हैं। निश्चित रूप से हमें भी भारत में इस स्तर का कुछ विकसित करने की जरूरत है। अगर हम अपने किसी एक शहर की एक सड़क को पूरी तरह से रंगमंच को समर्पित कर दें तो समय के साथ प्रतिभाएं और दर्शक दोनों ही तैयार हो जाएंगे। हालांकि एक खास स्तर या मापदंड को तैयार करना अपने आप में एक चुनौती होगा, लेकिन यह होना अवश्य चाहिए। यह कदम हमारे समाज को कई तरह से समृद्ध करेगा। आज का भारतीय परिदृश्य बहुत ज्यादा सिनेमा-उन्मुखी हो चुका है,  इसलिए जीवन के तमाम पहलुओं के प्रति विस्तृत नजरिया लाने के लिए इसे अपने भीतर विविधता लाने की जरूरत है। आज हिंदुस्तान में मनोरंजन और खेल बहुत ज्यादा एकांगी हो चुके हैं, समय आ गया है कि इसमें बदलाव लाया जाए।

अमेरिका प्रवास के दौरान मुझे एक ही दिन में तीन बार हेलिकॉप्टर उड़ाने का मौका मिला, जिसमें मैंने न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी और कनेक्टिकट जैसे शहरों पर तीन उड़ानें भरीं। न्यूयॉर्क की गगनचुंबी इमारतों के नजदीक से गुजरना, हडसन नदी के ऊपर से उड़ना और कनेक्टिकट के रास्ते में कुछ मौसमी चुनौतियों से दो-चार होना अपने आप में जबरदस्त अनुभव रहे। उड़ान के दौरान जब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के नजदीक से गुजरे तो उसकी जगह पर दो नए टावरों को बनते देखना अपने आप में बेहद राहतभरा अहसास था। उस दुर्भाग्याशली रोज उन दो इमारतों के गिरने के बाद से दुनिया कितनी बदल गई है। अगर आपको पता न हो तो बता दूं कि उस दिन से महज एक शाम पहले यानी 10 सितंबर 2001 को मैं मैनहटन इलाके में रिवरसाइड चर्च में एक व्‍यख्‍यान दे रहा था। यह चर्च उस जगह से महज एक मील दूर था, जहां 24 घंटे के भीतर यह हादसा हुआ था। 10 सितंबर को मैं अमेरिका से साइप्रस के लिए रवाना हुआ और विडंबना देखिए कि मुझे निकोसिया स्थित अमेरिकी दूतावास में ही व्‍यख्‍यान देना था। उस दिल दहला देने वाली घटना के बाद मानवता जितनी हिंसा, नफरत और दमन से भर उठी, उतनी तो हम लोगों ने अपनी याददाश्त में शायद ही कभी देखी हो।

लंदन में शांभवी की शुरुआत के लिए जो आयोजन हुआ, वह अपनी तरह का यूके का अब तक का सबसे बड़ा आयोजन था। जहां जकरीबन 700 लोग जुटे और पूरा आयोजन जबरदस्त तौर से सफल रहा। यूके के स्वयंसेवियों ने इस तरह का आयोजन पहली बार किया था। हालांकि फरवरी 2013 में होने वाले इससे भी बड़े आयोजन की तैयारियों में वे अभी से ही जुटे हुए हैं।

इस दौरान मैंने लंदन बिजनेस स्कूल के आयोजन में भी हिस्सा लिया, जहां मेरी मुलाकात बिजनेस स्टडीज के जाने-माने विद्वान डोनल्ड सल से हुई। हमने कई चीजों पर बातचीत की। डोनल्ड की जिंदगी का बड़ा हिस्सा यूके और अमेरिका के बीच भागते-दौड़ते बीतता है। मैं डोनल्ड और लंदन बिजनेस स्कूल को इस बात के लिए हार्दिक बधाई देना चाहता हूं कि उनका मकसद सिर्फ अपना बाजार या तादाद बढ़ाना अथवा प्रबंधन की विषयवस्तु देना भर नहीं है, बल्कि वे लोग ज्ञान और गहन चीजों को पाने की कोशिशों में जुटे हैं।

यह लेख मैं हीथ्रो हवाईअड्डे के टर्मिनल 5, पर बैठकर लिख रहा हूं। कुछ मिनटों बाद ही मेरा हवाई जहाज हैदराबाद के लिए उड़ान भरेगा।

प्रेम व प्रसाद,

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